सर्दियों के आगमन के साथ ही गढ़वाल हिमालय की ढलानें बर्फ से ढक जाती हैं। अगर साल के अंतिम महीने में बर्फीली वादियों के बीच पैदल चलने और शांत प्राकृतिक माहौल का अनुभव लेने की योजना बन रही है, तो उत्तराखंड का कुआरी पास एक शानदार विकल्प साबित होता है। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित यह रास्ता साहसी यात्रियों को दूर तक फैले बर्फ के मैदानों, घने जंगलों और जमी हुई झीलों के बीच से ले जाता है। यहां की यात्रा में न केवल हिमालय की प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं को निहारने का अवसर मिलता है, बल्कि स्थानीय पहाड़ी संस्कृति को भी करीब से महसूस किया जा सकता है।
कुआरी पास मार्ग से जुड़े मुख्य आकर्षण और ऐतिहासिक पहलू
इस रोमांचक मार्ग की अपनी एक ऐतिहासिक पहचान भी है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने इस पगडंडी पर सफर किया था, जिसके चलते इसे कर्जन ट्रेल के नाम से भी जाना जाता है। इस वजह से यहां कदम रखने वाले ट्रेकर्स को प्राकृतिक छटा के साथ इतिहास के पन्नों से रूबरू होने का मौका मिलता है।
चारों ओर सफेद चादर की तरह फैली बर्फ के बीच से गुजरते हुए यात्री भारत की सबसे प्रतिष्ठित पर्वत चोटियों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। इस सफर के दौरान नंदा देवी, कामेट, चौखंबा, द्रोणागिरी, चांगबांग, नीलकंठ और कुंती भंडार जैसी विशाल चोटियों के अलग-अलग कोणों से मनोरम नजारे सामने आते हैं। जैसे-जैसे ऊंचाई और रास्ते बदलते हैं, वैसे-वैसे पहाड़ों की रूपरेखा भी नए रूप में दिखाई देती है।
यह पूरा क्षेत्र नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के समीप स्थित है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शुमार है। यहां के ऊंचे देवदार और ओक के जंगल, प्राकृतिक वन्य जीवन और शुद्ध आबोहवा इस पूरे सफर को बेहद खास बना देते हैं। रास्ते में तुगासी और अपर तुगासी जैसे पारम्परिक गढ़वाली गांव भी पड़ते हैं, जहां के काष्ठ कला वाले पारंपरिक घर और स्थानीय लोगों की जीवनशैली पर्यटकों को आकर्षित करती है।
इस मार्ग पर स्थित ताली झील भी आकर्षण का एक बड़ा केंद्र है। कड़ाके की ठंड में इस प्राकृतिक जलाशय का पानी जमने लगता है, जिसके चारों तरफ बर्फीली चोटियों का प्रतिबिंब बेहद मनमोहक लगता है। इसके अलावा पिपलकोटी जैसे निचले ठहराव स्थलों पर रात के समय प्रदूषण मुक्त आसमान में चमकते तारों को देखना एक अनोखा अहसास कराता है। रास्ते की स्थिति और मौसम अनुकूल रहने पर वापसी के समय स्कीइंग के लिए मशहूर औली की यात्रा का अवसर भी मिल जाता है।
सफर के प्रमुख पड़ाव: जंगल, दर्रा और बर्फीले बुग्याल
इस पूरे मार्ग को कई खूबसूरत हिस्सों में बांटा जा सकता है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी प्राकृतिक विशेषताएं हैं।
तुगासी का ग्रामीण इलाका
पैदल सफर की औपचारिक शुरुआत तुगासी बस्ती से होती है। यहां से आगे बढ़ते ही चढ़ाई शुरू होती है और रास्ता ओक के घने पेड़ों के बीच ले जाता है। ठंड के दिनों में पेड़ों की टहनियों पर जमी बर्फ रास्ते को किसी तिलिस्मी कहानी जैसा रूप दे देती है।
ताली का घना वन क्षेत्र
आगे की चढ़ाई में ताली का जंगल आता है, जहां चीड़ और ओक के विशालकाय पेड़ चारों ओर फैले हैं। जमीन पर जमी ठोस बर्फ और शाखाओं से छनकर आती धूप के बीच चलना एक बिल्कुल अलग ही दुनिया का अहसास कराता है। इस जंगल का सन्नाटा शहरी शोरगुल से दूर प्रकृति के बेहद करीब ले आता है।
कुआरी पास शिखर
लगभग 3,900 मीटर यानी करीब 12,750 फीट की ऊंचाई पर स्थित कुआरी पास इस पूरे अभियान का चरम बिंदु है। कई घंटों की लगातार चढ़ाई और शारीरिक श्रम के बाद जब कोई इस दर्रे पर पहुंचता है, तो सामने हिमालय का 360 डिग्री खुला विस्तार नजर आता है। चारों तरफ फैली विशाल हिम चोटियां इस चढ़ाई की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती हैं।
गोरसों बुग्याल
लौटते वक्त गोरसों बुग्याल से होकर गुजरना होता है। स्थानीय भाषा में बुग्याल का अर्थ ऊंचाई पर स्थित घास के हरे मैदान से होता है। हालांकि ठंड के महीनों में यह पूरी मखमली घास बर्फ के नीचे छिप जाती है। इस सपाट विस्तार से नंदा देवी शिखर का स्पष्ट और भव्य रूप दिखाई देता है।
छह दिवसीय यात्रा का चरणबद्ध कार्यक्रम
इस रोमांचक ट्रेक को पूरा करने के लिए एक सुव्यवस्थित छह दिवसीय रूपरेखा अपनाई जाती है, ताकि शरीर ऊंचाई और ठंड के अनुसार ढल सके।
पहला दिन: ऋषिकेश से पिपलकोटी
यात्रा की शुरुआत मैदानी इलाके के छोर ऋषिकेश से सड़क मार्ग द्वारा होती है। अलकनंदा नदी की घाटी से होते हुए लगभग 9 से 10 घंटे के पहाड़ी सफर के बाद पिपलकोटी पहुंचा जाता है। लगभग 1,350 मीटर (4,400 फीट) की ऊंचाई पर स्थित पिपलकोटी इस ट्रेक का बेस कैंप बनता है। यहां पहुंचकर अगले दिन के लिए जरूरी साजो-सामान और परिवहन की व्यवस्था की समीक्षा की जाती है।
दूसरा दिन: पिपलकोटी से गुलिंग टॉप
दूसरे दिन पिपलकोटी से लगभग 50 किलोमीटर की सड़क यात्रा तय करके तुगासी गांव तक पहुंचा जाता है। तुगासी से वाहनों का रास्ता खत्म होता है और पैदल पगडंडियां शुरू होती हैं। यहां से करीब 3 किलोमीटर की सीधी चढ़ाई पार करने के बाद गुलिंग टॉप पर पहला कैंप स्थापित होता है, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2,850 मीटर है। रात का समय इसी कैंपसाइट पर तंबुओं में बीतता है।
तीसरा दिन: गुलिंग टॉप से ताली फॉरेस्ट कैंप
तीसरे दिन की चढ़ाई यात्रियों को लगभग 3,350 मीटर यानी 11,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित ताली फॉरेस्ट कैंप तक ले जाती है। चीड़ और बांज के जंगलों से गुजरते हुए रास्ता लगातार ऊपर चढ़ता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ ही हवा पतली होने लगती है और बर्फीली चोटियां और अधिक विशाल नजर आने लगती हैं। रात का विश्राम इसी वन शिविर में होता है।
चौथा दिन: ताली फॉरेस्ट से कुआरी पास और वापसी
यह पूरे अभियान का सबसे कठिन और महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, जिसमें कुल 10 से 11 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है। रास्ते में 3,650 मीटर (12,000 फीट) पर स्थित खुलारा टॉप आता है, जिसके बाद अंतिम चढ़ाई पार कर यात्री 3,900 मीटर (12,750 फीट) ऊंचे कुआरी पास पर कदम रखते हैं। शिखर पर समय बिताने के बाद सुरक्षित रूप से बेस कैंप की ओर वापसी शुरू की जाती है।



















