मध्य प्रदेश की पावन धरती पर आध्यात्मिक यात्रा की योजना बना रहे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए जबलपुर का माता त्रिपुर सुंदरी धाम आस्था का एक बड़ा केंद्र है। राजधानी भोपाल से करीब 350 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह पवित्र स्थल अपने शांत प्राकृतिक वातावरण, पहाड़ियों और हरी-भरी वादियों के बीच स्थित है। धार्मिक मान्यताओं में इस स्थान का महत्व बेहद खास माना गया है, क्योंकि कहा जाता है कि आदि पराशक्ति जगतजननी का पहला अंश माता त्रिपुर सुंदरी के स्वरूप में इसी पावन भूमि पर अवतरित हुआ था। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर में कदम रखते ही एक अनोखा अनुभव होता है, जहां एक वृक्ष पर काला नाग दिखाई देता है। भक्तजन इसे देवाधिदेव महादेव के आभूषण का साक्षात प्रतीक मानकर श्रद्धा से शीश नवाते हैं।
राजा कस्तूरी कर्ण ने रखी थी इस दिव्य मंदिर की नींव
ऐतिहासिक और पौराणिक विवरणों के मुताबिक, जबलपुर के इस सिद्ध पीठ का निर्माण भक्त राजा कस्तूरी कर्ण द्वारा करवाया गया था। मंदिर की ओर जाने वाला मार्ग प्राकृतिक दृश्यों और मनोरम छटा से भरपूर है, जो यहां आने वाले हर व्यक्ति के मन को गहरी शांति और दिव्यता से भर देता है। सनातन परंपरा में जगतजननी आदि पराशक्ति के कई अवतार लोक कल्याण और दीनों के उद्धार के लिए हुए हैं, जिनमें त्रिपुर सुंदरी का यह रूप अत्यंत मंगलकारी माना गया है। राजा कस्तूरी कर्ण ने जिस पावन भूमि पर इस मंदिर की स्थापना की, वह क्षेत्र आज भी अपनी अलौकिक आध्यात्मिक आभा और शांत ऊर्जा के लिए पहचाना जाता है। देश के विभिन्न प्रमुख शहरों से श्रद्धालु रेल मार्ग और सड़क मार्ग की सीधी बसों के जरिए यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।
पेड़ पर विराजित काला नाग और महादेव का दिव्य संबंध
मंदिर प्रांगण में प्रवेश करने से पहले ही भक्तों का ध्यान वहां मौजूद एक पुराने पेड़ की ओर जाता है, जिस पर एक काला नाग बैठा दिखाई देता है। धार्मिक आस्था के अनुसार, इस सर्प को भगवान शिव के आभूषण का प्रतीक माना गया है। स्थानीय मान्यताओं और भक्तों के अनुभवों के अनुसार यह नाग कभी किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस काले नाग के शांत दर्शन मात्र से ही उनके जीवन की सारी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और रुके हुए कार्य मंगलमय तरीके से पूरे हो जाते हैं। इस दिव्य अनुभूति को प्राप्त करने के बाद श्रद्धालु पूरे भक्तिभाव से आगे बढ़ते हैं।
गर्भगृह में पवित्र पादुकाएं और भगवान गणेश के दर्शन
वृक्ष पर नाग देवता के दर्शन करने के उपरांत श्रद्धालु ‘ॐ त्रिपुर सुंदरी मतारै नमः’ मंत्र का निरंतर जाप करते हुए मुख्य प्रांगण की ओर कदम बढ़ाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही भक्तों को सबसे पहले मां त्रिपुर सुंदरी की पवित्र पादुकाओं के दर्शन लाभ मिलते हैं, जहां शीश झुकाकर भक्त आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। इन पावन पादुकाओं के बिल्कुल समीप ही प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश (विनायक) की भव्य प्रतिमा भी स्थापित है। इस मंदिर में महिला श्रद्धालुओं के लिए कुमकुम और सिंदूर का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व माना गया है। ऐसा विश्वास है कि माता के चरणों से लगा कुमकुम सिंदूर के रूप में अपनी मांग में सजाने वाली सुहागिनों और महिलाओं को मां त्रिपुर सुंदरी का अखंड सौभाग्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
रंगीन कपड़े में नारियल बांधने की मन्नत और झूले की सवारी
त्रिपुर सुंदरी मंदिर में अपनी मनोकामनाओं को पूरा कराने के लिए वर्षों से एक खास परंपरा चली आ रही है। यहां आने वाले भक्त अपनी मन्नत मांगने के लिए एक सूखे नारियल को रंग-बिरंगे कपड़े में लपेटते हैं और फिर उसे पूरी श्रद्धा के साथ मंदिर परिसर में किसी स्थान पर बांध देते हैं। जब भक्तों की मांगी गई मुराद पूरी हो जाती है, तो वे दोबारा मंदिर आकर अपनी सामर्थ्य और श्रद्धानुसार भेंट अर्पित करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां को एक सुंदर झूले पर विराजमान कराकर उनकी भव्य सवारी भी निकालते हैं। झूले पर सवार माता की सवारी का यह अलौकिक दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। इस दौरान भक्तों को यह साक्षात अनुभूति होती है कि जगतजननी मां त्रिपुर सुंदरी स्वयं अपनी दिव्य लीलाओं से भक्तों का कल्याण कर रही हैं और उनसे यह सब करवा रही हैं।



















