महाराष्ट्र की सियासत में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर की कवायद को लेकर घमासान तेज हो गया है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मंगलवार को इस चुनावी प्रक्रिया के क्रियान्वयन को लेकर सत्ता पक्ष और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखे प्रहार किए। मुंबई में महा विकास अघाड़ी और विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों की ओर से निकाली गई विरोध रैली का जोरदार बचाव करते हुए ठाकरे खेमे ने सत्ता में बैठे नेताओं की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। दरअसल, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष के इस जमावड़े को अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाशने की बेताब कोशिश करार दिया था, जबकि राज्य के मंत्री आशीष शेलार ने इस आंदोलन को सस्ती राजनीति और विपक्षी मांगों को केवल चिल्लाना बताया था।
विपक्ष का पलटवार और मतदाता अधिकारों का मुद्दा
सत्ता पक्ष के बयानों की सख्त निंदा करते हुए ठाकरे गुट ने भाजपा के इस रुख को सीधे तौर पर आम जनता का अपमान बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल अहंकार में डूबा है और अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए एक भ्रष्ट चुनाव आयोग के तंत्र पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है। पार्टी की ओर से यह गंभीर दावा किया गया कि बिना किसी अग्रिम सूचना या विधिवत सुनवाई के देश भर में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के मताधिकार मनमाने ढंग से छीन लिए गए हैं। इन आंकड़ों में अकेले महाराष्ट्र के दो करोड़ से ज्यादा मतदाता शामिल बताए गए हैं, जिनके नाम सूची से हटा दिए गए।
उद्धव ठाकरे के मुखपत्र के जरिए चेतावनी देते हुए कहा गया कि लाखों नागरिकों का सड़कों पर उतरना कोई साधारण बात नहीं है। जब 5 से 10 लाख लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन के दर्द से कराहते हैं, तो वह केवल चीख-पुकार नहीं रह जाती, बल्कि दमनकारी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली बगावत की चिंगारी बन जाती है। तिरंगा हाथ में लेकर सड़क पर उतरे लोगों के विरोध को रोना-धोना कहना राष्ट्रध्वज की गरिमा का अपमान करने के समान है।
न्यायिक टिप्पणियों और प्रशासनिक आपत्तियों का हवाला
मतदाता सूची पुनरीक्षण की इस प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को मजबूती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जवल भुइयां के विचारों को भी रेखांकित किया गया। जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया था कि नागरिकों को उनके मताधिकार से बेदखल करने वाली कोई भी एकतरफा व्यवस्था संवैधानिक ढांचे का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा था कि किसी भी जीवित नागरिक का वोट देने का अधिकार छीनना आत्मा को शरीर से अलग करने जैसा गंभीर कृत्य है, और बिना किसी तय नियम या पूर्व सूचना के जीवित मतदाताओं के नाम नहीं काटे जा सकते।
इसके साथ ही पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह की टिप्पणियों का भी विशेष उल्लेख किया गया। आरके सिंह ने सार्वजनिक तौर पर देश भर में चलाए जा रहे एसआईआर अभियान को विधि विरुद्ध करार दिया था। उनके मुताबिक, जमीनी जांच और उचित सुनवाई के बिना मतदाताओं को सूची से बाहर करना सीधे तौर पर जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 22 का खुला उल्लंघन है।
बैलेट पेपर पर वापसी और मुख्य मांगें
विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश और एक बेहद तजुर्बेकार पूर्व प्रशासनिक अधिकारी दोनों ही इस पूरी कवायद को मनमाना और गैरकानूनी बता रहे हैं, तो क्या सत्ताधारी दल उनकी दलीलों को भी महज शोर-शराबा कहेगा। इस संबंध में मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों से सार्वजनिक तौर पर स्थिति साफ करने की मांग की गई है।
मुंबई के प्रदर्शन में शामिल लोगों ने अपनी प्राथमिक मांगों को दोहराते हुए कहा कि एसआईआर की इस विवादास्पद प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए। इसके अलावा, चुनावी व्यवस्था से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम को पूरी तरह समाप्त कर मतपत्रों के जरिए मतदान की पुरानी व्यवस्था बहाल करने पर जोर दिया गया है।





















