तीन-तीन सेनाओं की सबसे मुश्किल चयन परीक्षाएं एक साथ पास करना और फिर उनमें से एक को अपना भविष्य चुनना — हैदराबाद की निधि अग्रवाल ने ठीक यही कर दिखाया। एयरफोर्स एकेडमी में हुई कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड के दौरान, जब फ्लाइट कैडेट्स की प्री-कमिशनिंग ट्रेनिंग पूरी होने का जश्न मनाया जा रहा था, तब उनके पिता सुधीर कुमार अग्रवाल की आंखों में गर्व के आंसू थे। उनकी बेटी अब देश की वर्दी पहनकर सेवा के लिए तैयार खड़ी थी।
एक साथ तीनों सेनाओं में जगह
निधि की उपलब्धि को असाधारण इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उन्होंने एक ही समय पर भारतीय थलसेना, नौसेना और वायु सेना — तीनों की चयन सूची में नाम दर्ज कराया। आंकड़े खुद उनकी प्रतिभा की कहानी कहते हैं:
- थलसेना में ऑल इंडिया रैंक 28
- नौसेना में ऑल इंडिया रैंक 9
- वायु सेना में ऑल इंडिया रैंक 6
तीनों दरवाजे खुले होने के बावजूद उन्होंने आसमान की राह चुनी और इंडियन एयर फोर्स को अपना रास्ता बनाया। यही फैसला उनकी कहानी को बाकी सबसे अलग बनाता है।
पिता के सपने और दो बेटियों की उड़ान
यह कामयाबी सिर्फ निधि की नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार के सोच की भी है। सुधीर कुमार अग्रवाल बताते हैं कि उनका परिवार हमेशा अपनी दोनों बेटियों के साथ मजबूती से खड़ा रहा। निधि की बड़ी बहन कोमल अग्रवाल ने पहले NCC ज्वाइन की थी और उसमें शीर्ष स्तर तक पहुंचकर परिवार और देश दोनों का नाम रोशन किया। बड़ी बहन ने जो रास्ता दिखाया, उस पर छोटी बहन ने और ऊंची उड़ान भरी।
हर्षिता को भी मिले पंख
इसी परेड में एक और जांबाज बेटी हर्षिता ने भी अपनी मंजिल पाई। उनकी मां अरुणा के मुताबिक, उनकी बेटी को अब 'पंख' मिल गए हैं। हर्षिता ने अपनी कठिन ट्रेनिंग के फेज 1 और फेज 2 को सफलतापूर्वक पूरा कर वायु सेना में अपनी उड़ान शुरू कर दी है। अरुणा ने एयरफोर्स एकेडमी की ट्रेनिंग की खुलकर तारीफ की और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सरकार की नीतियों के प्रति आभार जताया।
बदलती सोच, बदलता भारत
यह कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड केवल एक ट्रेनिंग के पूरा होने का आयोजन नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण है कि इंडियन आर्म्ड फोर्स में महिलाओं की भागीदारी और उनकी नेतृत्व क्षमता लगातार बढ़ रही है। निधि का एक साथ तीनों सेनाओं की परीक्षाओं में टॉप रैंक (AIR 28, 9 और 6) हासिल करना यह दिखाता है कि आज की बेटियां शारीरिक और मानसिक — दोनों स्तरों पर कितनी सक्षम हैं।
इस कहानी का दूसरा अहम पहलू परिवारों की बदलती मानसिकता है। सुधीर कुमार अग्रवाल और अरुणा जैसी माताओं-पिताओं का अपनी बेटियों को बिना किसी भेदभाव के फ्रंटलाइन पर भेजने का फैसला समाज के सामने एक नई मिसाल रखता है। जब अरुणा सरकार के प्रयासों और एकेडमी की ट्रेनिंग की सराहना करती हैं, तो साफ हो जाता है कि देश की बेटियां अब सिर्फ रक्षा क्षेत्र में दाखिल ही नहीं हो रहीं, बल्कि सबसे कठिन चरणों को पार कर खुद को साबित भी कर रही हैं। यह उस भारत की तस्वीर है जहां बेटियां घर की चौखट तक सीमित नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और आसमान की सुरक्षा का जिम्मा अपने कंधों पर उठा रही हैं।













