देश भर में पुलिस और जांच एजेंसियां अब अपराध स्थलों का मुआयना करने के लिए एक बेहद आधुनिक तरीके की तरफ कदम बढ़ा रही हैं। घटनास्थल को सुरक्षित रखने और सबूतों को लंबे समय तक सहेजने के लिए अब FARO 3D लेजर स्कैनर का उपयोग किया जा रहा है। यह नई तकनीक पुलिस को एक ऐसा डिजिटल मॉडल तैयार करने की सुविधा देती है, जिसे जरूरत पड़ने पर जांच अधिकारी कभी भी अपने कंप्यूटर पर दोबारा देख और परख सकते हैं। इससे असली घटनास्थल के साफ होने के बाद भी पूरी जगह का एक वर्चुअल रिकॉर्ड हमेशा मौजूद रहता है।
कैसे काम करती है LiDAR तकनीक
डेवेल लाइफ साइंसेज की प्रतिनिधि अवनी ने इस पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह अत्याधुनिक स्कैनर मुख्य रूप से LiDAR तकनीक के जरिए काम करता है, जो पूरे अपराध स्थल को तीन आयामों (3D) में रिकॉर्ड करने में सक्षम है। किसी भी संवेदनशील जगह पर पहुंचने के बाद इस मशीन को एक खास बिंदु पर सेट किया जाता है। चालू होने के बाद यह उपकरण अपने आप चारों दिशाओं में घूमता है और उस जगह का कोना-कोना स्कैन कर लेता है। अगर जांच का दायरा बहुत बड़ा है या जगह काफी फैली हुई है, तो फोरेंसिक टीम इस मशीन को अलग-अलग स्थानों पर रखकर कई बार स्कैनिंग पूरी करती है। इसके बाद एक खास सॉफ्टवेयर इन सभी अलग-अलग स्कैन को आपस में जोड़ देता है, जिससे पूरे इलाके का एक सटीक और विस्तृत 3D मॉडल तैयार हो जाता है।
पुरानी जांच के तरीकों की कमियां
पहले पुलिस और जांच अधिकारियों को कई तरह की बुनियादी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। टीम को पूरे इलाके की तस्वीरें सामान्य कैमरे से लेनी होती थीं और हाथों से कागज पर घटनास्थल का स्केच तैयार करना होता था। इसके अलावा हर छोटी-बड़ी चीज की दूरी अलग से इंचटेप या फीते से नापनी पड़ती थी। इस पूरी थकाऊ प्रक्रिया में हमेशा यह डर बना रहता था कि कोई जरूरी नाप लेना छूट न जाए या लिखने में कोई मानवीय गलती न हो जाए। लेकिन यह नई मशीन पूरे इलाके का डेटा एक ही झटके में रिकॉर्ड कर लेती है। अगर जांच के दौरान काफी समय बीत जाने के बाद भी किसी अधिकारी को किसी जगह की दूरी या नया नाप दोबारा चाहिए, तो वह सॉफ्टवेयर के जरिए बहुत आसानी से उसे निकाल सकता है। इससे न सिर्फ अधिकारियों के समय की भारी बचत होती है, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया काफी आसान हो जाती है।
बड़े और हाई-प्रोफाइल मामलों में सफल
यह लेजर स्कैनर केवल एक सैद्धांतिक विचार नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल असल जिंदगी के मामलों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। अवनी के मुताबिक, देश के कई बेहद संवेदनशील और बड़े मामलों में इस तकनीक ने जांच अधिकारियों की बहुत मदद की है। पहलगाम हमले के अलावा तृषा केस और आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर मामले में भी घटनास्थल का 3D मॉडल इसी स्कैनर की मदद से बनाया गया था। इन सभी बड़े मामलों में डिजिटल मॉडल तैयार होने से पुलिस टीम को घटना के असली क्रम को बारीकी से समझने में काफी मदद मिली।
सटीकता और भविष्य की योजनाएं
यह स्कैनर बहुत ही भरोसेमंद आंकड़े सामने रखता है। अवनी के अनुसार यह तकनीक 99 प्रतिशत से ज्यादा सटीक नतीजे देने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने यह भी साफ किया कि दुनिया की कोई भी मशीन या तकनीक 100 प्रतिशत सही होने का दावा नहीं कर सकती, फिर भी इसके इस्तेमाल से जांच में होने वाली आम मानवीय गलतियां लगभग खत्म हो जाती हैं। आने वाले समय में इस सिस्टम के अंदर कई नए और आधुनिक फीचर भी जोड़े जाने वाले हैं, जिससे अपराधों की जांच प्रक्रिया को भविष्य में और भी ज्यादा बेहतर बनाया जा सकेगा।




















