बच्चे उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुंच जाएं, माता-पिता का उनके प्रति स्नेह और उनकी भलाई को लेकर होने वाली चिंता कभी कम नहीं होती। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और अपनी स्वायत्त जिंदगी जीने लगते हैं, तब भी माता-पिता अक्सर उनके देर तक जगने, शारीरिक व्यायाम न करने, बेहिसाब पैसे खर्च करने या बाहर का भोजन खाने जैसी आदतों पर चिंतित रहते हैं। ऐसी स्थिति में माता-पिता अक्सर बिना सोचे-समझे यह सलाह देने लगते हैं कि वे अपनी सेहत का ध्यान रखें या फिजूलखर्ची पर लगाम लगाएं। हालांकि, जब बच्चे वयस्क हो जाते हैं, तो यही सुरक्षात्मक सलाह उनके लिए अवांछित दखलअंदाजी का रूप ले लेती है, जिससे बात-बात पर बहस और आपसी मनमुटाव का माहौल बनने लगता है।
विशेष रूप से ढलती उम्र के बुजुर्ग माता-पिता के लिए यह स्थिति काफी दुखद हो जाती है। वे यह समझ नहीं पाते कि अपनी तरफ से भलाई की बात कहने के बावजूद उनके बच्चे चिड़चिड़े क्यों हो जाते हैं। मेंटल हेल्थ और हैप्पीनेस कोच वीना सिन्हा का मानना है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनके प्रति माता-पिता का व्यवहार और संवाद का तरीका बदलना बेहद जरूरी हो जाता है। यदि माता-पिता अपने व्यवहार में थोड़ा बदलाव लाएं, तो वे अपने मानसिक सुकून को बनाए रखते हुए बच्चों के साथ मजबूत और सहज रिश्ते कायम रख सकते हैं।
1. सलाह दें पर अपनी बात थोपने से बचें
जब संतान वयस्क हो जाती है, तो उसके जीवन के व्यक्तिगत और व्यावहारिक फैसले लेने का अधिकार पूरी तरह से उसी का होता है। हालांकि माता-पिता के पास जीवन का लंबा अनुभव होता है जो मार्गदर्शन में काम आ सकता है, लेकिन हर छोटे-बड़े निर्णय पर निगरानी बनाए रखने से रिश्तों में अकारण तनाव पैदा होता है। उदाहरण के लिए, यदि बेटा रोज बाहर का खाना खाता है या वर्कआउट नहीं करता, तो माता-पिता की चिंता जायज है। लेकिन अगर इसी बात को सुबह-शाम लगातार दोहराया जाए, तो बच्चा उसे सलाह मानने के बजाय एक मानसिक दबाव के रूप में देखने लगता है।
वीना सिन्हा के अनुसार, इसका सबसे बेहतर व्यावहारिक समाधान यह है कि अपनी बात कहें और फिर थोड़ा पीछे हट जाएं। माता-पिता को अपनी चिंता बहुत ही शांत और स्पष्ट शब्दों में अपने बच्चे के सामने रखनी चाहिए। वे अपनी जीवनशैली और अनुभवों का हवाला दे सकते हैं, लेकिन अपनी बात कहने के बाद उसी विषय पर लगातार तर्क-वितर्क करते रहना सही नहीं है। अपनी बात रखने के बाद बातचीत को वहीं समाप्त कर देना समझदारी होती है। इससे वयस्क बच्चे को बात पर ठंडे दिमाग से विचार करने का समय मिलता है और माता-पिता भी बेवजह के मानसिक तनाव से बच जाते हैं। कई बार माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उनकी सलाह को उसी क्षण मान लिया जाए, और जब ऐसा नहीं होता तो वे इसे अपने अनादर से जोड़ लेते हैं। सलाह को आदेश बनाने के बजाय एक सलाह के रूप में प्रस्तुत करना ही बुद्धिमानी है।
2. बच्चे के गुस्से को दिल से न लगाएं
अक्सर देखा गया है कि जब माता-पिता कोई सलाह देते हैं, तो वयस्क बच्चे तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए ऊंची आवाज में बात करने लगते हैं। ऐसे मौकों पर यदि माता-पिता भी उसी तीखे अंदाज में जवाब देंगे, तो स्थिति और ज्यादा बिगड़ सकती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऐसी परिस्थिति में शांत रहकर बच्चे की बात सुननी चाहिए और यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि उसके इस गुस्से या नाराजगी के पीछे असली कारण क्या है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि दुर्व्यवहार या अभद्र भाषा को सही ठहराया जा रहा है। इसका तात्पर्य यह है कि बहस को आगे बढ़ाने से रोकने के लिए उस समय संयम बनाए रखना जरूरी है। विशेष तौर पर बुजुर्ग माता-पिता को बच्चों द्वारा कहे गए कड़वे शब्दों को मन से लगाकर नहीं बैठना चाहिए, क्योंकि यह उनके अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। संवाद के दौरान थोड़ा ठहराव देने से दोनों पक्षों को स्थिति का सही आकलन करने का मौका मिलता है।
3. अपनी व्यक्तिगत जिंदगी और सेहत को प्राथमिकता दें
माता-पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि अपनी संपूर्ण ऊर्जा बच्चे की आदतों को बदलने में खर्च करने के बजाय उन्हें अपनी सेहत, खुशी और निजी जीवन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। एक बार जब आप अपने विचार या चिंता बच्चे के सामने स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दें, तो उसके बाद उसे अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता दें। इस दौरान माता-पिता को अपनी दैनिक दिनचर्या को समृद्ध बनाना चाहिए।
माता-पिता अपने पुराने दोस्तों से मिलने-जुलने, क्लब या सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने, योग और सुबह-शाम टहलने जैसी स्वास्थ्यवर्धक आदतों को अपनाने में अपना समय बिता सकते हैं। इसके अलावा अपनी पसंद के शौक पूरे करने या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने से जीवन में सकारात्मकता आती है। जब माता-पिता अपनी जिंदगी में खुश और व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों पर भी बेवजह की बंदिशों का दबाव महसूस नहीं होता और पारिवारिक संबंधों में मधुरता बनी रहती है।



















