संतान को जन्म देने के बाद किसी कामकाजी महिला से सबसे पहली अपेक्षा क्या की जाती है? समाज और कार्यक्षेत्र में अक्सर यह उत्सुकता देखी जाती है कि वह कितनी जल्दी अपनी पुरानी दिनचर्या और जिम्मेदारियों के बीच लौटती है. केरल के वायनाड जिले की कलेक्टर मेघाश्री डी आर के एक कदम ने इसी विमर्श को नई दिशा दी है. उन्होंने 25 अगस्त को अपनी तीसरी बेटी को जन्म दिया और ठीक छह दिन बाद कैंप ऑफिस से कामकाज संभालना शुरू कर दिया. प्रशासनिक गलियारों में इस खबर की काफी चर्चा हुई, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अर्थपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने अपने इस कदम को कोई आदर्श या मानक बनाने से साफ इनकार कर दिया.
व्यक्तिगत निर्णय को मानक बनाने से किया परहेज
प्रशासनिक सेवा से जुड़ी महिला अधिकारी का इतने कम समय में फाइलों के बीच लौटना पहली नजर में किसी असाधारण समर्पण जैसा लग सकता है. हालांकि, यदि इसे केवल एक कर्तव्यनिष्ठ मिसाल के तौर पर प्रचारित किया जाए, तो इससे समाज में यह गलत संदेश जा सकता है कि प्रसव के तुरंत बाद काम पर लौटना ही एक जिम्मेदार मां या समर्पित पेशेवर होने का सबूत है. मेघाश्री डी आर ने स्वयं स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका यह कदम पूरी तरह से व्यक्तिगत निर्णय था. उन्होंने जोर देकर रेखांकित किया कि मातृत्व अवकाश लेना या दफ्तर लौटना किसी का भी व्यक्तिगत चुनाव होना चाहिए और इसे किसी दूसरी महिला के मूल्यांकन का पैमाना बिल्कुल नहीं बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने बताया कि काम जारी रखने की बात पूरी तरह शारीरिक स्वास्थ्य और तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है. महिला अधिकारी ने अपने इस कदम को किसी तरह के सामाजिक या पेशेवर मॉडल के तौर पर पेश नहीं किया, जो इस पूरे मामले की सबसे गंभीर और परिपक्व बात है. महिलाओं को अपने स्वास्थ्य और परिवार के अनुसार फैसला लेने की पूरी स्वायत्तता होनी चाहिए. अगर कोई महिला अपनी परिस्थितियों के अनुसार जल्दी दफ्तर लौटना चाहती है तो उस विकल्प का सम्मान किया जाना चाहिए, और यदि कोई अपने नवजात, अपने शरीर और पारिवारिक जरूरतों के लिए पूरा अवकाश लेना चाहती है तो उसे भी उतना ही स्वाभाविक और उचित माना जाना आवश्यक है.
कामकाजी महिलाओं पर निरंतर अपेक्षाओं का बोझ
कार्यक्षेत्र में सक्रिय महिलाओं के जीवन में सामाजिक और पेशेवर अपेक्षाओं का दोहरा दबाव लगातार बना रहता है. करियर में आगे बढ़ना हो तो हर समय उपलब्ध और सक्रिय दिखने की अपेक्षा की जाती है. मां बनने के बाद घर और बच्चे की पूरी देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी भी उन्हीं के हिस्से मानी जाती है. इन दोनों भूमिकाओं में तालमेल बिठाते हुए यदि किसी स्तर पर थकान या मानसिक तनाव दिखाई दे, तो तुरंत उनकी कार्यक्षमता या समर्पण पर प्रश्नचिह्न लगा दिए जाते हैं. मातृत्व कोई ऐसी परीक्षा नहीं है जिसमें किसी महिला को खुद को साबित करने के लिए अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करते हुए काम पर जल्दी लौटने की होड़ में शामिल होना पड़े.
मेघाश्री ने पांच दिन तक आराम किया और उसके बाद 1 सितंबर से अपने कैंप कार्यालय से काम शुरू किया. उनके मुताबिक जिले से जुड़ी कुछ ऐसी बेहद जरूरी फाइलें थीं जिन पर कलेक्टर स्तर की मंजूरी होना अनिवार्य था. प्रशासनिक व्यवस्था की सुचारुता बनाए रखने के लिए उन्होंने यह रास्ता चुना. लेकिन इस विशेष प्रशासनिक परिस्थिति को आधार बनाकर सभी कामकाजी महिलाओं से इसी तरह के व्यवहार की अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं हो सकता, क्योंकि हर महिला का स्वास्थ्य, पारिवारिक सहारा और प्रसव के बाद की शारीरिक स्थिति अलग होती है.
वायनाड की आपदा और प्रशासनिक दायित्वों का संदर्भ
मेघाश्री डी आर वर्ष 2017 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. उन्होंने जुलाई 2024 में वायनाड के जिला कलेक्टर पद की जिम्मेदारी संभाली थी. पदभार संभालने के कुछ ही समय बाद, 30 जुलाई 2024 को वायनाड में भीषण भूस्खलन की त्रासदी सामने आई थी. इस विनाशकारी आपदा के दौरान राहत, पुनर्वास और बचाव कार्यों के समन्वय में उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर रहकर काम किया था. इस चुनौतीपूर्ण पृष्ठभूमि को देखते हुए यह समझना कठिन नहीं है कि जिले की व्यवस्थाओं और लंबित स्वीकृतियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी कितनी संवेदनशील रही होगी.
प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन महत्वपूर्ण है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति अपनी बुनियादी शारीरिक और मानसिक जरूरतों को हमेशा दरकिनार कर दे. इस घटनाक्रम का संतुलित पहलू यह भी है कि फाइलों के जरूरी निपटारे के बाद उन्होंने दो महीने के मातृत्व अवकाश पर जाने का फैसला किया है. इससे स्पष्ट होता है कि शासकीय कर्तव्य और विश्राम के कानूनी अधिकार दोनों को एक-दूसरे के विपरीत खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. दोनों के बीच एक समझदारी भरा संतुलन बनाया जा सकता है.
मातृत्व में विकल्पों की आजादी और सम्मान
प्रसव के बाद किसी महिला का छह दिन में काम शुरू करना किसी की मजबूरी हो सकती है, किसी की व्यक्तिगत पसंद या फिर प्रशासनिक परिस्थितियों की मांग. ठीक उसी तरह, कानून सम्मत मातृत्व अवकाश का पूरा उपयोग करना भी उतना ही सम्मानजनक और जरूरी निर्णय है. संतान के आगमन के बाद कार्यस्थल और समाज को केवल यह पूछने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि महिला काम पर कब वापस आएगी. इसके बजाय संवेदनशीलता इस बात में है कि उसके स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और आवश्यक सहयोग प्रणाली के बारे में पूछा जाए. सबसे जरूरी संदेश यही है कि तुरंत काम पर लौटना कोई अनिवार्यता नहीं है, बल्कि महिला की पसंद और उसके अधिकार का सम्मान ही सर्वोपरि है.



















