मानसून का मौसम झारखंड के पहाड़ी और जंगली इलाकों को नई जान दे देता है, और ऐसे ही दिनों में बोकारो तथा धनबाद की दामोदर सीमा पर स्थित नागदा का सत्खटिया वॉटरफॉल अपनी पूरी रंगत में आ जाता है। अगर बारिश के मौसम में किसी शांत और हरियाली से भरी जगह पर सुकून बिताना चाहते हैं, तो घने जंगलों और बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक साथ गिरते दो झरनों वाला यह स्थल आपकी सूची में होना चाहिए। यही वजह है कि बारिश के दिनों में दूर-दराज के इलाकों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।
बारिश में दोगुनी हो जाती है रौनक
बरसात आते ही इस झरने का रूप ही बदल जाता है। पानी का बहाव तेज होने के साथ दोनों झरनों की धार और मुखर हो उठती है, जिससे पूरे इलाके की खूबसूरती मानो दोगुनी हो जाती है। चारों ओर फैली हरियाली, बहता पानी और ऊंची चट्टानें मिलकर ऐसा दृश्य रचती हैं, जैसे किसी कलाकार ने अपने हाथों से कोई जीवंत पेंटिंग उकेर दी हो।
युवाओं का पसंदीदा फोटो प्वाइंट
झरने के ठीक सामने फैली विशाल चट्टानें यहां आने वालों के लिए सबसे चहेता फोटो ठिकाना बन चुकी हैं। खासकर युवा इन्हीं चट्टानों पर चढ़कर दोनों हाथ फैलाए ‘शाहरुख खान पोज’ में तस्वीरें और सेल्फी लेते हैं और अपने दिन को यादगार बना लेते हैं।
आखिर कैसे पड़ा ‘सत्खटिया’ नाम
सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं, इस झरने से जुड़ी एक दिलचस्प लोककथा भी इसे खास बनाती है। नागदा गांव के अर्जुन महतो बताते हैं कि इस जलप्रपात के पास दामोदर नदी के किनारे एक बेहद गहरा गड्ढा है। पुरानी मान्यता है कि कभी इस गड्ढे की गहराई नापने के लिए सात खटियाओं की रस्सियों को आपस में जोड़ना पड़ गया था। इसी किस्से से इस जगह का नाम ‘सत्खटिया वॉटरफॉल’ पड़ गया। हालांकि, इसका कोई प्रमाण नहीं है और यह महज लोकमान्यता भर है।
कैसे पहुंचें और किन बातों का रखें ध्यान
सत्खटिया वॉटरफॉल बोकारो के तेलमच्चो ब्रिज से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर है, जहां तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। रास्ता खोजने में दिक्कत हो तो गूगल मैप की मदद ली जा सकती है। लेकिन एक चेतावनी जरूर याद रखें — मानसून में यहां की चट्टानें फिसलन भरी हो जाती हैं और जलधारा भी तेज रहती है, इसलिए झरने के आसपास घूमते वक्त पूरी सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।













