वर्तमान समय में कंप्यूटर की-बोर्ड, टैबलेट या स्मार्टफोन की टचस्क्रीन पर हिंदी में लिखना बेहद सुलभ हो चुका है। डिजिटल दौर में देवनागरी लिपि के तमाम अक्षर और मात्राएं की-बोर्ड पर आसानी से मिल जाती हैं, वहीं वॉयस टाइपिंग के जरिए बोलकर भी सेकंडों में लंबा पन्ना तैयार कर लिया जाता है। हालांकि, बीसवीं सदी के मध्य में तस्वीर ऐसी बिल्कुल नहीं थी। उस दौर में जब सरकारी कार्यालयों, कचहरियों और समाचार पत्रों के दफ्तरों में हिंदी भाषा का दायरा और पत्राचार तेजी से बढ़ रहा था, तब हिंदी में त्वरित और कुशल टाइपिंग के लिए कोई समर्पित मशीन या की-बोर्ड उपलब्ध नहीं था। इस गंभीर प्रशासनिक और भाषाई समस्या के समाधान के रूप में बिहार की राजधानी पटना से एक क्रांतिकारी आविष्कार सामने आया, जिसने देश भर में हिंदी टाइपिंग की दिशा बदल दी।
सरकारी कामकाज की चुनौती और हिंदी कीबोर्ड का आविष्कार
स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। लेकिन टाइपराइटर जैसी बुनियादी मशीन पर देवनागरी लिपि में काम करना एक बड़ी बाधा बना हुआ था। देवनागरी लिपि में स्वरों, व्यंजनों, विभिन्न मात्राओं, हलंत और संयुक्त अक्षरों का विस्तृत ढांचा होता है, जिसे अंग्रेजी की तर्ज पर बने पारंपरिक टाइपराइटर पर ढालना बेहद मुश्किल काम था। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए पटना साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में कार्यरत प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र ने एक नया हिंदी कीबोर्ड तैयार करने का संकल्प लिया। उन्होंने भाषा विज्ञान और अक्षरों के उपयोग की आवृत्ति पर गहराई से शोध शुरू किया ताकि एक ऐसा व्यावहारिक कीबोर्ड बनाया जा सके जो टाइपिस्टों के काम को आसान बना सके।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार 'मिश्रा कीबोर्ड' और 20 फीसदी कागज की बचत
प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र द्वारा तैयार किए गए इस कीबोर्ड की सबसे मुख्य खूबी इसका वैज्ञानिक और एर्गोनॉमिक डिजाइन था। उन्होंने अक्षरों और मात्राओं का संयोजन उंगलियों की प्राकृतिक पहुंच और गति को ध्यान में रखकर किया था। हिंदी भाषा में सरकारी पत्रों और अखबारों में जिन वर्णों का प्रयोग सबसे अधिक होता था, उन्हें कीबोर्ड की मध्य पंक्ति में ऐसी जगह रखा गया जहां टाइपिस्ट की उंगलियां बिना किसी खिंचाव के आसानी से पहुंच सकें। इसके विपरीत, जिन अक्षरों और चिह्नों का प्रयोग तुलनात्मक रूप से कम होता था, उन्हें ऊपरी और निचली पंक्तियों में स्थान दिया गया।
इस अनूठी संरचना का परिणाम यह हुआ कि नए टाइपिस्ट बेहद कम समय की ट्रेनिंग के बाद भी काफी तेज गति से देवनागरी में टाइप करने में सक्षम हो गए। उंगलियों को बार-बार दूर तक न ले जाने के कारण टाइपिंग की गलतियां कम हुईं और काम की रफ्तार कई गुना बढ़ गई। इस कुशल डिजाइन के चलते दस्तावेजों की छपाई में सटीकता आई, जिससे सरकारी और निजी कार्यालयों में कागज की करीब 20 फीसदी बचत होने लगी, जो उस समय एक बड़ी आर्थिक उपलब्धि मानी गई। आगे चलकर इस ऐतिहासिक डिजाइन को 'मिश्रा कीबोर्ड' के नाम से प्रसिद्धि मिली।
जर्मन कंपनी का करार और अंतरराष्ट्रीय पहचान
प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र द्वारा विकसित इस हिंदी कीबोर्ड डिजाइन की क्षमता और उपयोगिता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया। जर्मनी की एक प्रसिद्ध टाइपराइटर निर्माता कंपनी ने इस डिजाइन के महत्व को समझा और प्रो. मिश्र के कीबोर्ड लेआउट को अपने टाइपराइटरों में शामिल करने का फैसला किया। इस जर्मन तकनीक और पटना के प्रोफेसर की सोच के मेल से बने हिंदी टाइपराइटरों का निर्माण शुरू हुआ, जिसके बाद ये मशीनें भारत के तमाम हिंदी भाषी क्षेत्रों के सरकारी विभागों, अदालतों और प्रेस परिसरों में अनिवार्य साधन बन गईं।
श्रीकृष्ण साइंस सेंटर में आज भी सुरक्षित है ऐतिहासिक धरोहर
पटना शहर में उस दौर की इस ऐतिहासिक और तकनीकी क्रांति की याद आज भी पूरी तरह से जीवित है। बिहार की राजधानी पटना में प्रसिद्ध गांधी मैदान के पश्चिमी छोर पर स्थित श्रीकृष्ण साइंस सेंटर में पहला हिंदी टाइपराइटर आज भी आम जनता के देखने के लिए प्रदर्शित किया गया है। श्रीकृष्ण साइंस सेंटर के पूर्व शिक्षा अधिकारी सतीश रंजन के अनुसार, प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र के निधन के बाद उनके परिजनों ने इस अमूल्य धरोहर को सहेजने के लिए केंद्र को सौंप दिया था।
मशीन को सौंपने के समय प्रोफेसर मिश्र के परिवार के सदस्य, जिनमें उनके पुत्र, पुत्री, दामाद और अन्य करीबी रिश्तेदार शामिल थे, स्वयं साइंस सेंटर पहुंचे थे। उन्होंने इस ऐतिहासिक मशीन और उससे जुड़े दुर्लभ दस्तावेजों व जानकारियों को तत्कालीन प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर के सुपुर्द किया था। सतीश रंजन बताते हैं कि परिवार द्वारा दी गई यह मूल मशीन आज भी श्रीकृष्ण साइंस सेंटर परिसर स्थित डॉ. श्रीकृष्ण सिंह गैलरी में सुरक्षित रखी गई है, जहां आने वाले छात्र, शोधकर्ता और नागरिक भारत के इस पहले हिंदी टाइपराइटर के दर्शन कर सकते हैं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी: कौन थे प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र?
हिंदी भाषा को पहला टाइपराइटर देने वाले प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र एक असाधारण प्रतिभा संपन्न विद्वान थे। उनका जन्म 1905 में बिहार के भागलपुर जिले में स्थित चंपानगर में हुआ था। वे पटना साइंस कॉलेज में अंग्रेजी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक रहे, लेकिन उनकी ज्ञान-पिपासा केवल एक विषय तक सीमित नहीं थी। अंग्रेजी के साथ-साथ उन्हें जर्मन भाषा का भी व्यापक और गहन ज्ञान था, जिसकी वजह से वे जर्मन उद्योग जगत और भाषा संरचना को गहराई से समझ सके।
भाषाविद् होने के साथ-साथ प्रोफेसर मिश्र यूरोपीय शास्त्रीय संगीत के भी गहरे जानकार थे। उनकी विद्वत्ता केवल विदेशी भाषाओं तक सीमित नहीं थी; वे हिंदी और संस्कृत साहित्य के भी प्रकांड पंडित थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें, साहित्यिक कृतियां और उपन्यास लिखे। भाषा, साहित्य और नवाचार के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय सम्मानों से अलंकृत किया गया। इस महान शिक्षाविद और आविष्कारक ने 26 दिसंबर 1971 को पटना में अपनी अंतिम सांस ली, लेकिन उनका बनाया 'मिश्रा कीबोर्ड' आज भी हिंदी भाषा के तकनीकी विकास के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है।



















