दौसा जिले में आगामी निकाय चुनाव को लेकर राजनीति गरमा गई है और चुनाव चिन्हों का आवंटन एक बड़े विवाद का कारण बन गया है। मैदान में उतरे कई निर्दलीय उम्मीदवारों ने उन्हें चप्पल का निशान मिलने पर कड़ा ऐतराज जताया है। इन प्रत्याशियों का तर्क है कि भारतीय समाज और चुनावी संस्कृति में इस चिन्ह को सकारात्मक या शुभ नहीं माना जाता है, जिसके कारण वे इसे बदलने की मांग कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि निर्वाचन आयोग को ऐसे प्रतीकों को अपनी सूची में शामिल ही नहीं करना चाहिए था या कम से कम इसे इस तरह प्राथमिकता पर नहीं रखना चाहिए था।
अलमारी और चप्पल का क्रम बना विवाद की वजह
निर्दलीय उम्मीदवारों के अनुसार, निर्वाचन आयोग द्वारा जारी की गई चुनाव चिन्हों की सूची में अलमारी को पहले स्थान पर रखा गया है और ठीक उसके बाद यानी दूसरे स्थान पर चप्पल का निशान है। आवंटन प्रक्रिया के दौरान इसी क्रम का कड़ाई से पालन किए जाने के कारण ज्यादातर निर्दलीय उम्मीदवारों के हिस्से में चप्पल का निशान आ रहा है। चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार की यह चाहत होती है कि उसे जनता के बीच जाने के लिए एक ऐसा प्रतीक मिले जिसे वह अपनी जीत के लिए अनुकूल और शुभ माने। लेकिन जब कई लोगों को मजबूरी में यही निशान थमा दिया गया, तो उनके बीच नाराजगी स्वतः ही फूट पड़ी।
प्रत्याशियों की मांग और प्रशासनिक नियम
नाराज प्रत्याशियों का साफ तौर पर कहना है कि यदि किसी भी उम्मीदवार ने अपनी पसंद के रूप में चप्पल का चयन नहीं किया है, तो उसे यह निशान जबरन नहीं दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि आवंटन की यह मौजूदा व्यवस्था उम्मीदवारों के हितों के खिलाफ है। नामांकन दाखिल करते वक्त कई लोगों ने अपनी पसंद के अन्य विकल्प भी भरे थे, लेकिन क्रम संख्या के नियमों के कारण उन्हें वे चिन्ह नहीं मिल पाए। इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उम्मीदवारों ने अधिकारियों से इस प्रक्रिया में बदलाव करने की गुहार लगाई है ताकि उनकी पसंद का ख्याल रखा जा सके।
रिटर्निंग अधिकारी ने स्थिति की स्पष्ट
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए दौसा की रिटर्निंग अधिकारी संजू मीणा ने स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि चुनाव चिन्हों का यह आवंटन किसी भी स्तर पर मनमाने तरीके से नहीं किया जा रहा है, बल्कि यह पूरी प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से तय की गई आधिकारिक गाइडलाइन के मुताबिक ही संचालित हो रही है। नियमों के अनुसार चिन्हों का आवंटन एक तय क्रम संख्या के आधार पर ही किया जाना अनिवार्य होता है, जिससे किसी भी तरह के फेरबदल की गुंजाइश नहीं बचती है।
क्यों आ रहा है चप्पल का निशान
प्रशासन की ओर से यह भी जानकारी दी गई है कि कई उम्मीदवारों ने अपने नामांकन पत्रों में ऐसे प्रतीकों का जिक्र कर दिया था जो राज्य निर्वाचन आयोग की अधिकृत 40 चुनाव चिन्हों की सूची में शामिल ही नहीं थे। ऐसे अमान्य या गैर-सूचीबद्ध विकल्पों के आधार पर चुनाव चिन्ह देना तकनीकी रूप से संभव नहीं था। यही वजह है कि सूची के निर्धारित क्रम का पालन करते हुए पहले आवेदक को अलमारी और उसके ठीक बाद आने वाले आवेदक को चप्पल का निशान आवंटित किया जा रहा है। एक तरफ जहां उम्मीदवार इस व्यवस्था से असहज महसूस कर रहे हैं और विरोध दर्ज करा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन आयोग के नियमों का हवाला देकर अपनी स्थिति साफ कर रहा है।


















