भारतीय सिनेमा के जाने-माने अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को 75 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके चले जाने के बाद उनके लंबे और प्रभावशाली अभिनय सफर के कई यादगार प्रसंग प्रशंसकों के बीच फिर से ताजा हो गए हैं। ऐसा ही एक बेहद चर्चित वाकया उनकी 2016 की मशहूर मराठी फिल्म नटसम्राट से जुड़ा हुआ है। इस फिल्म में नाना पाटेकर ने गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर की भूमिका में ऐसा बेमिसाल अभिनय किया था कि दर्शकों के दिलो-दिमाग पर उसकी गहरी छाप छूट गई थी। हालांकि, एक समर्पित रंगकर्मी होने के बावजूद उन्होंने इस कालजयी नाटक को कभी भी मंच पर प्रस्तुत करने की हामी नहीं भरी थी। इस फैसले के पीछे की हैरान कर देने वाली वजह उन्होंने खुद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बताई थी।
नागपुर के कार्यक्रम में साझा किया था मंच से दूरी का रहस्य
नागपुर स्थित रेशिमबाग में आयोजित जल क्रांति परिषद के दौरान नाना पाटेकर ने अपने इस फैसले पर खुलकर बात की थी। उन्होंने श्रोताओं को बताया था कि रंगमंच पर इस अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक रूप से थका देने वाले चरित्र को बार-बार जीना उनकी शारीरिक सेहत के लिए घातक साबित हो सकता था। इसी गंभीर आशंका की वजह से उन्होंने इस नाटक को स्टेज पर खेलने से हमेशा दूरी बनाए रखी।
भावनात्मक खिंचाव और दिल के दौरे की आशंका
नाना पाटेकर के अनुसार, जब कोई अभिनेता किसी किरदार की गहराइयों में पूरी शिद्दत से उतरता है और उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है, तो उसे उस भूमिका के अंदर अपनी पूरी जिंदगी उड़ेलनी पड़ती है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि पूर्व में जिन-जिन अभिनेताओं ने रंगमंच पर नटसम्राट के मुख्य पात्र को निभाया था, उन सभी की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। उन्होंने साफ कहा था कि यदि वह भी स्टेज पर यह नाटक करते और उस पात्र में पूरी तरह विलीन हो जाते, तो शायद 25 शो पूरा करने के बाद उनकी भी हार्ट अटैक से मौत हो जाती। यही वह प्रमुख कारण था, जिसके चलते उन्होंने मंच के बजाय 2016 में रिलीज हुई फिल्म में यह भूमिका निभाना बेहतर समझा।
मंच पर इस भूमिका को अमर करने वाले पूर्व दिग्गज
अपनी चर्चा के दौरान नाना पाटेकर ने उन महान रंगकर्मियों का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिन्होंने बरसों तक स्टेज पर इस चुनौतीपूर्ण किरदार को जीवंत बनाए रखा था। इनमें डॉ. श्रीराम लागू, विक्रम गोखले, दत्ता भट और चंद्रकांत गोखले जैसे कद्दावर कलाकारों के नाम शामिल थे, जिन्होंने रंगमंच की दुनिया में इस नाटक के जरिए अमिट छाप छोड़ी थी।
कुसुमाग्रज के कालजयी नाटक की कथा और पात्र का दर्द
फिल्म नटसम्राट दरअसल लेखक कुसुमाग्रज के इसी नाम से रचे गए बेहद लोकप्रिय मराठी नाटक पर आधारित थी। कहानी के केंद्र में गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर हैं, जो अपने समय के एक शिखर रंगकर्मी थे और दुनिया भर में नटसम्राट के आदरणीय उपनाम से जाने जाते थे। कथा का आरंभ उस मोड़ से होता है जब गणपतराव रंगमंच को अलविदा कह देते हैं। संन्यास लेने के तुरंत बाद वह अपने जीवन भर की समस्त जमा-पूंजी और धन-दौलत अपने संतानों में बांट देते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि वह अपनी पत्नी कावेरी, जिनका किरदार मेधा मांजरेकर ने निभाया था, के साथ जीवन के बाकी वर्ष शांति और गरिमा के साथ बिताएंगे।
सहानुभूति की तलाश और अपनों की बेरुखी
संन्यास लेते ही गणपतराव का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। जिस पिता ने अपनी संतानों के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, उसी पिता और उनकी जीवनसंगिनी को अपने ही बच्चों के हाथों तिरस्कार, उपेक्षा और कटुता का सामना करना पड़ता है। यह कहानी एक ऐसे प्रख्यात थिएटर कलाकार की मार्मिक व्यथा सामने लाती है, जिसे कभी मंच पर तालियों की गूंज और अपार सम्मान मिलता था, परंतु वृद्धावस्था की देहरी पर वह अपनों के बीच ही पूरी तरह एकाकी और बेसहारा होकर रह जाता है। गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर के रूप में नाना पाटेकर का अभिनय उनके संपूर्ण जीवन का सबसे कालजयी और यादगार काम माना जाता है।


















