स्वीडन के गोथेनबर्ग शहर में हुए एक अनोखे हैकाथॉन ने यह साबित कर दिया है कि साधारण लैपटॉप पर लिखे कोड से 14 टन भारी व्यावसायिक ट्रक को भी चलाया जा सकता है। 'हैक-अ-ट्रक' नाम की इस प्रतियोगिता में छात्रों ने पायथन, रस्ट और C++ जैसी प्रचलित प्रोग्रामिंग भाषाओं का उपयोग करके वॉल्वो ट्रक के ब्रेक, स्टीयरिंग और एक्सीलेरेटर जैसी बुनियादी प्रणालियों पर पूरा नियंत्रण हासिल किया।
33 टीमों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा और सख्त नियम
इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कुल 33 टीमों ने आवेदन किया था, जिनमें से केवल तीन सर्वश्रेष्ठ टीमों को चुना गया। प्रत्येक चुनी गई टीम में तीन-तीन छात्र शामिल थे। प्रतियोगिता का ढांचा बेहद चुनौतीपूर्ण था। हर टीम को ट्रक पर अपना कोड चलाने और उसे परखने के लिए मैदान में केवल 20 मिनट का समय दिया गया। इसके बाद कोड में पाई गई गलतियों को सुधारने और नए निर्देशों को जोड़ने के लिए छात्रों को एक घंटे का समय दिया गया।
डिजिटल गिटार से स्टीयरिंग और विजेता टीम की सफलता
प्रतियोगिता के दौरान छात्रों ने वाहन को नियंत्रित करने के लिए बेहद अनोखे और रचनात्मक तरीके अपनाए। कुछ टीमों ने एक्सबॉक्स कंट्रोलर और डिजिटल गिटार का प्रयोग किया। एक टीम ने तो गिटार की धुनों से ट्रक का स्टीयरिंग घुमाकर सभी को हैरान कर दिया। हालांकि, अंतिम बाजी यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग की टीम ने मारी, जिसमें रियाद संतिर, वैलेंटीना र्रुस्टेम और वेसाम अल-जोएनात शामिल थे। इस विजेता टीम का कोड ट्रक को सीधी रेखा में चलाने के साथ-साथ पूरे एक गोल घेरे में सफलतापूर्वक घुमाने में कामयाब रहा।
सटीक टाइमिंग और कर्नल क्लॉक का कमाल
इस प्रयोग की सबसे बड़ी चुनौती ट्रक के एक्सीलेरेटर को सटीक समय पर संदेश भेजना था, जिसके लिए मिलीसेकंड स्तर की शुद्धता आवश्यक थी। अगर समय में जरा सा भी अंतर आता तो वाहन का सिस्टम कमांड को स्वीकार नहीं करता। विजेता छात्रों ने अपने प्रोग्राम को कर्नल क्लॉक के साथ लॉक करके इस जटिलता को हल किया। इस सटीक टाइमिंग की बदौलत उन्होंने स्वचालन के तहत आगे और पीछे गाड़ी चलाना, जीपीएस आधारित वृत्ताकार मोड़, सीधी रेखा क्रूज़ नियंत्रण और PS4 कंट्रोलर से मैनुअल ड्राइविंग जैसे फीचर्स सफलतापूर्वक संचालित किए।
मार्गदर्शन, सुरक्षा नियम और विशेषज्ञ भूमिका
हैकाथॉन मैनेजर डॉ. श्रीजिता बासू ने मुख्य आयोजन से पहले छात्रों को दो दिनों का गहन प्रशिक्षण दिया। उन्होंने छात्रों को समझाया कि भारी ट्रक का आंतरिक ढांचा कैसे काम करता है, लैपटॉप से नेटवर्क संदेश कैसे भेजे जाते हैं और किसी अप्रत्याशित खराबी के समय सुरक्षा नियम क्या होने चाहिए। डॉ. बासू ने ट्रैक पर प्रत्येक टेस्ट रन की निगरानी की और निष्पक्ष विचार साझा करके तीन जजों को विजेता का फैसला करने में मदद की। डॉ. बासू पिछले दो वर्षों से चाल्मर्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी और यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग में पोस्टडॉक रिसर्चर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले उन्होंने IIIT कल्याणी से अपनी पीएचडी पूरी की थी और जादवपुर यूनिवर्सिटी में सीनियर रिसर्च इंजीनियर के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं।
किताबी ज्ञान से वास्तविक दुनिया की कोडिंग तक
कार्यक्रम के मुख्य आयोजक प्रोफेसर मिरोसलाव स्टारोन के अनुसार यह पहल छात्रों, शैक्षणिक संस्थानों और वाहन उद्योग तीनों के लिए अत्यंत फायदेमंद है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में भले ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता खुद कोड लिख सकती है, लेकिन वास्तविक मशीनों की जटिल समस्याओं को समझकर सरल और प्रभावी समाधान तैयार करना एक अनूठा कौशल है। चाल्मर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग के मास्टर्स और बैचलर्स छात्रों के लिए 14 टन के असली वाहन के साथ काम करने का यह अवसर उनके करियर और बायोडाटा के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि बनकर उभरा है।



















