रामेश्वरम के साधारण परिवार में 15 अक्टूबर 1931 को जन्मे अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जीवन इस बात की मिसाल है कि पारिवारिक तंगहाली कभी बड़े सपनों की राह में बाधा नहीं बन सकती। अपने बचपन में घर की आर्थिक मदद के उद्देश्य से समाचार पत्र बांटने वाले कलाम ने आगे चलकर विज्ञान और रक्षा अनुसंधान में जो कीर्तिमान रचे, उसने समूचे भारत को नई पहचान दी। देश के अंतरिक्ष अनुसंधान और मिसाइल कार्यक्रमों को विश्वस्तरीय ऊंचाई पर ले जाने के बाद वे 25 जुलाई 2002 से 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे। उनकी समूची जीवन यात्रा छात्रों, कामकाजी पेशेवरों और आम नागरिकों के लिए प्रेरणादायक मार्गदर्शिका का काम करती है।
सीखने की ललक को कभी मंद न पड़ने दें
कलाम का बचपन बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में गुजरा। परिवार पर आए आर्थिक संकट को दूर करने के लिए उन्हें बहुत छोटी आयु में ही अखबार बांटने का काम हाथ में लेना पड़ा। काम के भारी दबाव और सीमित संसाधनों के बीच भी उन्होंने अपनी शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। भौतिक विज्ञान में बुनियादी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दाखिला लिया और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता हासिल की। यह अनुभव दिखाता है कि पारिवारिक या सामाजिक जिम्मेदारियों के बोझ के नीचे अपनी सीखने की इच्छा को कभी दबने नहीं देना चाहिए। समय का अभाव होने पर भी व्यक्ति को नए कौशल और ज्ञान के विस्तार के लिए निरंतर प्रयास जारी रखना चाहिए।
कल्पना को स्पष्ट लक्ष्य में ढालने की कला
बचपन में आसमान में उड़ते परिंदों को देखना और उड़ने की तकनीक समझना कलाम की सबसे बड़ी रुचि थी। उनके अध्यापक शिवसुब्रमण्यम अय्यर ने कक्षा के दौरान पक्षियों की प्राकृतिक उड़ान का सजीव उदाहरण देकर यह समझाया था कि उड़ान कैसे संभव होती है। उस यादगार घटना ने बालक कलाम के मन में विमानन विज्ञान के प्रति ऐसी रुचि जगाई कि उन्होंने आगे चलकर एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को ही अपनी मुख्य विधा बनाया। किसी भी ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए मात्र कल्पना में खोए रहना पर्याप्त नहीं होता। उस सपने को धरातल पर उतारने के लिए सटीक विषय चुनना, लगातार पसीना बहाना और प्रतिदिन कुछ नया सीखने की प्रतिबद्धता अनिवार्य होती है।
शुरुआती झटके को जीवन का अंत न समझें
कलाम के पेशेवर सफर में ऐसे कई मोड़ आए जब उन्हें अपनी योजनाओं के विपरीत अप्रत्याशित परिणामों का सामना करना पड़ा। उनका सबसे बड़ा सपना भारतीय वायुसेना में बतौर लड़ाकू पायलट शामिल होने का था, लेकिन चयन प्रक्रिया में वे अंतिम पड़ाव पर सफल नहीं हो सके। इस गहरे झटके के बाद भी उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरी ऊर्जा झोंक दी। किसी एक प्रतियोगी परीक्षा, साक्षात्कार या नौकरी में हाथ लगी असफलता इस बात का प्रमाण नहीं होती कि आपके भीतर सामर्थ्य की कमी है। कई बार मार्ग का यह अप्रत्याशित बदलाव ही व्यक्ति को उसके वास्तविक और बड़े मुकाम की ओर ले जाता है।
गड़बड़ी से भागने के स्थान पर उसके कारणों की पड़ताल
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो में जब कलाम के नेतृत्व में सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल SLV-3 का पहला प्रायोगिक परीक्षण 1979 में किया गया, तो रॉकेट अपने तय लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा। उस नाजुक मोड़ पर तत्कालीन इसरो प्रमुख सतीश धवन ने विफलता का पूरा ठीकरा अपने सिर लिया और टीम की ढाल बने। पूरी टीम ने खामियों को दूर किया और 18 जुलाई 1980 को अगले परीक्षण में रोहिणी उपग्रह को सफलता के साथ धरती की कक्षा में स्थापित कर दिखाया। कलाम ने इस घटना को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा प्रशासनिक पाठ माना। जब भी कोई गलती या असफलता सामने आए, तो उससे मुंह चुराने के बजाय उसकी तह में जाकर खामियों को ठीक करना चाहिए क्योंकि यही सुधार भविष्य की कामयाबी की नींव रखता है।
उपलब्धि का सेहरा पूरी टीम के माथे बांधना
SLV-3 अभियान के दौरान देखने को मिला नेतृत्व का संतुलन कलाम की कार्यशैली का अभिन्न अंग बन गया। जब 1979 में अभियान असफल हुआ तो सतीश धवन ने सार्वजनिक रूप से जिम्मेदारी ली, लेकिन 1980 में रोहिणी उपग्रह के सफल प्रक्षेपण का जश्न मनाते समय उन्होंने कलाम और उनकी पूरी टीम को मीडिया के सामने आगे कर दिया। कलाम ने हमेशा यह माना कि एक उत्कृष्ट नेतृत्वकर्ता केवल आगे रहकर दिशा ही नहीं दिखाता, बल्कि संकट के पलों में अपनी टीम के आगे चट्टान बनकर खड़ा होता है। जब भी किसी सामूहिक कार्य में कामयाबी मिले, तो उसमें पसीना बहाने वाले हर सहयोगी के योगदान को खुलकर स्वीकार करना चाहिए।
बातों की बजाय काम की गुणवत्ता से बनाएं पहचान
इसरो में सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल के विकास के बाद कलाम ने डीआरडीओ का रुख किया, जहां उन्होंने भारत के स्वदेशी मिसाइल विकास कार्यक्रम की बागडोर संभाली। अग्नि और पृथ्वी जैसी आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइलों के सफल निर्माण और परीक्षण में उनके योगदान ने भारत को सामरिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के कारण उन्हें पूरे देश में ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में व्यापक प्रतिष्ठा मिली। अपनी योग्यता और क्षमता का बखान केवल शब्दों से करने के स्थान पर उसे परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन और सौंपी गई जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाना ही विश्वसनीयता हासिल करने का सबसे मजबूत मार्ग है।
शीर्ष पद पर पहुंचकर भी सादगी और विनम्रता को न छोड़ना
कलाम ने 25 जुलाई 2002 को देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और वर्ष 2007 तक इस गरिमामय पद की मर्यादा को बढ़ाया। एक साधारण वैज्ञानिक से उठकर रायसीना हिल्स के सर्वोच्च भवन तक पहुंचने के बाद भी उनकी दिनचर्या, सादगी और युवा वर्ग के साथ उनका सीधा संवाद कभी नहीं बदला। वे हर वर्ग के नागरिकों के बीच बेहद सहज और सुलभ रहे। जब भी जीवन में उच्च पद, पदवी या यश प्राप्त हो, तो मनुष्य को अपने आचरण और व्यवहार में अहंकार को जगह नहीं देनी चाहिए। हर किसी के साथ आदरपूर्वक मिलना और अपनी पुरानी जड़ों को स्मरण रखना ही वास्तविक बड़प्पन की निशानी है।
अपनी सफलता का लाभ पूरे समाज और देश तक पहुंचाना
कलाम के दृष्टिकोण में विज्ञान मात्र शोध प्रयोगशालाओं और बंद कमरों तक सीमित रहने का विषय नहीं था। उनका दृढ़ विश्वास था कि वैज्ञानिक नवाचारों का सीधा लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति और राष्ट्र निर्माण को मिलना चाहिए। उन्होंने देश को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी विजन 2020 का खाका तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसमें भारत के सर्वांगीण विकास की दीर्घकालिक रूपरेखा बनाई गई थी। किसी भी इंसान को अपनी उच्च शिक्षा, अनुभवों और प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसके ज्ञान से आम लोगों का जीवन कैसे सुगम और उन्नत बन सकता है।
सीखने और दूसरों को सिखाने का निरंतर प्रवाह
वर्ष 2007 में राष्ट्रपति पद का पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करने के उपरांत भी कलाम ने कभी विश्राम नहीं लिया। उन्होंने अन्ना यूनिवर्सिटी में मानद प्रोफेसर के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाना शुरू किया और देश के कोने-कोने में स्थित विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाकर लाखों छात्रों से सीधा संवाद साधा। उनका एकमात्र ध्येय देश की युवा पीढ़ी को बड़े सपने देखने और भारत को प्रगतिशील बनाने के लिए प्रेरित करना था। ज्ञान का भंडार तभी फलदायी होता है जब उसे आने वाली पीढ़ी के साथ साझा किया जाए। व्यक्ति की आयु अथवा उसका सामाजिक ओहदा चाहे जो भी हो, नया ज्ञान अर्जित करने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की ललक जीवन पर्यंत जीवित रहनी चाहिए।



















