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करूर हादसे के पीड़ितों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोकतमिलनाडु
14 अग॰ 2026, 6:44 pm (1 घंटे पहले)· 2

करूर हादसे के पीड़ितों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

सितंबर 2025 की करूर भगदड़ में मारे गए 41 लोगों के परिजनों को अनुकंपा पर नौकरी देने वाले सरकारी फैसले पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक को सुप्रीम कोर्ट ने निलंबित कर दिया है।

तमिलनाडु के करूर जिले में सितंबर 2025 में हुई दर्दनाक भगदड़ की घटना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को फिलहाल निलंबित कर दिया है, जिसके जरिए राज्य सरकार द्वारा मृतकों के आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के फैसले को रद्द किया गया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की राहत पहल को रोकने की याचिका पर कड़े सवाल उठाए और राजनीतिक बहस पैदा करने की कोशिश पर सख्त आपत्ति जताई।

मद्रास हाईकोर्ट का आदेश और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

करूर में सितंबर 2025 के दौरान हुए हादसे के बाद राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों को तात्कालिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से मुआवजा, पुनर्वास और अनुकंपा नियुक्ति की योजना बनाई थी। इस योजना के तहत हादसे में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिजनों को सरकारी रोजगार प्रदान करने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन के इस फैसले को निरस्त कर दिया था।

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हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार और अन्य पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को तत्काल प्रभाव से रोकते हुए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद फिलहाल राज्य सरकार द्वारा प्रभावित परिवारों को राहत देने की योजना पर से कानूनी अड़चन हट गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में राज्य प्रशासन का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर सवाल खड़े किए। उन्होंने तर्क दिया कि एक भीषण हादसे में अपनों को खोने वाले परिवारों को जब सरकार सहायता और रोजगार देने का सामाजिक निर्णय लेती है, तो उसमें किसी तीसरे पक्ष द्वारा जनहित याचिका दायर करने का कोई ठोस औचित्य नहीं बनता। सिंघवी ने कहा कि ऐसी कल्याणकारी पहल के खिलाफ दायर याचिकाओं की वैधता की जांच होनी चाहिए।

पीठ ने भी वरिष्ठ वकील की दलीलों से सहमति व्यक्त करते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति सहानुभूति जताई। सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने टिप्पणी की कि जब किसी गंभीर दुर्घटना में निर्दोष नागरिकों की जान जाती है, तो उनके परिवारों को आर्थिक संबल और रोजगार देने का निर्णय पूरी तरह से न्यायसंगत है। अदालत ने सवाल किया कि यदि किसी परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य हादसे का शिकार हो जाता है, तो सरकार द्वारा उसके बेटे या बेटी को नौकरी देने के विचार पर आपत्ति क्यों उठाई जानी चाहिए।

अदालत में राजनीतिक बहस पर पीठ की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के निर्णय का विरोध कर रहे एक वकील ने अपनी दलील पेश की। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को अपनी मर्जी से अनुकंपा नौकरियां बांटने का असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता। वकील ने आरोप लगाया कि जिस राजनीतिक संगठन पर हादसे की जिम्मेदारी का आरोप है, वही वर्तमान में सत्ता में मौजूद है, जिससे हितों के टकराव की संभावना बनती है।

इस दलील पर पीठ ने तुरंत वकील से स्पष्टीकरण मांगा कि वे किस पक्ष या संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जब वकील ने स्वीकार किया कि वे एक राजनीतिक दल की ओर से पेश हुए हैं, तो जस्टिस के विनोद चंद्रन ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, 'यहां राजनीति मत लाइए।' अदालत के इस रुख से साफ हो गया कि कानूनी प्रक्रियाओं में राजनीतिक एजेंडे को जगह नहीं दी जाएगी। अब इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नोटिस के जवाब दाखिल होने के बाद होगी।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने करूर भगदड़ मामले में क्या फैसला दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने करूर भगदड़ के पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के फैसले को रद्द कर दिया था।
करूर भगदड़ हादसा कब हुआ था और इसमें कितने लोग मारे गए थे?
यह हादसा सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में हुआ था, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी।
अदालत में राज्य सरकार का पक्ष किसने रखा?
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश कीं।
मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पीठ में कौन से जज शामिल थे?
मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ कर रही थी।
सुनवाई के दौरान जज ने राजनीति को लेकर क्या टिप्पणी की?
विरोध कर रहे राजनीतिक पार्टी के वकील की दलील पर जस्टिस के विनोद चंद्रन ने कहा, 'यहां राजनीति मत लाइए।'
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