क्रिकेट के मैदान पर आमतौर पर खिलाड़ी 30 के पार पहुंचते ही संन्यास की योजना बनाने लगते हैं, लेकिन प्रवीण तांबे ने उस उम्र में नई शुरुआत की जब अधिकांश लोग उम्मीद छोड़ देते हैं। सपनों को हासिल करने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता, बल्कि इसके लिए लगातार मेहनत, धैर्य और असीम साहस की जरूरत होती है। भारतीय क्रिकेटर प्रवीण तांबे का जीवन उन सभी लोगों के लिए एक मजबूत प्रेरणा है, जो किसी भी मोड़ पर यह सोचने लगते हैं कि अब उनके लिए बहुत देर हो चुकी है।
घरेलू क्रिकेट में लंबे संघर्ष के बाद प्रवीण तांबे को वह बड़ा मंच मिला जिसका वह सालों से इंतजार कर रहे थे। साल 2013 में 41 साल की उम्र में उन्होंने राजस्थान रॉयल्स की तरफ से अपना आईपीएल डेब्यू किया। उनके इस ऐतिहासिक पदार्पण ने यह साफ कर दिया कि यदि प्रतिभा के साथ लगन और अवसर का मेल हो जाए, तो उम्र केवल एक आंकड़ा बनकर रह जाती है। उनके जीवन के इस संघर्ष और सफलता से ऐसे 5 व्यावहारिक सबक सामने आते हैं, जो हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी में अपनाने चाहिए।
1. उम्र को अपनी सीमा या कमजोरी न बनने दें
प्रवीण तांबे के पूरे सफर का सबसे बड़ा संदेश यही है कि उम्र को अपने रास्ते की रुकावट कभी न मानें। समाज अक्सर हर काम के लिए एक तय उम्र तय कर देता है, लेकिन जुनून किसी कैलेंडर का मोहताज नहीं होता। अगर आपके मन में अपने काम को लेकर सच्चा समर्पण है, तो उम्र का बहाना बनाकर पीछे हटने के बजाय मैदान में डटे रहना चाहिए। देर से मिलने वाली कामयाबी का मूल्य भी उतना ही बड़ा होता है जितना किसी शुरुआती सफलता का।
2. केवल अवसर का इंतजार न करें, खुद को हमेशा तैयार रखें
जिंदगी में हर इंसान को सही समय पर पहचान या मौका नहीं मिलता। प्रवीण तांबे ने वर्षों तक बिना किसी बड़े मंच के भी अपने भीतर के क्रिकेटर को जीवित रखा और अपनी गेंदबाजी का अभ्यास जारी रखा। जब आखिरकार अवसर उनके दरवाजे पर आया, तब वह खेल के हर पहलू से पूरी तरह तैयार थे। अवसर कब और कहां मिलेगा यह किसी के नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन जब वह सामने आए तब उसके लिए शत-प्रतिशत तैयार रहना पूरी तरह हमारे अपने हाथ में होता है।
3. असफलता से कहीं अधिक नुकसानदेह है मैदान छोड़ देना
एक लंबे अरसे तक पहचान और सफलता से दूर रहने के बाद भी प्रवीण तांबे ने क्रिकेट का साथ नहीं छोड़ा। उनकी यही अटूट जिद और लगन उन्हें भीड़ से अलग बनाती है। जीवन में कई बार इंसान दिन-रात पसीना बहाता है, लेकिन उसका नतीजा तुरंत दिखाई नहीं देता। ऐसे निराशाजनक पलों में सब कुछ छोड़कर बैठ जाने के बजाय निरंतर प्रयास करते रहना ही असली परीक्षा होती है।
4. दूसरों की राय के बजाय अपने आत्मबल पर भरोसा रखें
दुनिया आपके सपने को कितना संभव या असंभव मानती है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असली मायने इस बात के हैं कि आपको अपनी काबिलियत पर कितना गहरा विश्वास है। प्रवीण तांबे ने अपने क्रिकेट खेलने के सपने को लोगों की राय या उम्र के तराजू पर कभी नहीं तौला। यदि आपको अपने लक्ष्य की सच्चाई पर भरोसा है, तो बाहरी शोर को नजरअंदाज करके केवल अपनी मेहनत पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
5. लगातार सीखने और खुद को बदलने का हौसला रखें
सफलता का स्वाद चखने के बाद भी खुद में सुधार लाने का सिलसिला कभी नहीं रुकना चाहिए। जीवन हो या कोई भी खेल, वक्त और हालात के अनुसार खुद को ढालना बेहद जरूरी होता है। प्रवीण तांबे का सफर दिखाता है कि नई चीजें सीखने, अपनी तकनीक को मांजने और आगे बढ़ते रहने की कोई अंतिम तारीख नहीं होती।
प्रवीण तांबे की यह दास्तान केवल क्रिकेट के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो किसी भी कारण से अपने सपनों को पीछे छोड़ रहे हैं। जिंदगी में कामयाबी हासिल करने की कोई एक तय समयसीमा नहीं होती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपका संकल्प अडिग रहे और आप बिना थके कोशिश करते रहें। मंजिल तक पहुंचने में समय लग सकता है, लेकिन उस देरी का यह कतई मतलब नहीं है कि आपका सपना पूरा नहीं होगा।


















