राजस्थान के भीतर निकाय चुनावों का पारा चढ़ चुका है और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी तस्वीर पूरी तरह से साफ हो चुकी है। इस राजनीतिक हलचल के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाली नगर निगम की हो रही है, जहां कुल 65 वार्डों के लिए घमासान मचा हुआ है। इस बार महापौर का पद सामान्य महिला श्रेणी के लिए आरक्षित होने के कारण राजनीतिक दलों की रणनीति और समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं। हालांकि पाली को पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, क्योंकि पिछले चुनावों में पार्टी ने यहाँ के सभी स्थानीय निकायों पर अपना बोर्ड बनाया था। इसके बावजूद, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार अपनी स्थिति को मजबूत करते हुए सत्ताधारी पार्टी के विजय रथ को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
मदन राठौड़ का गृह जिला और राजनीतिक प्रतिष्ठा
इस चुनाव के केंद्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह जिला होने के कारण पार्टी की साख दांव पर लगी हुई है। मदन राठौड़ का इस क्षेत्र से गहरा राजनीतिक जुड़ाव रहा है, क्योंकि वह पाली जिले में तीन बार जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और सुमेरपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक भी चुने जा चुके हैं। अपने गृह जिले में एक बार फिर कमल का फूल खिलाना और पार्टी का परचम लहराना उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है। पाली के स्थानीय निकाय इतिहास पर नजर डालें तो यहाँ अब तक अलग-अलग समय पर 20 सभापति और 23 प्रशासक नियुक्त किए जा चुके हैं। आजादी के समय यह क्षेत्र नगर पालिका हुआ करता था, जिसे बाद में क्रमिक रूप से नगर परिषद और अंततः 2024 में नगर निगम का दर्जा दिया गया। निगम बनने के बाद रेखा राकेश भाटी यहाँ की पहली महापौर बनी थीं।
पाली निकाय का राजनीतिक इतिहास और सत्ता का उतार-चढ़ाव
पाली के राजनीतिक पटल पर समय-समय पर अलग-अलग दलों का वर्चस्व रहा है। वर्ष 1945 से लेकर 1992 तक पाली नगर पालिका पर मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी का दबदबा कायम रहा। इसके बाद दौर बदला और 1994 से 2004 के बीच भाजपा के टिकट पर ज्ञानचंद पारख और कुसुम सोनी ने नगर परिषद की कमान संभाली। फिर साल 2004 से 2014 के दशक में कांग्रेस पार्टी के प्रदीप हिंगड़ और केवल चंद्र गुलेचा सभापति के पद पर आसीन रहे। इसके बाद के वर्षों में, यानी 2014 से 2024 तक एक बार फिर सत्ता का पहिया घूमा और भाजपा के महेंद्र बोहरा तथा रेखा राकेश भाटी ने नगर परिषद की सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ली। पूरे प्रदेश के अन्य हिस्सों की तरह ही यहाँ भी 3 सितंबर को नाम वापसी की समय-सीमा समाप्त होने के बाद चुनावी मैदान की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो गई है, और दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं।
नामांकन रद्दीकरण और बागियों का बड़ा संकट
चुनावी समीकरणों के बीच दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों को बागियों के तेवरों से बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नामांकन पत्रों की जाँच के दौरान तकनीकी कारणों से कांग्रेस पार्टी के 6 उम्मीदवारों और भारतीय जनता पार्टी के 1 उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया गया था। इस फेरबदल के बाद अब कांग्रेस मैदान में 59 सीटों पर और भाजपा 64 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कुल 65 वार्डों के इस निकाय चुनाव में विभिन्न दलों और निर्दलियों को मिलाकर कुल 244 उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें से 118 उम्मीदवार पूरी तरह से निर्दलीय के रूप में ताल ठोक रहे हैं, जिससे दोनों पार्टियों का चुनावी गणित काफी हद तक बिगड़ गया है।
त्रिकोणीय मुकाबला और अन्य दलों की उपस्थिति
पाली नगर निगम के कुल 65 वार्डों में से कम से कम 20 वार्ड ऐसे हैं जहाँ दोनों ही दलों के बागी उम्मीदवारों ने अपनी ही पार्टियों के आधिकारिक प्रत्याशियों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इन वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेताओं की चिंताएँ काफी बढ़ी हुई हैं। इसके विपरीत, केवल 10 वार्ड ऐसे हैं जहाँ दोनों मुख्य दलों के बीच आमने-सामने की सीधी टक्कर होनी है, जबकि 22 वार्डों में महिला उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला तय किया गया है। इसके अलावा, इन चुनावों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के अन्य दलों के प्रतिनिधि भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, जिनमें आरएलपी का एक प्रत्याशी, आम आदमी पार्टी का एक प्रत्याशी और बीएपी का एक प्रत्याशी शामिल है। चूँकि यह पूरा क्षेत्र सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का गृह क्षेत्र है, इसलिए पूरे प्रदेश की निगाहें पाली नगर निगम के चुनावी नतीजों पर टिकी हुई हैं।


















