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उधमपुर में घायल पिता का सहारा बनीं बंजीत और देविंदर, बस और ऑटो चलाकर संभाल रहीं घरसक्सेस स्टोरी
20 सित॰ 2026, 10:48 pm (39 दिन पहले)· 1

उधमपुर में घायल पिता का सहारा बनीं बंजीत और देविंदर, बस और ऑटो चलाकर संभाल रहीं घर

जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में पिता के चोटिल होने के बाद बंजीत कौर और देविंदर कौर ने बस और ऑटो की कमान संभाल ली है, जहां वे काम के साथ पढ़ाई जारी रखकर पूरे परिवार का खर्च उठा रही हैं।

जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले की दो सगी बहनों ने पारिवारिक संकट के समय ऐसी मिसाल कायम की है जो सामाजिक सोच को नई दिशा दे रही है। जब परिवार के मुखिया किसी गंभीर हादसे के चलते कमाने की स्थिति में नहीं रहे, तब उनकी दो बेटियों ने घर की आर्थिक गाड़ी को रुकने नहीं दिया। बंजीत कौर और देविंदर कौर नाम की ये दो बहनें आज सड़कों पर स्कूल बस और तिपहिया ऑटो चलाकर न केवल अपने घर का खर्च उठा रही हैं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। समाज की रूढ़िवादी धारणाओं को दरकिनार करते हुए दोनों बहनों ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत और हौसला किसी जेंडर के दायरे में बंधा नहीं होता।

पिता के साथ हुआ हादसा और घर पर गहराया संकट

बंजीत और देविंदर का परिवार सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता है। उनके पिता स्कूल बस चलाकर और दिन के बाकी समय में ऑटो रिक्शा चलाकर पूरे परिवार का भरण-पोषण करते थे। पिता की यह दूरदर्शिता थी कि उन्होंने अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले ही बस और ऑटो दोनों की ड्राइविंग सिखा दी थी। उनका स्पष्ट मानना था कि बेटियों को किसी भी परिस्थिति में दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और मुश्किल वक्त आने पर वे अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी हो सकें।

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लेकिन कुछ समय पहले अचानक एक अप्रिय घटना घटी। सीढ़ियों से उतरते वक्त पिता का संतुलन बिगड़ गया और वे नीचे गिर पड़े। इस गंभीर हादसे में उनके एक बाजू में गहरी चोट आई, जिसके चलते उनका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। हाथ में आई इस चोट के कारण डॉक्टरों और शारीरिक कमजोरी ने उन्हें भारी स्टेयरिंग थामने और गियर बदलने से रोक दिया। परिवार के पास आय का कोई दूसरा जरिया नहीं था, जिससे रोजमर्रा के घरेलू खर्च, दवाइयों और राशन का गहरा संकट खड़ा हो गया।

बेटियों ने आगे बढ़कर थामी गाड़ियों की कमान

घर में अचानक आए इस आर्थिक संकट के सामने दोनों बहनों ने हिम्मत नहीं हारी। लाचारी में बैठने के बजाय बंजीत कौर और देविंदर कौर ने तत्काल फैसला लिया कि वे अपने पिता के पहियों को रुकने नहीं देंगी। पिता द्वारा सिखाई गई ड्राइविंग की तालीम को उन्होंने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। सुबह के समय जब स्कूली बच्चों को स्कूल पहुंचाना होता है, तो वे स्कूल बस की स्टेयरिंग संभालती हैं। इसके बाद दिन के समय जब आम सवारियों की आवाजाही होती है, तब वे शहर की सड़कों पर ऑटो चलाकर परिवार के लिए पैसे कमाती हैं।

काम के बीच किताबों से नाता नहीं तोड़ा

भारी वाहनों को चलाने और दिनभर सड़कों की धूप-धूल झेलने के बावजूद इन दोनों बहनों ने अपनी शिक्षा को पीछे नहीं छूटने दिया। उन्होंने अपने दैनिक जीवन में काम और पढ़ाई के बीच गजब का संतुलन बनाया है। जब वे ऑटो स्टैंड पर या स्कूल के बाहर अगली सवारी अथवा ट्रिप का इंतजार करती हैं, तब वे खाली समय गपशप में बर्बाद नहीं करतीं। उस दौरान उनके हाथों में किताबें होती हैं। वे स्टेयरिंग के पीछे बैठकर ही अपने सिलेबस के पन्ने पलटती हैं और परीक्षा की तैयारी करती हैं। उनका पूरा दिन इसी तरह काम और पढ़ाई के दोहरे संघर्ष के बीच बीतता है।

सामाजिक तानों और घूरती नजरों की परवाह नहीं

आमतौर पर छोटे शहरों में महिलाओं को व्यावसायिक बस या ऑटो चलाते देखना आम नहीं माना जाता। शुरुआत में जब बंजीत और देविंदर ने ऑटो स्टैंड पर कदम रखा, तो लोगों ने उन्हें अचरज और घूरती नजरों से देखा। ऑटो स्टैंड पर खड़े अन्य चालकों और राहगीरों की ओर से तरह-तरह की फब्तियां और बातें भी सुनने को मिलीं। समाज का एक तबका हमेशा ऐसे कामों को महिलाओं के दायरे से बाहर मानता आया है।

हालांकि इन दोनों बहनों ने इन तानों को अपने हौसले के आगे कभी रुकावट नहीं बनने दिया। उनका दृष्टिकोण बिल्कुल साफ और व्यावहारिक है। उनका कहना है कि जब परिवार पर मुसीबत आई थी, तब कोई दूसरा उनकी जरूरतें पूरी करने या चूल्हा जलाने नहीं आया था। ऐसे में जो लोग घर का खर्च नहीं चला सकते, उनकी बातों और तानों पर ध्यान देकर अपना रास्ता रोकने का कोई औचित्य नहीं है। इसी मजबूत इरादे के साथ वे हर दिन अपने काम पर निकलती हैं।

चार बहनों का परिवार और भविष्य की तैयारी

इस परिवार में कुल चार बेटियां हैं। पिता ने अपनी मेहनत से दो बड़ी बेटियों की शादी पहले ही संपन्न करा दी थी। अब घर में माता-पिता के साथ बंजीत और देविंदर ही रह रही हैं। वे न सिर्फ अपने घायल माता-पिता की देखभाल कर रही हैं और घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल रही हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अपनी शादी के लिए भी बचत कर रही हैं। दोनों बहनों का साफ कहना है कि वे अपने माता-पिता को कभी इस बात का मलाल नहीं होने देंगी कि उनके घर में कोई बेटा नहीं है। उन्होंने अपनी इच्छा और जिम्मेदारी से यह कर्तव्य अपने कंधों पर उठाया है और वे इसे पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।

सवाल-जवाब

बंजीत कौर और देविंदर कौर किस शहर की रहने वाली हैं?
बंजीत कौर और देविंदर कौर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले की रहने वाली हैं।
दोनों बहनों को बस और ऑटो चलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सीढ़ियों से गिर जाने के कारण उनके पिता के बाजू में गहरी चोट लग गई थी, जिससे वे वाहन चलाने में असमर्थ हो गए थे और परिवार का खर्च चलाने के लिए बेटियों को कमान संभालनी पड़ी।
क्या दोनों बहनें काम के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं?
हां, दोनों बहनें काम के बीच जब भी समय मिलता है या सवारियों का इंतजार करती हैं, तब किताबें पढ़कर अपनी पढ़ाई जारी रखती हैं।
परिवार में कुल कितनी बहनें हैं?
परिवार में कुल चार बेटियां हैं, जिनमें से दो बड़ी बेटियों की शादी पिता पहले ही करा चुके हैं।
दोनों बहनों को ड्राइविंग किसने सिखाई थी?
उनके पिता ने उन्हें पहले ही आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बस और ऑटो चलाना सिखाया था।
ऑटो स्टैंड पर लोगों के तानों पर बहनों का क्या कहना है?
बहनों का कहना है कि जब जरूरतें पूरी करने कोई नहीं आता, तो समाज के तानों और बातों पर ध्यान देने का कोई मतलब नहीं है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·38 दिन पहले

उधमपुर की बंजीत कौर और देविंदर कौर की यह वास्तविक कहानी किसी प्रेरणादायक बायोपिक या ओटीटी ड्रामा से कम नहीं है। यह ज़मीनी संघर्ष साबित करता है कि जब परिस्थितियाँ मजबूर करती हैं, तब बेटियाँ रूढ़िवादिता को तोड़कर न सिर्फ़ परिवार का आर्थिक बोझ उठाती हैं, बल्कि अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से समाज की सोच को भी पूरी तरह बदल देती हैं।

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·38 दिन पहले

उधमपुर की इन बहनों का संघर्ष जम्मू-कश्मीर में महिला आजीविका और कौशल विकास की ज़मीनी हक़ीक़त को दर्शाता है। एक तरफ जहां पारंपरिक रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहीं इस तरह की आत्मनिर्भरता स्थानीय आर्थिकी में लैंगिक बाधाओं को तोड़ने का बड़ा उदाहरण पेश करती है। यह घटना दर्शाती है कि यदि पारिवारिक स्तर पर आर्थिक स्वतंत्रता और व्यावहारिक शिक्षा पर ध्यान दिया जाए, तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में युवा किसी भी आपात स्थिति का सामना करने में सक्षम हो सकते हैं।

Rohan Gupta@rohan-gupta·38 दिन पहले

उधमपुर की इन बहनों की कहानी सिर्फ आजीविका का संकट टालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि व्यावहारिक कौशल संकट के समय कैसे ढाल बनता है। इनके पिता द्वारा इन्हें ड्राइविंग सिखाना एक दूरदर्शी कदम था, जो डिजिटल और कौशल-आधारित युग में पारंपरिक सोच को पीछे छोड़ने की प्रेरणा देता है। ऐसे मामले यह साबित करते हैं कि जमीनी स्तर पर कौशल विकास और व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देकर युवा वर्ग को किसी भी आर्थिक अनिश्चितता से निपटने के लिए तैयार किया जा सकता है, जो भविष्य के कार्यबल के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 दिन पहले

यह घटना जेंडर आधारित श्रम विभाजन पर गहरी चोट करती है। उधमपुर की इन बहनों की कहानी मात्र एक परिवार का संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत समर्थन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यदि सरकारी कौशल विकास और वित्तीय योजनाओं का लाभ ऐसी आत्मनिर्भर बालिकाओं तक पहुँचे, तो यह सामाजिक बदलाव की एक बड़ी नीतिगत मिसाल बन सकता है।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·38 दिन पहले

अर्जुन की इस बात को आगे बढ़ाते हुए, यह सिर्फ एक व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है, बल्कि सिनेमाई और दृश्य माध्यमों के लिए भी एक सशक्त प्रेरणा है। मुख्यधारा की कहानियों में ऐसे वास्तविक किरदारों को जगह मिलने से समाज की रूढ़िवादी सोच पर गहरा प्रहार होता है। यदि इस तरह की प्रेरणादायक वास्तविक जीवन की कहानियों को बड़े पर्दे या वृत्तचित्रों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जाए, तो यह मनोरंजन जगत के जरिए सामाजिक बदलाव लाने का एक बेहतरीन माध्यम बन सकता है।

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