भारत के उत्तरी हिस्सों में नवरात्रि की पहचान जहां मुख्य रूप से नौ दिनों के उपवास, डांडिया, गरबा और विजयादशमी पर रावण दहन से जुड़ी होती है, वहीं प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में इस पावन पर्व का स्वरूप पूरी तरह अलग और अनूठा नजर आता है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में यह नौ दिवसीय उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर कला, संगीत, सामाजिक सौहार्द और ज्ञान के सम्मान का केंद्र बन जाता है। इस दौरान पूरा दक्षिण भारत अपनी ऐतिहासिक विरासत और जीवंत परंपराओं के भव्य रंगों में सराबोर दिखाई देता है।
विजयनगर साम्राज्य की विरासत और मैसूर का नादा हब्बा
कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी मैसूर में नवरात्रि का पर्व राजसी ठाट-बाट के साथ मनाया जाता है। यहां इसे राज्य उत्सव के रूप में मान्यता प्राप्त है और स्थानीय भाषा में इसे नादा हब्बा कहा जाता है। इस ऐतिहासिक आयोजन की जड़ें विजयनगर साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी हुई हैं। इन नौ दिनों के दौरान पूरे मैसूर नगर को किसी नववधू की तरह रोशनी और फूलों से सजाया जाता है।
उत्सव का मुख्य आकर्षण विजयादशमी के दिन आयोजित होने वाला विश्वप्रसिद्ध जुलूस होता है। इस भव्य यात्रा में माता चामुंडेश्वरी की सोने की प्रतिमा को स्वर्ण मंडित अंबारी में रखकर एक सजे-धजे मुख्य हाथी की पीठ पर विराजमान कराया जाता है। यह विशाल शोभायात्रा ऐतिहासिक मैसूर पैलेस के प्रांगण से आरंभ होकर बन्नुमंतप मैदान तक पहुंचती है। उत्सव के दिनों में मैसूर पैलेस को लाखों-करोड़ों रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगाया जाता है, जिसका दीदार करने के लिए देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लाखों सैलानी मैसूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही पूरे शहर में शास्त्रीय संगीत, पारंपरिक नृत्य और विशाल सांस्कृतिक प्रदर्शनियों का सिलसिला लगातार चलता रहता है।
घरों में सजती है सीढ़ीनुमा गुड़ियों की प्रदर्शनी बोम्माइ कोलु
तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के घरों में नवरात्रि के दौरान सबसे मनमोहक और आत्मीय परंपरा कोलु अथवा बोम्माइ कोलु की देखने को मिलती है। यह आयोजन परिवारों और पड़ोसियों के बीच संवाद और स्नेह को गहरा करने का माध्यम बनता है।
इस परंपरा के तहत घरों के बैठक कक्ष में लकड़ी अथवा स्टील के पाटे की मदद से विषम संख्या में सीढ़ियां बनाई जाती हैं, जैसे कि 3, 5, 7, 9 या उससे भी अधिक पायदान। इन सीढ़ियों पर टेराकोटा, पक्की मिट्टी और लकड़ी से निर्मित बेहद खूबसूरत पुतलों और गुड़ियों को व्यवस्थित ढंग से सजाया जाता है। इनमें देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा रामायण और महाभारत जैसे महान पौराणिक ग्रंथों के प्रसंग, पूज्य संतों के जीवन दृश्य और दैनिक जनजीवन के कामकाज को दर्शाने वाले रूपांकन शामिल होते हैं।
नौ दिनों की शाम होते ही महिलाएं और नन्हें बच्चे पारंपरिक वस्त्र पहनकर पास-पड़ोस और रिश्तेदारों के घरों में कोलु देखने जाते हैं। इस अवसर पर घरों में भक्ति संगीत और पारंपरिक गीतों की प्रस्तुतियां होती हैं। आने वाले मेहमानों को प्रसाद दिया जाता है और महिलाओं को आदरपूर्वक उपहार स्वरूप तांबूलम भेंट किया जाता है, जिससे समाज में परस्पर प्रेम और मेल-जोल की भावना मजबूत होती है।
आयुध पूजा और सरस्वती आराधना से श्रम और ज्ञान को नमन
दक्षिण भारतीय राज्यों में नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों का विशेष महत्व होता है, जिन्हें पूर्ण रूप से विद्या, कला और आजीविका के साधनों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित किया गया है।
महा अष्टमी और महानवमी की पावन तिथियों पर घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों और कार्यस्थलों पर आयुध पूजा का विधान संपन्न किया जाता है। इस दिन संगीत से जुड़े वाद्ययंत्रों, अध्ययन की पुस्तकों, कंप्यूटरों, काम में आने वाले औजारों और रोजमर्रा के आवागमन के साधनों जैसे कार और बाइक की गहन सफाई की जाती है। तत्पश्चात उन सभी उपकरणों की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
यह विधान इस गहरे विचार को स्थापित करता है कि मानव जीवन को सुगम बनाने और भरण-पोषण की राह दिखाने वाले हर एक उपकरण के प्रति इंसान को सदा कृतज्ञ रहना चाहिए। इसके साथ ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की आराधना कर ज्ञान और विवेक का आशीर्वाद मांगा जाता है।
केरल में नन्हें बच्चों की शिक्षा का श्रीगणेश और विद्यारंभम
केरल में नवरात्रि उत्सव का समापन विजयादशमी के पावन दिन पर एक अत्यंत पवित्र और भावुक संस्कार के साथ होता है, जिसे विद्यारंभम के नाम से जाना जाता है। इस दिन समाज के 2 से 3 वर्ष की आयु के छोटे बच्चों को औपचारिक रूप से अक्षर ज्ञान और विद्या के संसार में प्रवेश कराया जाता है।
मंदिरों के परिसरों में अथवा विद्वान आचार्यों के सानिध्य में एक विशेष थाली या तश्तरी में चावल अथवा बालू रेत रखी जाती है। बच्चे की तर्जनी उंगली को पकड़कर उस पर पवित्र मंत्र 'ॐ हरि श्री गणपति नमः' लिखवाया जाता है। इस प्रकार नौनिहालों के अध्ययन की विधिवत शुरुआत कराई जाती है। दक्षिण भारत की यह समग्र नवरात्रि महज एक उपासना पद्धति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संजोकर रखी गई कला, परस्पर कृतज्ञता और बौद्धिक मूल्यों का अनुपम उत्सव सिद्ध होती है।



















