नीले समंदर, शांत लैगून और आलीशान रिजॉर्ट्स के लिए मशहूर 1200 द्वीपों का देश मालदीव दुनिया भर के सैलानियों की पसंदीदा सैरगाह है। इस मुल्क के गिने-चुने द्वीपों पर ही इंसानी आबादी का डेरा है, जहां कुल मिलाकर लगभग 4 लाख लोग निवास करते हैं। भौगोलिक दृष्टिकोण से नाजुक यह मुल्क समुद्र के जलस्तर में मामूली बढ़ोतरी होने पर भी जलमग्न होने की कगार पर आ सकता है। मौजूदा वक्त में मालदीव अपनी इस्लामी संस्कृति का 900वां सालगिरह मना रहा है और 1965 में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी हासिल करने वाला यह मुल्क पिछले कुछ वर्षों को छोड़कर ज्यादातर समय भारतीय छत्रछाया में रहा है। आज भले ही यहां की पूरी आबादी मुस्लिम हो, मगर इस देश की बुनियाद सदियों पुरानी सनातन और बौद्ध परंपराओं में रची-बसी रही है। प्राचीन काल से ही इसका सांस्कृतिक नाता भारतीय उपमहाद्वीप और सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ रहा है।
महिलाद्वीप से लेकर मालदीव तक का ऐतिहासिक सफर
मालदीव का नामकरण पूरी तरह संस्कृत भाषा की समृद्ध शब्दावली से जुड़ा हुआ है। प्राचीन दस्तावेजों और परंपराओं के अनुसार इसे पहले 'महिलाद्वीप' कहा जाता था, क्योंकि वहां की सत्ता का संचालन महिला शासिकाओं के हाथों में हुआ करता था। कुछ प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग का उल्लेख 'मालाशिखर' नाम से भी मिलता है। कालांतर में अरब नाविकों और व्यापारियों ने इन द्वीपों को दिवि अथवा दीबात कहकर पुकारा। इसके बाद जब दक्षिण भारत के तमिल और चोल राजवंशों का इस क्षेत्र पर गहरा राजनीतिक व सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा, तब यह इलाका माले द्वीप के रूप में पहचाना जाने लगा। संस्कृत और तमिल दोनों ही भाषाओं में इसका अर्थ मोतियों अथवा फूलों की माला की भांति पिरोए गए द्वीपों का समूह होता है। यदि आज भी नक्शे पर नजर डाली जाए, तो ये बारह सौ द्वीप समुद्र में एक सुंदर माला जैसी बनावट दर्शाते हैं, जो समय बीतने के साथ मालदीव नाम में बदल गया।
कालीबंगा से जुड़ा पहला इंसानी पड़ाव
ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य इस बात की तस्दीक करते हैं कि बारहवीं सदी में इस्लाम के पदार्पण से पूर्व यह द्वीप समूह बौद्ध मत और उससे भी पहले वैदिक हिंदू परंपराओं का मुख्य केंद्र था। सत्रहवीं शताब्दी के अरबी विद्वान अल्लामा अहमद शहाबुद्दीन ने अपनी विख्यात पुस्तक 'फी आथार मीधू अल-कादिमा' में दर्ज किया था कि इन द्वीपों पर सबसे पहले बसने वाले लोग धेयविस समुदाय के थे। यह समुदाय भारत में वर्तमान राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल कालीबंगा से वहां पहुंचा था। कालीबंगा के प्रवासियों के वहां पहुंचने का निश्चित कालखंड भले ही अज्ञात हो, किंतु यह प्रमाण सम्राट अशोक के शासनकाल यानी 269 से 232 ईसा पूर्व से भी पुराना माना जाता है।
वैदिक उपासना और चोल साम्राज्य का विस्तार
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के उपरांत समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में वैदिक विचारों का प्रसार हुआ, जिसका सीधा प्रभाव इन द्वीपों पर भी पड़ा। कई उत्खननों और प्राचीन अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि भारत और श्रीलंका के तटीय इलाकों से नाविक व निवासी यहां पहुंचे। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से पहले यहां बसे लोग सूर्य की पूजा करते थे और वैदिक संस्कारों का पालन करते थे। प्रसिद्ध नॉर्वेजियन अन्वेषक थॉर हेयरडाहल ने अपने अभियानों के दौरान कोरल पत्थरों पर तराशे गए सूर्य चक्र, त्रिशूल तथा शिवलिंग जैसे प्राचीन हिंदू प्रतीक चिन्ह खोज निकाले थे। इसके पश्चात ग्यारहवीं शताब्दी में भारत के महान शासक राजराजा चोल प्रथम ने मालदीव पर विजय हासिल की, जिससे दक्षिण भारतीय तमिल संस्कृति, हिंदू परंपराएं और बौद्ध विचार यहां और अधिक सुदृढ़ हो गए।
भाषा और लिपि में जीवित है संस्कृत व पाली
मालदीव की राष्ट्रीय भाषा दीवेही का भाषाई ढांचा आज भी अपनी प्राचीन भारतीय जड़ों की गवाही देता है। दीवेही भाषा का उद्भव प्राचीन पाली, प्राकृत और संस्कृत से हुआ है, जबकि इसकी लिपि और व्याकरण पर श्रीलंका की एलू भाषा तथा प्राचीन भारत की ब्राह्मी लिपि का गहरा असर दिखाई देता है। वर्तमान समय में भी मालदीव के विभिन्न द्वीपों, भौगोलिक दिशाओं, पारिवारिक रिश्तों और स्थानों के नाम संस्कृत तथा पाली भाषा से प्रेरित हैं। यहां तक कि राजधानी माले का नामकरण भी 'महा-लय' अथवा 'माला' शब्द से हुआ माना जाता है।
बौद्ध मठ, स्तूप और प्राचीन अवशेष
हिंदू परंपराओं के बाद ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से मालदीव में बौद्ध धर्म का तेजी से फैलाव हुआ और कालांतर में यह समूचे द्वीप समूह का मुख्य धर्म बन गया। लामा, फुवाहमुलाह और टोड्डू जैसे एटोल पर मिट्टी तथा कोरल पत्थरों से निर्मित विशालकाय टीले प्राप्त हुए हैं, जो वास्तव में बौद्ध चैत्य और स्तूप हैं। स्थानीय भाषा में चैत्य को 'हवित्त' और स्तूप को 'उसतुबु' कहा जाता है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में ब्रिटिश पुरातत्वविद एच. सी. पी. बेल और अन्वेषक थॉर हेयरडाहल द्वारा कराई गई खुदाइयों में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं, ध्यानी बुद्ध की नक्काशीदार मूर्तियां और बौद्ध मठों के खंडहर प्रकाश में आए। गान और काशिधू द्वीपों पर स्थित कुरुहिन तारागंडू परिसर सातवीं से आठवीं शताब्दी का एक विशाल बौद्ध मठ हुआ करता था। प्राचीन काल के चीनी यात्रियों तथा रोम और फारस के सौदागरों ने अपने यात्रा वृत्तांतों में भी इन द्वीपों को महिला शासकों और बौद्ध भिक्षुओं की भूमि बताया है।
राजा धोवेमी का धर्मांतरण और ऐतिहासिक बदलाव
बारहवीं शताब्दी के अंत में लिखे गए ऐतिहासिक ताम्रपत्रों में दर्ज वृत्तांत बताते हैं कि स्थानीय राजा धोवेमी ने बौद्ध धर्म का परित्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया था। इसके उपरांत कई वर्षों तक बौद्ध अनुयायियों को नए धर्म में लाने के लिए भीषण यातनाएं दी गईं। इन ताम्र पट्टियों के अनुसार, इस्लामी शासन स्थापित होने के बाद कई बौद्ध स्तूपों को ध्वस्त किया गया और भिक्षुओं को दंडित किया गया अथवा धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया गया। समय के इस प्रवाह के बाद आज मालदीव एक पूर्ण रूप से मुस्लिम राष्ट्र बन चुका है, जहां गैर-मुसलमानों के लिए नागरिकता पाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद सदियों पुरानी सनातन और बौद्ध धरोहर के मूक अवशेष आज भी उस सुनहरी विरासत को बयां करते हैं।

















