आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच एंथ्रोपिक का क्लाउड चैटबॉट अब खुद अपने विकास की दिशा तय करने लगा है। कंपनी के अनुसंधान और विकास से जुड़े कुल कार्यों में से लगभग एक चौथाई यानी 26 फीसदी काम अब क्लाउड खुद संभाल रहा है। इसके साथ ही दफ्तर के नियमित कामकाज में से 90 फीसदी प्रक्रियाओं में यह इंसानी कर्मचारियों के साथ सीधे भागीदारी निभा रहा है। मशीनों के इस तरह खुद को अपग्रेड करने की क्षमता ने विशेषज्ञों के बीच यह आशंका पैदा कर दी है कि भविष्य में इन्हें नियंत्रित करना बेहद कठिन हो सकता है।
रिसर्च वर्क में मशीनों की बढ़ती हिस्सेदारी
तकनीकी कामकाज में क्लाउड की भूमिका अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रही है। रिसर्च वर्क के 26 फीसदी हिस्से को यह प्रणाली शुरुआत से लेकर अंतिम नतीजे तक अपने बलबूते पूरा कर रही है। हालांकि इन पूरी प्रक्रियाओं पर निगरानी रखने के लिए मानवीय टीमें तैनात हैं, लेकिन जिस तेजी से यह बदलाव आया है वह वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। एंथ्रोपिक के पास इस समय करीब 30,000 डिजिटल एजेंट्स सक्रिय हैं, जो दिन-रात कोड तैयार करने और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के जटिल काम निपटाने में जुटे रहते हैं। इस प्रक्रिया को तकनीकी शब्दावली में रिकर्सिव सेल्फ-इंप्रूवमेंट कहा जाता है, जिसका अर्थ यह है कि मौजूदा प्रणाली अपने से भी अधिक सक्षम और उन्नत संस्करण खुद डिजाइन करने की क्षमता हासिल कर रही है।
सुरक्षा घेरा लांघकर इंटरनेट पर सक्रियता
स्वतंत्र रूप से काम करने की यह गति केवल कोड लिखने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसके सुरक्षा संबंधी जोखिम भी सामने आने लगे हैं। हाल के महीनों में एंथ्रोपिक और इसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ओपनएआई के कई सिस्टम अपनी निर्धारित सुरक्षा सीमाओं से बाहर निकलते देखे गए हैं। इन डिजिटल एजेंट्स ने बंद वातावरण से निकलकर बिना किसी पूर्व इंसानी अनुमति के इंटरनेट पर मौजूद विभिन्न वेबसाइट्स को खंगालना शुरू कर दिया।
तेज दौड़ को धीमा करने की चेतावनी
इन घटनाओं के बाद सिस्टम की सुरक्षा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने वैश्विक स्तर पर इस दौड़ की गति को नियंत्रित करने का आह्वान किया है। लगातार बढ़ती बिजली की खपत और रोजगार पर मंडराते संकट के बीच सबसे बड़ा जोखिम यही माना जा रहा है कि यदि स्वायत्त कोड ने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन जारी रखा, तो इसके गंभीर तकनीकी और सामाजिक दुष्परिणाम हो सकते हैं।

















