उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की रहने वाली आठवीं कक्षा की छात्रा रिया उपाध्याय ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में एक अनूठी मिसाल कायम की है। करीब चार एकड़ भूमि पर गन्ने की खेती कर रही रिया न केवल अपनी शिक्षा पर पूरा ध्यान दे रही हैं, बल्कि अपने परिवार की कृषि आय बढ़ाने में भी सक्रिय योगदान दे रही हैं। समय का कुशल प्रबंधन करते हुए उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि इच्छाशक्ति और आधुनिक तकनीकों के सहारे कम उम्र में भी खेती को एक लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है।
टेंच विधि और गन्ने की चार आधुनिक किस्में
रिया उपाध्याय अपनी चार एकड़ जमीन में गन्ने की खेती के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक टेंच विधि का इस्तेमाल कर रही हैं। इस तकनीक के तहत खेत में एक निश्चित दूरी पर गहरी नालियां बनाई जाती हैं और फिर उनमें गन्ने की बुआई की जाती है। रिया के अनुसार, इस तरीके से नालियां बनाने के कारण पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे फसल की सिंचाई करना, खाद डालना और पौधों की नियमित निगरानी करना बेहद आसान हो जाता है।
अपनी फसल की पैदावार और गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से रिया ने इस बार गन्ने की चार अलग-अलग किस्मों की बुआई की है। इनमें 0118, 14201, 18231 और 21012 प्रजातियां शामिल हैं। उनका मानना है कि अलग-अलग प्रजातियों को एक साथ उगाने से फसल के व्यवहार, कीट प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादन क्षमता के बारे में बेहतर व्यावहारिक जानकारी मिलती है। इससे आने वाले समय में किसानों को सबसे बेहतर और अधिक उपज देने वाली किस्म चुनने में मदद मिलती है।
खेती का आर्थिक गणित और सहफसली खेती का लाभ
गन्ने की खेती में लगने वाली लागत और उससे होने वाली कमाई का रिया के पास स्पष्ट हिसाब-किताब है। उनके अनुभव के मुताबिक, गन्ने की खेती में प्रति बीघा लगभग 20 हजार रुपये की कुल लागत आती है। यदि मौसम अनुकूल रहे और फसल की देखभाल सही ढंग से की जाए, तो एक बीघा खेत से करीब 50 हजार रुपये तक की सकल आय प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार चार एकड़ के विस्तृत क्षेत्र में खेती होने के कारण उनके परिवार को एक अच्छी-खासी कुल कमाई होने की उम्मीद है।
लागत को और कम करने तथा अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए रिया ने गन्ने के खेतों में सहफसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) का तरीका अपनाया है। मुख्य गन्ने की फसल तैयार होने में लंबा समय लगता है, लेकिन पंक्तियों के बीच की खाली जगह में सहफसली फसलें उगाकर गन्ने के पकने से पहले ही उपज मिल जाती है। रिया बताती हैं कि इस बीच में मिलने वाली छोटी फसलों की बिक्री से जो कमाई होती है, उससे गन्ने की मुख्य फसल में लगने वाले खाद, बीज और सिंचाई के शुरुआती खर्च आसानी से निकल आते हैं।
समय का प्रबंधन और ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा
रिया के जीवन में पढ़ाई हमेशा पहली प्राथमिकता पर रहती है। वह अपने स्कूल और अध्ययन के समय से कोई समझौता नहीं करती हैं। दिन के खाली समय का उपयोग वह खेत के जरूरी कामों में करती हैं। फसल की निराई-गुड़ाई, सिंचाई का प्रबंधन, सही समय पर खाद देना और पौधों का निरीक्षण करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। उनका कहना है कि अगर समय का सही तरीके से नियोजन किया जाए, तो पढ़ाई और कृषि कार्य दोनों को बिना किसी बाधा के एक साथ संभाला जा सकता है।
रिया का स्पष्ट मानना है कि खेती को किसी भी तरह से कमतर या छोटा काम नहीं समझा जाना चाहिए। यदि सही जानकारी, कठिन परिश्रम और आधुनिक कृषि तकनीक का समन्वय किया जाए, तो कृषि क्षेत्र से भी बेहतरीन लाभ कमाया जा सकता है। आठवीं की पढ़ाई के साथ खेती में सफलता हासिल करने का उनका यह प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों के अन्य बच्चों और युवाओं को प्रेरित कर रहा है। वह भविष्य में अपनी उच्च शिक्षा जारी रखने के साथ-साथ कृषि के क्षेत्र में नए मुकाम हासिल करने का संकल्प रखती हैं।



















