मथुरा के निकट ब्रज क्षेत्र में स्थित गोवर्धन पर्वत को हिंदू आस्था में अत्यंत पावन और पूजनीय स्थान प्राप्त है। जब भी इस पर्वत की चर्चा होती है, भगवान श्रीकृष्ण की वह अलौकिक बाल लीला सहज ही याद आ जाती है जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठिका यानी सबसे छोटी उंगली पर पूरे पर्वत को उठा लिया था। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु गिरिराज जी के दर्शन करने और उनकी सप्तकोसीय परिक्रमा पूरी करने देश-विदेश से पहुंचते हैं। हालांकि इस पूज्य पर्वत की बनावट, इसके उद्भव और इससे जुड़े पवित्र सरोवरों को लेकर कई ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनसे अधिकांश लोग पूरी तरह परिचित नहीं हैं।
मोर की आकृति में बसा है पावन गिरिराज पर्वत
गोवर्धन पर्वत के भौगोलिक और आध्यात्मिक स्वरूप को लेकर एक बहुत ही अनोखी धार्मिक अवधारणा मानी जाती है। लोक मान्यताओं के अनुसार संपूर्ण गिरिराज पर्वत का आकार एक बैठे हुए मोर जैसा दिखाई देता है। इस मान्यता में पर्वत के विभिन्न पड़ावों और आसपास के धार्मिक स्थलों को मोर के शारीरिक अंगों के रूप में देखा जाता है। इसके अनुसार राधाकुंड और श्यामकुंड मोर की दोनों आंखों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं दानघाटी को मोर की गर्दन के रूप में और पूंछड़ी का लौठा नामक स्थल को मोर के सुंदर पंखों अथवा पूंछ के रूप में माना जाता है। इस प्रकार समूची परिक्रमा मोर की आकृति के इर्द-गिर्द मानी जाती है।
मन की शक्ति से गोवर्धन में अवतरित हुई मानसी गंगा
गोवर्धन धाम के हृदय स्थल में स्थित मानसी गंगा सरोवर के प्रकट होने के पीछे एक अत्यंत भावुक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार नंद बाबा और माता यशोदा की वृद्धावस्था में पवित्र गंगा नदी में स्नान करने की तीव्र अभिलाषा थी। उस समय गोकुल और ब्रज से गंगा तट तक की लंबी दूरी तय करना उनके शारीरिक स्वास्थ्य के लिहाज से काफी कठिन था। अपने माता-पिता की इस इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने योगबल और मन के संकल्प से गोवर्धन में ही मां गंगा का आह्वान कर उन्हें प्रकट कर दिया। चूंकि यह पवित्र जलधारा भगवान श्रीकृष्ण के मन के संकल्प से प्राकट्य में आई थी, इसलिए इस पावन सरोवर का नाम मानसी गंगा पड़ा।
राधाकुंड और श्यामकुंड के निर्माण की अद्भुत गाथा
वैष्णव परंपरा में राधाकुंड और श्यामकुंड का स्थान सर्वोच्च माना गया है और इनके निर्माण की कथा भी अत्यंत रोचक है। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने कंस द्वारा भेजे गए अरिष्टासुर नामक राक्षस का संहार किया था, जिसने एक विशाल बैल का रूप धारण कर रखा था। गोवंश के वध के दोष निवारण के लिए श्रीराधा रानी ने श्रीकृष्ण से समस्त तीर्थों के पवित्र जल में स्नान करने का आग्रह किया। तब श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी के प्रहार से धरती को छूकर तुरंत एक कुंड तैयार किया और समस्त पवित्र नदियों के जल को वहां बुलाकर श्यामकुंड की स्थापना की। इसके बाद श्रीराधा रानी और उनकी सखियों ने अपने हाथों के सुंदर कंगनों से पास ही एक अन्य कुंड का निर्माण किया, जिसे राधाकुंड कहा गया। समय बीतने के साथ दोनों कुंडों का पवित्र जल परस्पर एकाकार हो गया।
रामसेतु निर्माण और त्रेतायुग से जुड़ा विशेष प्रसंग
गोवर्धन पर्वत की महत्ता केवल द्वापर युग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक प्राचीन लोककथा इसे त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और वीर हनुमान जी से भी जोड़ती है। कथा के अनुसार जब लंका पर चढ़ाई के लिए समुद्र पर विशाल सेतु बनाया जा रहा था, तब वानर सेना को भारी शिलाओं और पर्वतों की आवश्यकता थी। उसी क्रम में पवनपुत्र हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को उठाकर दक्षिण दिशा की ओर ले जा रहे थे। मार्ग में ही हनुमान जी को यह समाचार मिला कि सेतु निर्माण का कार्य संपूर्ण हो चुका है और अब अतिरिक्त पर्वतों की आवश्यकता नहीं है। इस पर हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत को वहीं ब्रज भूमि पर स्थापित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सेवा का अवसर न मिलने से पर्वत अत्यंत दुखी हो गया था, तब भगवान श्रीराम ने आश्वासन दिया था कि द्वापर युग में वे श्रीकृष्ण अवतार लेकर स्वयं इस पर्वत को पूजेंगे और अपनी उंगली पर धारण करेंगे।
ऋषि के श्राप के कारण नित्य घट रहा है पर्वत का आकार
गिरिराज जी को लेकर एक अन्य पौराणिक मान्यता यह भी है कि यह पर्वत समय के साथ निरंतर छोटा होता जा रहा है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार प्राचीन काल में ऋषि पुलस्त्य गोवर्धन पर्वत के अनुपम सौंदर्य और दिव्यता से प्रभावित होकर उसे अपने साथ काशी ले जाना चाहते थे। पर्वत ने ऋषि के समक्ष यह वचनबद्ध शर्त रखी कि वे उसे मार्ग में जहां कहीं भी पहली बार भूमि पर रखेंगे, वह वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा और आगे नहीं बढ़ेगा। ऋषि जब ब्रज क्षेत्र से गुजर रहे थे, तो उन्होंने आवश्यक कार्यवश पर्वत को भूमि पर रख दिया। बाद में जब उन्होंने पर्वत को पुनः उठाने का प्रयास किया, तो पर्वत अपने वचन के अनुसार टस से मस नहीं हुआ। इस बात से कुपित होकर ऋषि पुलस्त्य ने गोवर्धन पर्वत को प्रतिदिन एक तिल के बराबर क्षीण होने और घटने का श्राप दे दिया।


















