उत्तराखंड की राजधानी में दैनिक आवागमन को सुगम बनाने के मकसद से तैयार की जा रही एक बड़ी ढांचागत परियोजना अब स्थानीय बाशिंदों के लिए भारी बेचैनी की वजह बन गई है। शहर के दक्षिणी हिस्से में वाहनों के भारी दबाव को नियंत्रित करने के लिए आशारोड़ी बॉर्डर से मियांवाला तक एक नया कॉरिडोर प्रस्तावित किया गया है। इस निर्माण कार्य की प्रारंभिक रूपरेखा जमीन पर उतारने के लिए सर्वेयरों ने चिह्नांकन का काम शुरू कर दिया है, जिसके तहत कई इमारतों पर लाल रंग के निशान दर्ज किए जा रहे हैं। प्राथमिक आकलनों के अनुसार, कम से कम 15 अलग-अलग रिहायशी बस्तियों में मौजूद 200 से ज्यादा घरों पर इस योजना का सीधा असर पड़ने का अनुमान है। कुछ संपत्तियां पूरी तरह ध्वस्त हो सकती हैं, जबकि कई अन्य निर्माण आंशिक तोड़फोड़ के दायरे में आएंगे, जिसके विरोध में प्रभावित परिवारों ने लामबंदी शुरू कर दी है।
सड़क पर वाहनों का दम घुटने से रोकने की रूपरेखा
राजधानी दिल्ली को जोड़ने वाला दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे आशारोड़ी के मुहाने पर आकर समाप्त होता है। इसके बाद शहर के आंतरिक नेटवर्क में प्रवेश करते ही वाहनों की कतारें थमने लगती हैं, क्योंकि आगे का मार्ग घने बाजारों, आबादी वाले रिहायशी क्षेत्रों और बहुसंख्यक चौराहों से घिरा है। विशेष रूप से रिस्पना पुल से लेकर जोगीवाला चौक के मध्य का पूरा स्ट्रेच हर रोज भीषण जाम की चपेट में रहता है। इसी गंभीर अड़चन का समाधान तलाशते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI ने 13 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड मार्ग का खाका तैयार किया है। इस पूरे प्रोजेक्ट का अनुमानित बजट 2,000 करोड़ रुपये आंका गया है। खास बात यह है कि इस कुल लागत का लगभग आधा हिस्सा, यानी 1,000 करोड़ रुपये, केवल निजी और गैर-सरकारी भूखंडों के अधिग्रहण तथा मुआवजे पर खर्च होने की संभावना है। निर्माण से जुड़ी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पहले ही केंद्रीय मंत्रालय को समीक्षा के लिए भेजी जा चुकी है।
लाल निशान लगते ही स्थानीय बाशिंदों में उबाल
प्रशासनिक टीमों द्वारा मकानों, दुकानों और भूखंडों पर लाल निशान लगाने की कार्रवाई तेज होते ही प्रभावित कॉलोनियों में असंतोष की लहर फैल गई है। छतों पर मंडराते खतरे को देखते हुए स्थानीय लोगों ने एक संयुक्त संघर्ष समिति गठित कर ली है, जो इस अधिग्रहण की सरकारी अधिसूचना को वापस लेने का दबाव बना रही है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि दशकों की मेहनत से बनाए गए आशियानों को इस तरह उजाड़ने से सैकड़ों परिवार बेघर हो जाएंगे, इसलिए योजना को किसी वैकल्पिक मार्ग पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए या रद्द किया जाना चाहिए। हालांकि तकनीकी अधिकारियों का स्पष्ट करना है कि वास्तविक नुकसान का अंतिम ब्योरा सीमांकन और कागजी पैमाइश पूरी होने के बाद ही सामने आ पाएगा, जिससे पता चलेगा कि कितने ढांचे पूरे टूटेंगे और कितने आंशिक रूप से बच पाएंगे।
किन इलाकों पर पड़ेगा इस निर्माण का सीधा असर
अधिग्रहण की जद में आने वाले क्षेत्रों की सूची काफी लंबी है। इसमें मुख्य रूप से माजरा, देहराखास, ब्राह्मणवाला, सेवला खुर्द, बद्रीपुर, माजरीमाफी, मोहब्बेवाला, मोहकमपुर खुर्द, कारगी ग्रांट, शाहनगर, अजबपुर कलां, अजबपुर खुर्द, चकशाहनगर, चक अजबपुर खुर्द और तालुक देहरादून जैसे इलाके शामिल हैं। योजना के तकनीकी विवरण के अनुसार, अजबपुर से शुरू होकर मियांवाला तक जाने वाले लगभग पांच किलोमीटर लंबे हिस्से में 23 मीटर चौड़े कॉरिडोर की दरकार है। इस 5 किमी के दायरे में निजी भूखंडों, रिहायशी घरों और व्यावसायिक दुकानों की बड़ी तादाद मौजूद है। इसके अतिरिक्त, कुछ हिस्से राज्य सरकार के विभिन्न महकमों और रेलवे के स्वामित्व वाले भूखंडों से भी गुजरते हैं।
प्रशासनिक तैयारी और मुआवजे पर टिकी नजरें
परियोजना के मौजूदा चरण पर स्थिति स्पष्ट करते हुए NHAI के परियोजना निदेशक सौरभ सिंह ने बताया कि एलिवेटेड मार्ग के लिए भूमि अधिग्रहण की औपचारिक कवायद आरंभ हो चुकी है और मौके पर सीमांकन कार्य प्रगति पर है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि योजना की DPR केंद्र सरकार के पास मंजूरी के लिए विचाराधीन है। एक तरफ जहां यह नई परियोजना देहरादून के मुख्य यातायात नेटवर्क से भारी ट्रैफिक को बाईपास कर राहत देने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ अपनी छतों को बचाने में जुटे नागरिकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकार उनके विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास को लेकर क्या रुख अपनाती है।


















