मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है जिसके तहत करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का प्रावधान किया गया था। 27 जुलाई को फैसला सुनाते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा जारी यह आदेश संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर दिया गया था। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि इस तरह के फैसलों से भविष्य में इसी प्रकार की मांगों की एक बड़ी बाढ़ आ सकती है, जिससे प्रशासनिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
संवैधानिक मर्यादाओं और भर्ती नियमों का उल्लंघन
जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 में दिए गए समानता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है। अदालत ने ध्यान दिलाया कि तमिलनाडु के विभिन्न सरकारी विभागों में हजारों ऐसे पात्र व्यक्ति मौजूद हैं जो लंबे समय से अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में कतार में खड़े अन्य योग्य आवेदकों के दावों और जरूरतों को पूरी तरह नजरअंदाज करके करूर हादसे के पीड़ितों को विशेष प्राथमिकता देना न्यायसंगत नहीं है।
राज्य सरकार ने इस संबंध में तर्क दिया था कि उसने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपनी प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह निर्णय लिया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सरकार की कार्यकारी और प्रशासनिक शक्तियां सीमित हैं और उनका इस्तेमाल हमेशा संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं और स्थापित कानूनी ढांचे के भीतर ही होना चाहिए।
मुआवजे और नौकरियों में अंतर पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि अगर इस तरह के मामलों में सरकारी नौकरियां देने की अनुमति दी जाने लगी, तो इससे अनगिनत लोग इसी प्रकार की मांग लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाने लगेंगे। अपने फैसले को स्पष्ट करने के लिए पीठ ने पटाखा फैक्ट्रियों में होने वाले विस्फोटों और गंभीर सड़क दुर्घटनाओं का उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे कई हादसे होते हैं जहां सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण आम नागरिकों की जान चली जाती है, लेकिन उन मामलों में भी प्रभावित परिवारों को केवल अनुग्रह राशि या आर्थिक मुआवजा दिया जाता है, न कि अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी। यदि करूर मामले में दी गई नौकरियों को वैध माना जाता, तो सरकार को अन्य सभी दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए भी इसी तरह की नियुक्तियां करनी पड़तीं।
करूर भगदड़ का घटनाक्रम और सरकारी निर्णय
यह मामला पिछले साल 27 सितंबर 2025 का है, जब तमिलनाडु के करूर शहर में टीवीके पार्टी की एक राजनीतिक रैली के दौरान भीषण भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 41 लोगों की जान चली गई थी और 60 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
इस हादसे के बाद जुलाई की शुरुआत में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने करूर का दौरा किया था। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए मृतकों की याद में एक स्मारक बनाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही उन्होंने भगदड़ में मारे गए लोगों के 32 आश्रितों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपे थे। अब उच्च न्यायालय के नए फैसले के बाद इन नियुक्तियों पर रोक लग गई है। इस कानूनी झटके के बाद तमिलनाडु सरकार इस फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है।



















