कई बार लोग किसी जरूरी काम के इरादे से एक कमरे में कदम रखते हैं और अचानक भूल जाते हैं कि वे वहां क्या लेने आए थे। बातचीत के दौरान सही शब्द जुबान पर न आना या सामान्य जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करने में लगातार परेशानी होना भी काफी आम बात है। यदा-कदा ऐसी स्थिति थकान या अत्यधिक व्यस्तता की वजह से सामने आ सकती है। हालांकि, अगर मानसिक रूप से लगातार भारीपन महसूस हो और रोजमर्रा की सोचने-समझने की क्षमता पर गहरा असर पड़ने लगे, तो चिकित्सा जगत में इस स्थिति को ब्रेन फॉग के नाम से पहचाना जाता है।
इस मानसिक स्थिति की पहचान और मुख्य लक्षण
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन हॉस्पिटल्स (एनएचएस) के अनुसार, यह कोई अपने आप में अलग बीमारी नहीं है, बल्कि यह दिमाग से जुड़े कई मिले-जुले लक्षणों को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक चिकित्सीय पद है। इस स्थिति से जूझने वाले व्यक्ति को साफ-साफ सोचने, किसी विषय पर गहरा ध्यान लगाने, नई और पुरानी जानकारी याद रखने या किसी मामले में ठोस फैसला लेने में काफी दिक्कत पेश आ सकती है। कई लोगों को अत्यधिक मानसिक थकान महसूस होती है, जबकि कुछ अन्य को ऐसा लगता है कि उनका मस्तिष्क पहले जैसी तेजी और फुर्ती से काम नहीं कर पा रहा है। क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, यह समस्या दिन-प्रतिदिन के सामान्य कामकाज, दूसरों से बातचीत करने और दिए गए निर्देशों को ठीक से समझने जैसी बुनियादी गतिविधियों को भी चुनौतीपूर्ण बना देती है।
सोचने की क्षमता को प्रभावित करने वाली प्रमुख वजहें
इस मानसिक उलझन के पीछे कई शारीरिक और मानसिक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं, जिनका सीधा प्रभाव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है
- नींद की कमी: रात में पर्याप्त नींद न लेना या बार-बार नींद टूटना याददाश्त और सतर्कता को बुरी तरह प्रभावित करता है। देर रात तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने या अनियमित सोने की आदत से अगले दिन मस्तिष्क में सुस्ती और भारीपन बना रहता है।
- लगातार तनाव और चिंता: लंबे समय तक मानसिक तनाव में रहने से किसी भी विषय पर एकाग्र होना और जरूरी जानकारियों को संभालना कठिन हो जाता है। अत्यधिक चिंता के कारण दिमाग बार-बार अन्य अनावश्यक विचारों में भटकता रहता है।
- खानपान की गड़बड़ी और पोषक तत्वों का अभाव: भोजन का अनियमित समय, शरीर में पानी की कमी और विशेष रूप से विटामिन बी12 या आयरन जैसे आवश्यक तत्वों की कमी से शारीरिक थकान के साथ-साथ एकाग्रता में भारी गिरावट आ सकती है।
- शारीरिक बीमारियां और दवाओं का असर: थायरॉइड विकार, विभिन्न प्रकार के संक्रमण, शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव और कुछ विशेष दवाओं के दुष्प्रभाव भी सोचने-समझने की गति को धीमा कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, कोविड-19 के संक्रमण से उबरने के बाद भी कई मरीजों में लंबे समय तक याददाश्त और ध्यान से जुड़ी यह समस्या देखी गई है।
दिमागी सतर्कता बनाए रखने के व्यावहारिक तरीके
इस समस्या से राहत पाने के लिए सबसे पहले अपनी नींद और दैनिक जीवनशैली में अनुशासन लाना बेहद जरूरी है। इसके लिए एक निश्चित समय पर सोने और सुबह जागने का नियम बनाएं, पौष्टिक व संतुलित आहार लें और दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत डालें। इसके साथ ही शारीरिक गतिविधियों और नियमित व्यायाम के लिए समय निकालना भी आवश्यक माना जाता है। काम करते वक्त बीच-बीच में छोटे विश्राम लेना और दिन भर के जरूरी कार्यों की पूर्व सूची तैयार करना भी कार्यकुशलता को बेहतर बनाने में काफी मददगार सिद्ध होता है।



















