भाद्रपद मास में जब विघ्नहर्ता भगवान गणेश का घरों में आगमन होता है, तब समूचा परिवेश श्रद्धा और उल्लास से भर उठता है। परिवार के सदस्य ब्रह्म मुहूर्त से लेकर रात्रि विश्राम तक बप्पा की सेवा और सत्कार में लीन रहते हैं। ऐसे पावन माहौल में कई श्रद्धालुओं के मन में यह उलझन अक्सर उठती है कि प्रतिदिन सुबह और शाम की आरती का सबसे उत्तम मुहूर्त क्या होना चाहिए। क्या हर रोज एक ही निश्चित समय पर दीप प्रज्वलित करना अनिवार्य है अथवा पंचांग और स्थानीय गणना के अनुसार इसमें फेरबदल किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टिकोण से विचार करें तो पूजा में समय की पाबंदी से कहीं अधिक भाव और सुविधा को महत्व दिया गया है।
स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर पूजा की व्यवस्था
दैनिक पूजा पद्धति को लेकर किसी एक सार्वभौमिक घड़ी के समय को बाध्यकारी नहीं माना गया है। पंडित राम प्रसाद चतुर्वेदी स्पष्ट करते हैं कि आरती का समय स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, विशेषकर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पर बहुत कुछ निर्भर करता है। सुबह की मंगल आराधना आमतौर पर शौच और स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर निष्ठापूर्वक की जाती है। वहीं संध्याकालीन वंदना गोधूलि वेला अथवा सूर्यास्त के तत्काल बाद करना सबसे श्रेयस्कर माना गया है। प्रत्येक क्षेत्र में सूर्य की चाल के अनुरूप कुछ मिनटों का अंतर आना पूरी तरह स्वाभाविक है, इसलिए भक्त अपनी सुविधानुसार समय तय कर सकते हैं।
साल 2026 में गणेश चतुर्थी का पावन पर्व 14 सितंबर को श्रद्धापूर्वक मनाया गया, जबकि विसर्जन का मुख्य दिन यानी अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को निर्धारित है। हर परिवार में गणपति बप्पा को विराजमान रखने की अवधि एक समान नहीं होती। कई लोग अपनी पारिवारिक परंपरा और संकल्प के मुताबिक डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा पूरे दस दिनों तक प्रतिमा को स्थापित रखते हैं। जिन घरों में उत्सव का समापन 25 सितंबर को होना है, वहां दैनिक पूजा का क्रम ऋतु अनुसार ढलते दिन के साथ थोड़ा बहुत बदल सकता है।
15 से 25 सितंबर के लिए दैनिक आरती की व्यावहारिक रूपरेखा
दैनिक जीवन की व्यस्तताओं और घर के सभी सदस्यों की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित समय सारणी का पालन किया जा सकता है। दिन की शुरुआत में सूर्य की पहली किरणों के प्रसार के बाद और शाम को ढलती सांझ के वक्त आरती करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। मध्य भारत के उदाहरण से इसे समझें तो भोपाल में 15 सितंबर को सूर्योदय लगभग प्रातः 6:06 बजे दर्ज किया गया, जबकि सूर्यास्त का समय शाम 6:24 बजे रहा। वहीं उत्सव के अंतिम चरण यानी 25 सितंबर तक पहुंचते-पहुंचते सूर्योदय का समय खिसककर लगभग प्रातः 6:10 बजे और सूर्यास्त शाम 6:14 बजे के करीब आ जाता है। यह सूक्ष्म अंतर दैनिक पूजा की रूपरेखा तय करने में मददगार बनता है।
उत्सव के दस दिनों की दैनिक पूजा का व्यावहारिक कार्यक्रम इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है
- 15 सितंबर: प्रातःकालीन मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच संपन्न करें, वहीं संध्या आरती का समय भी शाम 6:30 से 7:15 बजे के मध्य रखें।
- 16 सितंबर: सुबह की मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे तक और शाम की पूजा 6:30 से 7:15 बजे के दौरान पूरी की जा सकती है।
- 17 सितंबर: दिन की शुरुआत में मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच तथा शाम का दीप वंदन 6:30 से 7:15 बजे तक रखें।
- 18 सितंबर: प्रातः मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच और सायंकालीन आरती 6:30 से 7:15 बजे के मध्य करें।
- 19 सितंबर: सुबह की वंदना 6:30 से 7:15 बजे और शाम की आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच करना उत्तम रहेगा।
- 20 सितंबर: प्रातःकालीन मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे तक तथा संध्या आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच आयोजित करें।
- 21 सितंबर: सुबह की आरती के लिए 6:30 से 7:15 बजे का समय और सायंकाल के लिए 6:30 से 7:15 बजे की अवधि तय करें।
- 22 सितंबर: प्रातः मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच और शाम की धूप-दीप आरती 6:30 से 7:15 बजे तक रखें।
- 23 सितंबर: सुबह की मंगला आरती 6:30 से 7:15 बजे तथा संध्या आरती 6:30 से 7:15 बजे के बीच संपन्न करें।
- 24 सितंबर: प्रातःकाल 6:30 से 7:15 बजे के मध्य मंगला आरती और शाम को 6:30 से 7:15 बजे के बीच संध्या आरती करें।
- 25 सितंबर (अनंत चतुर्दशी): प्रातःकालीन मंगला आरती सामान्य दिनों की भांति 6:30 से 7:15 बजे के बीच की जाएगी, किंतु शाम की आरती सूर्यास्त के आसपास विसर्जन यात्रा की तैयारियों के अनुसार समायोजित होगी।
अनंत चतुर्दशी और दैनिक पूजन विधि में इन बातों का रखें विशेष ख्याल
पर्व के आखिरी दिन यानी 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी होने के कारण मुख्य विसर्जन की औपचारिकताएं निभाई जाती हैं। इस विशिष्ट तिथि पर सुबह की पूजा विधि-विधान से सामान्य समय पर ही पूरी कर लेनी चाहिए। शाम की आरती का समय परिवार के प्रस्थान, विसर्जन शोभायात्रा के मुहूर्त और निजी मान्यताओं के आधार पर आगे या पीछे किया जा सकता है। उस दिन की प्राथमिक तैयारी बप्पा के आदरपूर्ण विदाई अनुष्ठान से जुड़ी होती है।
श्रद्धालुओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि घर में किसी खास पंचांग अथवा कुल पुरोहित के बताए मुहूर्त का पालन किया जाता है, तो उसी व्यवस्था को वरीयता दें। देश के अलग-अलग नगरों और अंचलों में अक्षांश और देशांतर के चलते सूर्योदय तथा सूर्यास्त के पलों में स्वाभाविक भिन्नता दिखाई देती है। अतः ऊपर प्रस्तावित की गई समय सीमा एक सहज मार्गदर्शिका मात्र है, कोई ऐसा अटल नियम नहीं जिसका उल्लंघन दोष माना जाए। सुबह स्नान के पश्चात भगवान गणेश को शुद्ध जल, ताजे पुष्प, दूर्वा दल और मोदक या नैवेद्य अर्पित करके आरती गाएं। शाम को दीप प्रज्वलित कर परिवार समेत आराधना करें। सबसे महत्वपूर्ण तत्व यह है कि पूजा का समय ऐसा चुना जाए जिसमें गृहस्थी के सभी परिजन एक साथ उपस्थित होकर श्रद्धा से शीश नवा सकें।


















