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बागेश्वर के इस गांव में 700 रुपये में मिलता है पहाड़ी होमस्टे, नामिक ग्लेशियर ट्रेक जाने वालों के लिए बना पड़ावयात्रा
2 घंटे पहले· 0

बागेश्वर के इस गांव में 700 रुपये में मिलता है पहाड़ी होमस्टे, नामिक ग्लेशियर ट्रेक जाने वालों के लिए बना पड़ाव

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसे लीती गांव में लक्ष्मण सिंह कोरंगा का होमस्टे पर्यटकों को पहाड़ी खानपान, सस्ती दरों और नामिक ग्लेशियर ट्रेक की सुविधा के साथ आकर्षित कर रहा है।

पहाड़ों की गोद में बसा एक छोटा सा गांव अब उत्तराखंड के पर्यटन नक्शे पर तेजी से अपनी जगह बना रहा है। बागेश्वर जिले का लीती गांव समुद्र तल से करीब 2000 मीटर ऊपर स्थित है और यहां की हरी-भरी वादियां, सीढ़ीदार खेत तथा बर्फ से लदी हिमालय की चोटियां देखने वालों को ठहरने पर मजबूर कर देती हैं।

यह गांव सिर्फ अपने नजारों की वजह से ही मशहूर नहीं है। पिछले कुछ सालों में यहां पर्यटकों की आवाजाही लगातार बढ़ी है, क्योंकि मशहूर नामिक ग्लेशियर ट्रेक का रास्ता भी यहीं से शुरू होता है। इस वजह से हर सीजन में देश-विदेश से बड़ी संख्या में ट्रेकर और प्रकृति के शौकीन इस गांव में कदम रखते हैं और यहीं से आगे की चढ़ाई शुरू करते हैं।

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लक्ष्मण सिंह कोरंगा का घर बना पर्यटकों का ठिकाना

इसी गांव के रहने वाले लक्ष्मण सिंह कोरंगा ने अपने ही घर को होमस्टे में बदल दिया है। जो पर्यटक होटल के कमरे की बजाय गांव के असली जीवन को करीब से देखना चाहते हैं, उनके लिए यह जगह किसी खास ठिकाने से कम नहीं है। लक्ष्मण सिंह कोरंगा बताते हैं कि उनके यहां ठहरने वाले हर मेहमान का स्वागत पारंपरिक पहाड़ी तौर-तरीके से किया जाता है, ताकि उन्हें अपने घर जैसा माहौल मिल सके।

लकड़ी के चूल्हे पर बनता है असली पहाड़ी खाना

इस होमस्टे की जान यहां परोसा जाने वाला स्थानीय भोजन है। लक्ष्मण सिंह कोरंगा के अनुसार मेहमानों की थाली में मंडुवे की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, झंगोरे की खीर और आलू के गुटके जैसे पहाड़ी पकवान परोसे जाते हैं। इसके साथ मौसम के हिसाब से मिलने वाली हरी सब्जियां और गांव में ही उगाई गई ताजा उपज से बना खाना भी मिलता है। यह सारा भोजन लकड़ी के पारंपरिक चूल्हे पर तैयार होता है, जिसका स्वाद पर्यटकों को पहाड़ी जीवन की सादगी से रूबरू करा देता है।

जेब पर हल्का, सुकून पर भारी

ठहरने का खर्च भी यहां किसी को परेशान नहीं करता। एक बेड के लिए 700 रुपये और पूरा कमरा चाहिए तो 1000 रुपये चुकाने होते हैं। साफ कमरे, शांत माहौल और परिवार जैसा व्यवहार ऐसी चीजें हैं जो पर्यटकों को बार-बार यहां खींच लाती हैं। सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाहट, खेतों की ओर बढ़ते ग्रामीण और चारों तरफ फैली प्रकृति इस ठहराव को यादगार बना देती है।

सिर्फ ठहरना नहीं, गांव की जिंदगी जीना

लक्ष्मण सिंह कोरंगा के मुताबिक जो पर्यटक चाहें, वे यहां की रोजमर्रा की गतिविधियों में भी शामिल हो सकते हैं। खेतों में टहलना, गांव वालों से बातचीत करना, पारंपरिक खेती के तरीकों को नजदीक से देखना और पहाड़ी जीवनशैली को समझना, यह सब मिलकर इस अनुभव को खास बना देते हैं। जो लोग नामिक ग्लेशियर ट्रेक पर निकलते हैं, उनके लिए यह होमस्टे एक आरामदायक पड़ाव की तरह काम आता है, जहां आगे की मुश्किल चढ़ाई से पहले सुकून से रुका जा सकता है।

गांव के युवाओं को मिला रोजगार का जरिया

होमस्टे के जरिए चल रहे इस पर्यटन ने गांव में रोजगार के नए दरवाजे भी खोले हैं। स्थानीय युवाओं को अब अपने ही गांव में कमाई का मौका मिल रहा है और उन्हें शहर की ओर पलायन नहीं करना पड़ रहा। दूसरी तरफ पर्यटकों को भी उत्तराखंड की संस्कृति, खानपान और आतिथ्य को बेहद करीब से जानने का मौका मिल रहा है। अगर आप भी शहर की भागदौड़ से कुछ दिन दूर रहकर प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताना चाहते हैं, तो बागेश्वर का लीती गांव और यहां का यह होमस्टे आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।

सवाल-जवाब

लीती गांव कहां स्थित है?
लीती गांव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में समुद्र तल से करीब 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसा है।
यहां होमस्टे कौन चलाता है?
स्थानीय निवासी लक्ष्मण सिंह कोरंगा अपने घर पर ही यह होमस्टे चलाते हैं।
होमस्टे में ठहरने का किराया कितना है?
एक बेड के लिए 700 रुपये और पूरे कमरे के लिए 1000 रुपये चुकाने होते हैं।
यहां किस तरह का खाना मिलता है?
मंडुवे की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, झंगोरे की खीर, आलू के गुटके जैसे पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन लकड़ी के चूल्हे पर बनाकर परोसे जाते हैं।
लीती गांव का नामिक ग्लेशियर ट्रेक से क्या संबंध है?
मशहूर नामिक ग्लेशियर ट्रेक की शुरुआत इसी गांव से होती है, इसलिए यह ट्रेकरों के लिए एक सुविधाजनक पड़ाव है।
क्या पर्यटक गांव की गतिविधियों में भी शामिल हो सकते हैं?
हां, पर्यटक खेतों की सैर, स्थानीय लोगों से बातचीत और पारंपरिक खेती को नजदीक से देख सकते हैं।
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