आयुष्मान खुराना का सफर इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि किसी भी क्षेत्र में मुकाम हासिल करने के लिए केवल नैसर्गिक प्रतिभा होना ही काफी नहीं होता है। सही वक्त की ताक में रहना, असफलताओं से सीख लेकर आगे बढ़ना और अपने फैसलों पर अडिग रहना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत एक रेडियो जॉकी के तौर पर की थी, जिसके बाद वे टेलीविजन पर होस्ट बने और अंततः अभिनय की दुनिया में अपनी अलग जगह बनाई। उनकी पहली ही फिल्म ‘विकी डोनर’ ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया, लेकिन इसके बाद का रास्ता हमेशा एक समान नहीं रहा। फिर भी उन्होंने लीक से हटकर कहानियों का चुनाव करना कभी बंद नहीं किया। उनके इस पूरे सफर से मेहनत, करियर और जीवन को लेकर सात बड़ी सीख मिलती हैं।
असफलताओं और रिजेक्शन से न घबराएं
आयुष्मान खुराना का शुरुआती दौर संघर्षों से भरा हुआ था। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान साझा किया था कि उन्हें कई रियलिटी शोज के ऑडिशन में निराशा हाथ लगी थी। हालांकि उन्होंने इन झटकों को अपनी मंजिल का अंत मानने के बजाय खुद को मांजने का जरिया बनाया। साल 2004 में उन्होंने एमटीवी के रियलिटी शो ‘रोडीज’ का दूसरा सीजन अपने नाम किया। उनके इस अनुभव से यह शिक्षा मिलती है कि किसी मंच पर नाकामी मिलना आपकी कुल क्षमता का अंतिम पैमाना नहीं होता है। चाहे नौकरी का साक्षात्कार हो या कोई प्रतियोगी परीक्षा, एक बार असफल होने के बाद खुद को संभालना और अपनी तैयारियों को अधिक पुख्ता करना ही सफलता की कुंजी है।
शुरुआत चाहे छोटी हो, सीखने का सिलसिला न रोकें
अभिनय जगत में कदम रखने से पहले आयुष्मान ने रेडियो और टीवी की दुनिया में लंबा वक्त बिताया था। इस दौरान उन्होंने लोगों से संवाद स्थापित करना, कैमरे के सामने सहज रहना और दर्शकों के साथ जुड़ाव महसूस करना भली-भांति सीख लिया था। उनका यह दौर सिखाता है कि हर तरह का काम आपको कुछ न कुछ मूल्यवान अनुभव देता है। हो सकता है कि आपकी पहली नौकरी आपकी अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत हो, लेकिन वहां मिलने वाला तजुर्बा भविष्य में जरूर काम आता है। आप कहां से अपनी शुरुआत कर रहे हैं, इससे कहीं अधिक इस बात का महत्व है कि आप वहां से क्या ज्ञान अर्जित कर रहे हैं।
भीड़ से अलग राह चुनने का साहस रखें
साल 2012 में उन्होंने ‘विकी डोनर’ के साथ सिनेमा जगत में कदम रखा। इस फिल्म का मुख्य विषय स्पर्म डोनेशन था, जिस पर उस दौर में मुख्यधारा की फिल्मों में शायद ही कभी खुलकर चर्चा होती थी। आयुष्मान ने इस तरह के संवेदनशील और अनोखे विषय को चुना और अपनी पहली ही प्रस्तुति से दर्शकों के दिलों पर छाप छोड़ी। इस शानदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट मेल डेब्यू पुरस्कार भी प्रदान किया गया। इस वाकये से यह प्रेरणा मिलती है कि हमेशा दूसरों के नक्शेकदम पर चलना जरूरी नहीं है। यदि आपके पास पुख्ता सोच और तैयारी है, तो लीक से हटकर रास्ता चुनने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
कामयाबी मिलने के बाद भी जमीन से जुड़े रहें
अपनी पहली ही फिल्म की जबरदस्त सफलता के बाद उनकी अगली कुछ फिल्में जैसे ‘नौटंकी साला’, ‘बेवकूफियां’ और ‘हवाईजादा’ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाईं। हालांकि इसके बाद साल 2015 में आई फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ ने उनके करियर को एक बार फिर से मजबूती प्रदान की। यह अनुभव याद दिलाता है कि एक सफलता इस बात की गारंटी नहीं होती कि आगे आने वाले सभी कदम आसान होंगे। अनुकूल परिणाम मिलने के बाद भी अपनी मेहनत में कोई कमी न आने दें और कठिन दौर में अपनी कमजोरियों का निष्पक्ष आकलन करें।
अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें समझें
उनकी फिल्म ‘बाला’ (2019) में समय से पहले बाल झड़ने की समस्या और गंजेपन के दर्द को बहुत ही सहजता से पर्दे पर उतारा गया था। वहीं ‘दम लगा के हईशा’ में उन्होंने ऐसे युवक का किरदार निभाया जो अपनी जीवनसंगिनी के बढ़े हुए वजन को लेकर असहज महसूस करता था। इन फिल्मों के माध्यम से समाज के उन विषयों पर रोशनी डाली गई जिन पर अमूमन लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं। इनसे यह सीख मिलती है कि अपनी कमजोरियों या असुरक्षा की भावनाओं को स्वीकार करना ही खुद को उन्नत बनाने की दिशा में उठाया गया सबसे पहला कदम है।
लगातार नया सीखने की आदत विकसित करें
आयुष्मान केवल एक बेहतरीन अभिनेता ही नहीं बल्कि एक मंजे हुए गायक भी हैं। उनकी पहली ही फिल्म का गाना ‘पानी दा रंग’ बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके लिए उन्हें बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। अभिनय के साथ-साथ संगीत के प्रति उनका यह प्रेम उनके करियर की एक अलग पहचान बन गया। उनकी यह जीवनशैली सिखाती है कि किसी एक कौशल पर पूरी तरह से निर्भर रहने के बजाय नई विधाएं सीखना हमेशा फायदेमंद रहता है। अपने कार्यक्षेत्र में नई तकनीकों को अपनाना और क्षमताओं का दायरा बढ़ाना प्रगति के मार्ग खोलता है.
अपने काम के जरिए समाज से जुड़े मुद्दों को उठाएं
आयुष्मान की कई फिल्मों ने मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों को भी मुखरता से उठाया है। ‘आर्टिकल 15’ के जरिए जातिगत भेदभाव, ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ के माध्यम से समलैंगिक रिश्तों और ‘बधाई हो’ के जरिए परिवार से जुड़ी एक संवेदनशील स्थिति को बेहद संजीदगी से दिखाया गया। इन फिल्मों ने उन विषयों पर गंभीर चर्चा को जन्म दिया जिन पर समाज में अलग-अलग विचार पाए जाते हैं। इससे यही सीख मिलती है कि आप अपने कार्यक्षेत्र में रहते हुए दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास कर सकते हैं।


















