राजस्थान के नगर निकाय चुनाव 2026 के दंगल में इस बार मुकाबला सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच पारंपरिक राजनीतिक टक्कर तक सीमित नहीं है। इन दोनों प्रमुख दलों के भीतर का अंतर्द्वंद खुलकर सामने आ गया है। टिकट वितरण की प्रक्रिया ने पार्टी के पुराने और वफादार पार्षदों, नए दावेदारों, प्रभावशाली नेताओं के नाते-रिश्तेदारों और नाराज कार्यकर्ताओं के बीच एक बिल्कुल नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर दिया है। नामांकन प्रक्रिया के मुकम्मल होने के बाद राजनीतिक परिदृश्य अब दूध और पानी की तरह साफ हो चुका है। इस पूरी तस्वीर को देखने के बाद एक बात दूध की तरह साफ नजर आती है कि दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस मर्तबा पुराने और अनुभवी चेहरों पर भरोसा जताने से साफ गुरेज किया है।
जयपुर नगर निगम के आंकड़े खोल रहे हैं पोल
राजधानी जयपुर नगर निगम के चुनावी आंकड़े इस पूरे सियासी खेल की सबसे बड़ी और स्पष्ट तस्वीर दिखाते हैं। साल 2020 के पिछले निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी से कुल मिलाकर 137 पार्षद चुनाव जीतकर नगर निगम पहुंचे थे। इस बार के चुनावों में इनमें से महज 19 लोगों को ही अपनी पार्टियों की तरफ से दोबारा चुनावी मैदान में उतरने का टिकट नसीब हुआ है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि पिछली परिषद के लगभग 118 विजेता पार्षद इस बार पार्टी के आधिकारिक टिकट पर चुनाव लड़ने से बाहर हो चुके हैं।
पुराने चेहरों की बड़े पैमाने पर विदाई
यह आंकड़ा अपने आप में ही बहुत कुछ बयां करने के लिए काफी है। पिछली परिषद के कुल विजेताओं में से हर 10 में से लगभग 8 से ज्यादा चेहरों को इस बार के चुनाव में पूरी तरह से बदल दिया गया है। ये तमाम बातें अपने पीछे कई गंभीर और तीखे सवाल छोड़ गईं हैं। जब आप इन तमाम घटनाओं और आंकड़ों की एक-एक परत को बारीकी से टटोलेंगे, तो आपको जमीनी हकीकत का पूरा अंदाजा हो जाएगा। ऐसे माहौल में राजनीतिक गलियारों में तमाम तरह के सवाल उठना बिल्कुल लाजिमी हो जाता है और जनता भी इसका जवाब तलाश रही है।
पुराने पार्षदों के टिकट काटने की असली वजह
पार्षदों के टिकट काटने का यह पूरा फैसला केवल उनकी जीत या हार के आधार पर नहीं लिया गया है। शहर के वार्डों के पुनर्गठन और नए सिरे से हुए परिसीमन ने भी पुराने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट-पुलट कर रख दिया है। कई वार्डों की भौगोलिक सीमाएं बदल दी गई हैं, जिसके साथ ही वहां के सामाजिक समीकरण और पुराने पार्षदों का पारंपरिक वोट आधार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ऐसे हालातों में दोनों ही प्रमुख दलों के सामने नए स्थानीय चेहरों को आजमाने और मौका देने का अवसर आ गया था।
विकास और सक्रियता के आधार पर चयन
बीते पांच सालों के दौरान किए गए विकास कार्य, जनता के बीच नेता की पकड़, संगठन के साथ बेहतर तालमेल और मैदान में सक्रियता जैसे महत्वपूर्ण सवाल टिकट तय करने के पैमाने पर अहम साबित हुए। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जहां-तहां टिकट कटने का एकमात्र कारण पुराना पार्षद कमजोर होना ही था। कई मामलों में तो ऐसा हुआ कि वार्ड का पूरा भूगोल ही बदल गया। हालांकि, कुछ पुराने विजेताओं को टिकट मिला भी, लेकिन उन्हें उनका पुराना वार्ड देने के बजाय पूरी तरह से नया वार्ड थमा दिया गया। विकास बरेठ, गजेंद्र सिंह शेखावत, पीयूष किराडू और जयश्री गर्ग जैसे कई नाम इसी पूरी तस्वीर का एक अहम हिस्सा बने हुए हैं।
बीजेपी में विधायकों और संगठन का शक्ति परीक्षण
जयपुर के कुल 150 वार्डों में भारतीय जनता पार्टी द्वारा किए गए टिकट वितरण के तरीके से पार्टी के भीतर ताकत का संतुलन भी साफ तौर पर दिखाई देता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इनमें से करीब 100 टिकट स्थानीय विधायकों की पसंद के आधार पर बांटे गए, जबकि लगभग 50 टिकट सीधे तौर पर संगठन की पसंद से तय किए गए। शुरुआत में तमाम विधायक और मंत्री हर एक वार्ड से अपनी पसंद का एक-एक नाम लेकर आगे आए थे, लेकिन पार्टी संगठन ने स्पष्ट रूप से तीन नामों का एक पैनल मांग लिया था। इसके बाद स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए आखिरी फैसला लिया गया।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कलह
इस पूरी प्रक्रिया का सीधा और स्पष्ट अर्थ यह है कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर टिकट वितरण के दौरान स्थानीय विधायकों का भारी प्रभाव और दखल रहा। हालांकि, जिन-जिन जगहों पर किसी खास नेता की व्यक्तिगत पसंद को प्राथमिकता देते हुए टिकट थमाया गया, वहां के स्थानीय कार्यकर्ताओं की दबी हुई नाराजगी भी खुलकर सतह पर आ गई। कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा चुनाव के दौरान पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है क्योंकि भितरघात का खतरा हमेशा ऐसे मौकों पर सबसे ज्यादा बना रहता है।
कांग्रेस पार्टी की रणनीति और समय पर फैसला
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने अपने भीतर बगावत के सुरों को रोकने और फूट से बचने के लिए अपने प्रत्याशियों की अंतिम सूची को बिल्कुल आखिरी समय तक रोककर रखा। जयपुर में कांग्रेस की यह सूची नामांकन दाखिल करने की समय सीमा खत्म होने के ठीक दो घंटे बाद यानी शाम को 5 बजे आधिकारिक तौर पर जारी की गई। राजस्थान के दूसरे शहरों में भी कुछ इसी तरह की आखिरी वक्त तक सिंबल बांटने की रणनीति अपनाई गई ताकि किसी को संभलने का मौका न मिले।
कोटा में कांग्रेस का दांव और विरोध
कोटा शहर में कांग्रेस पार्टी ने ठीक नामांकन दाखिल करने से कुछ ही पल पहले अपने चुनाव चिन्ह यानी सिंबल वितरित किए, जिससे कई मजबूत दावेदारों को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल करने का मौका तक नहीं मिल सका। इसके बावजूद जैसे ही पार्टी के प्रत्याशियों के नामों की घोषणा हुई, कई अलग-अलग वार्डों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। टिकट वितरण की इस अजीबोगरीब और हड़बड़ी वाली शैली ने पार्टी के भीतर अनुशासन के दावों की पोल खोल दी।
टिकट कटने के बाद उपजी यह भारी नाराजगी अब तेजी से खुली बगावत का रूप ले चुकी है और यही बात दोनों दलों के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बनने जा रही है। टिकट कटने से निराश और आक्रोशित लोग पार्टी कार्यालयों तक अपनी शिकायतें लेकर पहुंचे। कोटा, बाड़मेर, कुचामनसिटी और पाली जैसे शहरों में जमकर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। कई जगहों पर तो गुस्साए कार्यकर्ताओं ने अपने ही जिलों के पार्टी जिलाध्यक्षों के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया और जमकर नारेबाजी की।
पाली और कुचामनसिटी में हंगामा
पाली शहर में कांग्रेस के टिकट वितरण से नाराज दावेदारों ने पार्टी के जिलाध्यक्ष पर सरेआम टिकट बेचने का गंभीर आरोप लगाते हुए भयंकर हंगामा काटा। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस बल की भारी मौजूदगी के बीच जिलाध्यक्ष को किसी तरह सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा। कुचामनसिटी में भी टिकटों में आखिरी वक्त पर फेरबदल किए जाने और अंतिम क्षणों में टिकट काटे जाने को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति भी इससे कुछ अलग नहीं दिखाई दी।
बीजेपी में भी बगावत के सुर
डूंगरपुर जिले में पार्टी द्वारा बाहरी उम्मीदवारों को मैदान में उतारे जाने के विरोध में तमाम कार्यकर्ता सीधे पार्टी कार्यालय जा पहुंचे और अपना रोष जताया। भरतपुर शहर की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही रही, जहां बीजेपी शहर मंडल अध्यक्ष चन्द्रवीर सिंह जधीना का पार्टी की तरफ से टिकट कट गया। टिकट कटने से आहत होकर उन्होंने फौरन भारतीय जनता पार्टी से बगावत कर दी और आगामी चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरने का खुला ऐलान कर दिया।
भीलवाड़ा में कांग्रेस की बड़ी तकनीकी चूक
भीलवाड़ा का मामला तो इन तमाम विवादों से कहीं ज्यादा गंभीर और चिंताजनक साबित हुआ है। कांग्रेस पार्टी की तरफ से तय की गई समयावधि निकल जाने के ठीक बाद 18 प्रत्याशियों की सिंबल सूची रिटर्निंग अधिकारी को सौंपी गई। चुनाव नियमों का हवाला देते हुए रिटर्निंग अधिकारी ने इस लेट-लतीफ सूची को लेने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। इसके बाद बौखलाए समर्थक तुरंत धरने पर बैठ गए और आनन-फानन में राज्य निर्वाचन आयोग से आधिकारिक मार्गदर्शन की मांग की गई, लेकिन आयोग ने उनकी इस अपील को सिरे से खारिज कर दिया।
सिंबल और नामांकन की प्रक्रिया पर सवाल
भीलवाड़ा का यह पूरा विवाद सिर्फ किसी को टिकट मिलने या न मिलने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे तौर पर चुनाव चिन्ह यानी सिंबल आवंटन और नामांकन दाखिल करने जैसी बेहद संवेदनशील प्रक्रिया तक जा पहुंचा। इससे पार्टी की प्रशासनिक पकड़ और चुनाव प्रबंधन की पोल पूरी तरह से खुल गई। यह घटना कांग्रेस के लिए गले की फांस बन गई है जहां तकनीकी गलती ने पूरे अभियान को खतरे में डाल दिया है।
राजनीतिक परिवारों और रिश्तेदारों की धमाकेदार एंट्री
इस बार के टिकट वितरण में दोनों ही बड़े राजनीतिक दलों की तरफ से नेताओं तथा राजनीतिक परिवारों से जुड़े हुए चेहरों की भरमार ने परिवारवाद की पुरानी बहस को एक बार फिर से जोरदार हवा दे दी है। इस सूची में कई ऐसे नाम शामिल हैं जो सीधे तौर पर सत्ता या पार्टी संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के परिवार से आते हैं और इसने आम कार्यकर्ताओं के मन में गहरी निराशा पैदा की है।
प्रमुख नेताओं के रिश्तेदार मैदान में
इस पूरी सूची पर अगर एक सरसरी निगाह डाली जाए तो कई बड़े और रसूखदार नाम खुलकर सामने आते हैं। राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायतीराज मंत्री मदन दिलावर के भाई कृष्ण मुरारी दिलावर को चुनावी रण में उतारा गया है। इसके अलावा राज्य के मुख्यमंत्री के ओएसडी आनंद शर्मा की पत्नी प्रतिभा को भी टिकट मिला है। कांग्रेस के पूर्व प्रत्याशी अजय अग्रवाल की पत्नी सुमनलता और कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष योगेश मिश्रा की पत्नी कमलेश भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहीं।
परिवारवाद के अन्य बड़े उदाहरण
इतना ही नहीं, जयपुर नगर निगम की निवर्तमान मेयर की पुत्रवधू बीना गुप्ता को भी चुनावी टिकट थमाया गया है। इसके साथ ही पूर्व सभापति जीवण खां और उनकी पत्नी खतीजा बानो दोनों ही इस राजनीतिक खेल का हिस्सा बने हैं। पूर्व उपसभापति अशोक चौधरी और उनकी पुत्रवधू का नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल है। भीलवाड़ा के पूर्व विधायक रतन जलधारी के पोते यश जलधारी को भी चुनावी मैदान में उतारकर परिवारवाद को खुलकर बढ़ावा दिया गया है।
आम कार्यकर्ताओं की अनदेखी
इन तमाम उदाहरणों और आंकड़ों से यह बात दूध की तरह बिल्कुल साफ हो जाती है कि इस बार के स्थानीय निकाय चुनावों में सिर्फ और सिर्फ पार्टी संगठन के लिए सालों-साल पसीना बहाने वाले पुराने और सच्चे कार्यकर्ता ही टिकट की इस लंबी दौड़ में अकेले नहीं थे। बल्कि इसके विपरीत, राजनीतिक परिवारों और पहले से ही सत्ता व सियासत में सक्रिय रहे रसूखदार नेताओं से जुड़े करीबी लोगों को भी कई अलग-अलग जगहों पर मलाईदार मौके दिए गए हैं।
एक ही परिवार के कई सदस्यों को टिकट
टिकट बंटवारे के इस पूरे गणित में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह रही कि कई वार्डों में तो एक ही परिवार के एक से अधिक सदस्यों को पार्टी का आधिकारिक टिकट थमा दिया गया। इस तरह के फैसलों ने आम और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं के भीतर भारी रोष भर दिया है। कार्यकर्ताओं का साफ तौर पर यह मानना है कि यदि पार्टियों का यही रवैया जारी रहा, तो पार्टी के भीतर की यह अंदरूनी बगावत आने वाले दिनों में चुनाव परिणाम पर बहुत भारी असर डालेगी और दोनों ही दलों के लिए यह जी का जंजाल साबित होगी।



















