बेंगलुरु में नर्सरी और प्राथमिक कक्षाओं में दाखिले की दौड़ के बीच एक ऐसा चौंकाने वाला चलन सामने आया है, जिसने आधुनिक समाज की सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के कुछ निजी शिक्षण संस्थानों में बच्चों को प्रवेश देने के लिए यह जांचा जा रहा है कि उनकी मां नौकरीपेशा हैं या गृहिणी। यदि मां बाहर नौकरी करती हैं, तो बच्चे का आवेदन निरस्त होने या सूची में पीछे छूट जाने का खतरा पैदा हो जाता है। दाखिले की इस अघोषित शर्त ने उन कामकाजी दंपतियों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपने बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश कर रहे हैं।
दाखिले की प्रक्रिया में मां की भूमिका पर अनौपचारिक शर्त
यह पूरा मामला तब चर्चा में आया जब एक अभिभावक ने अपनी ढाई साल की बेटी के लिए स्कूल तलाशने के दौरान मिले अनुभवों को सार्वजनिक किया। बनशंकरी क्षेत्र के कुछ जाने-माने स्कूलों में पूछताछ के दौरान उन्हें पता चला कि दाखिला फॉर्म में तो सब सामान्य नजर आता है, लेकिन चयन प्रक्रिया में एक अघोषित पैमाना लागू है। इस व्यवस्था के अंतर्गत केवल उन बच्चों के दाखिले को प्राथमिकता दी जाती है, जिनकी मां पूरी तरह घर पर रहकर परिवार की देखभाल करती हैं। कामकाजी महिलाओं के बच्चों के आवेदन सीधे तौर पर खारिज कर दिए जाते हैं या उन्हें प्रवेश सूची में जगह नहीं दी जाती।
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए संबंधित अभिभावक ने उन परिवारों से संपर्क किया जिनके बच्चे पहले से ही इन संस्थानों में अध्ययनरत हैं। बातचीत के दौरान यह बात एक खुले रहस्य की तरह सामने आई कि स्कूल प्रबंधन मां के गृहिणी होने को अनिवार्य प्राथमिकता मानता है। कुछ वरिष्ठ अभिभावकों ने तो नए आवेदकों को यह अनुचित रास्ता तक सुझा दिया कि अगर वे अपनी बच्ची का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं, तो आवेदन पत्र में मां के कामकाजी होने का विवरण छुपा लें या गलत जानकारी दर्ज कर दें। हालांकि, आवेदक अभिभावक ने साफ इनकार कर दिया कि वे झूठ की बुनियाद पर अपनी बेटी का शैक्षणिक सफर शुरू नहीं कराना चाहते।
हर साल निगरानी और पुरानी सोच का दायरा
अभिभावकों की चिंता केवल शुरुआती दाखिले तक ही सीमित नहीं है। इस व्यवस्था का सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्कूल प्रशासन हर शैक्षणिक सत्र में एक वार्षिक समीक्षा के जरिए मां के रोजगार की स्थिति की लगातार जांच करता है। स्कूल प्रबंधन की ओर से इसके पीछे यह तर्क पेश किया जाता है कि वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि घर पर बच्चे की पढ़ाई और दिनचर्या पर लगातार नजर रखने के लिए कौन उपलब्ध है। यह व्यवस्था सीधे तौर पर इस रूढ़िवादी धारणा को बढ़ावा देती है कि बच्चे के लालन-पालन और गृहकार्य की पूरी जिम्मेदारी केवल मां की ही होती है।
देश के प्रमुख तकनीकी केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाले बेंगलुरु जैसे प्रगतिशील शहर में इस तरह की मानसिकता का सामने आना कई लोगों को हैरान कर रहा है। अभिभावक समुदाय का स्पष्ट मानना है कि जो शैक्षणिक संस्थान महिलाओं के आत्मनिर्भर होने और उनके करियर को एक रुकावट के रूप में देखता है, वह अगली पीढ़ी को समानता और प्रगतिशीलता के क्या संस्कार देगा। सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर भी जताई गई कि कई परिवार बिना कोई विरोध किए इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था को सामान्य मानकर चुपचाप स्वीकार कर रहे हैं।
प्रबंधन के दोहरे मापदंडों और चुप्पी पर उठे कड़े सवाल
इस मुद्दे के सामने आने के बाद आम लोगों और अभिभावकों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। बड़ी संख्या में लोगों का कहना है कि स्कूलों की इस मनमानी को चुपचाप सहने के बजाय कानूनी और सामाजिक स्तर पर चुनौती दी जानी चाहिए। कई लोगों ने रेखांकित किया कि विवादों और कानूनी पचड़ों से बचने के लिए अभिभावक अक्सर समझौता कर लेते हैं, जिसका अनुचित लाभ ऐसे संस्थान उठाते हैं। कुछ लोगों ने मांग की कि ऐसे सभी स्कूलों की पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए और संबंधित शिक्षा विभाग में उनकी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए ताकि उन पर सख्त कार्रवाई हो सके।
इस पूरे मामले में स्कूलों के दोहरे चरित्र को भी आड़े हाथों लिया गया है। अभिभावकों ने सवाल उठाया कि इन स्कूलों में पढ़ाने वाली अधिकांश शिक्षिकाएं भी स्वयं माताएं हैं, जो पूरे समय नौकरी करते हुए अपने बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। ऐसे में यह तर्क पूरी तरह बेबुनियाद और विरोधाभासी है कि कामकाजी मां अपने बच्चे की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे सकती। लोगों का कहना है कि जब खुद स्कूल कामकाजी महिलाओं को बतौर शिक्षक नियुक्त करके चल रहे हैं, तो अन्य कामकाजी माताओं के बच्चों के प्रति इस तरह का भेदभाव किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।



















