झारखंड के एक सुदूर गांव से निकलकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी संभालने वाली सलीमा टेटे की जीवन यात्रा संघर्ष और अटूट संकल्प की मिसाल है। बेहद तंगहाली और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पली-बढ़ी सलीमा ने तमाम विपरीत परिस्थितियों को दरकिनार करते हुए अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी खास पहचान बनाई है। बिना हॉकी स्टिक और भोजन की तंगी के बीच शुरू हुआ उनका सफर आज देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।
बांस की लकड़ी और पत्थरों से खेल का आगाज
रांची से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित सिमडेगा जिले के छापर गांव की रहने वाली सलीमा टेटे का बचपन बेहद कड़े अभावों में बीता। उनके पिता एक साधारण किसान थे, जिनकी खेती से परिवार का गुजारा होना मुश्किल था। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि सलीमा की मां और बहन को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था। परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि सलीमा के लिए एक असली हॉकी स्टिक खरीदी जा सके।
ऐसे में सलीमा ने हार मानने के बजाय कुदरती संसाधनों का सहारा लिया। उनके खेतों के आसपास प्राकृतिक रूप से बांस उगते थे। सलीमा और उनके साथी उन्हीं बांसों को काटकर अपने लिए कच्ची हॉकी स्टिक तैयार कर लेते थे। गेंद खरीदने के पैसे न होने पर वे पत्थरों को ही गेंद बनाकर गलियों और खेतों में हॉकी खेला करते थे। घर में खान-पान भी बेहद साधारण था, जहां कई बार सिर्फ माड़-भात या चोखा-भात खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। हालांकि, इस तंगहाली के बावजूद सलीमा के भीतर खेल को लेकर अटूट निष्ठा बनी रही।
प्रतिभा की पहचान और 10-12 घंटे का कड़ा अभ्यास
सलीमा की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब सिमडेगा हॉकी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कोंडेगी की नजर उनकी प्रतिभा पर पड़ी। उन्होंने सलीमा के भीतर छिपे कौशल को पहचाना और उन्हें मार्गदर्शन देना शुरू किया। मनोज कोंडेगी के विशेष प्रयासों से सलीमा को एक निःशुल्क आवासीय हॉकी प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला मिल गया।
इस प्रशिक्षण केंद्र में प्रवेश मिलते ही सलीमा को भोजन और रहने की चिंता से मुक्ति मिल गई। यहां उन्हें आधुनिक हॉकी स्टिक, खेल की सही किट और पेशेवर सुविधाएं प्राप्त हुईं। जीवन में मिले इस अवसर को सलीमा ने पूरी शिद्दत से भुनाया। उन्होंने खुद को निखारने के लिए रोजाना 10 से 12 घंटे तक मैदान पर पसीना बहाया। सलीमा का मानना है कि कोच के मार्गदर्शन और परिवार के समर्थन के बिना वह इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं।
पड़ोसी के टीवी पर देखा मैच और अर्जुन अवॉर्ड का ऐतिहासिक गौरव
जब सलीमा का चयन पहली बार राष्ट्रीय मैच के लिए हुआ, तब भी उनके घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वहां टीवी हो। उनके परिवार के पास मैच देखने का कोई साधन नहीं था, इसलिए सलीमा को पहली बार खेलते देखने के लिए उनके घरवालों को पड़ोसी के घर जाना पड़ा था। टीवी की स्क्रीन पर अपनी बेटी को देश के लिए खेलते देख उनका परिवार बेहद भावुक हो उठा था।
सलीमा टेटे ने अपने प्रदर्शन के दम पर न केवल भारतीय महिला हॉकी टीम में अपनी जगह पक्की की, बल्कि टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी भी संभाली। उन्होंने ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया और कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल किए। सलीमा को केंद्र सरकार द्वारा प्रतिष्ठित अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वह अर्जुन अवॉर्ड प्राप्त करने वाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी बनी हैं। बांस की स्टिक से शुरू हुआ सलीमा का यह सफर यह साबित करता है कि सच्ची लगन हो तो कोई भी बाधा मंजिल के रास्ते में नहीं आ सकती।



















