तेजी से भागती इस आधुनिक दुनिया में जहां हर चार सेकंड में कोई नया मैसेज या नोटिफिकेशन हमारी स्क्रीन पर कौंध जाता है, क्या आपको वो गुजरा हुआ वक्त याद है जब दिल की धड़कनें मोबाइल की किसी ट्यून से नहीं बल्कि घर के दरवाजे पर डाकिया की साइकिल की घंटी बजने भर से तेज हो जाया करती थीं? आज वर्ल्ड लेटर राइटिंग डे का मौका है। यह विशेष दिन हम सबको इस अंधी दौड़ वाली डिजिटल जीवनशैली से निकालकर इतिहास के उस खूबसूरत और सुकून भरे दौर में वापस ले जाता है, जहां एक सादे पोस्टकार्ड या नीले रंग के इनलैंड लेटर पर उकेरी गई स्याही में अपनों की पूरी दुनिया बसती थी।
इंतजार का अपना एक अलग और अनूठा सुकून हुआ करता था। वर्तमान समय में यदि कोई व्यक्ति व्हाट्सएप पर दो मिनट तक भी संदेश का जवाब न दे, तो लोग बेचैनी से भर जाते हैं। लेकिन नब्बे के दशक के रिश्ते, अपनापन और जुड़ाव उस लंबे इंतजार पर ही निर्भर करते थे। रोज-रोज डाकिया का इंतजार करना, दूर से खाकी वर्दी वाले को आते देख उम्मीद की किरण जाग उठना और जब हाथ में वह नीले रंग का लिफाफा थमाया जाए तो उसे फाड़ने से पहले ही शरीर में एक सिहरन दौड़ जाना, यह सब आज के किसी भी डिजिटल इमोटिकॉन या जीआईएफ में पाना असंभव है।
डिजिटल चैट और मैसेजिंग ऐप्स में हमारे पास हमेशा बैकस्पेस दबाकर अपने शब्दों को सुधारने या उन्हें पूरी तरह डिलीट करने का विकल्प होता है। इसके विपरीत, पुराने समय में कागज पर उकेरी गई स्याही के साथ कोई अंडू का बटन नहीं जुड़ा होता था। जो शब्द एक बार लिख दिए जाते थे, वे सीधे दिल से निकले हुए सच्चे अहसास हुआ करते थे। कभी-कभी पन्ने पर कटे हुए शब्द, थोड़ी फैली हुई स्याही या फिर सामने वाले को खास महसूस कराने के लिए कागज के कोने पर थोड़ा सा इत्र छिड़क देना, इन सभी छोटी-छोटी बातों के पीछे एक अनूठी और गहरी कहानी छिपी होती थी।
घर की पुरानी अलमारियों, लकड़ी के संदूकों या किसी भारी-भरकम पुरानी किताब के पन्नों के बीच सुरक्षित रखे गए वो पुराने खत केवल कागज के बेजान टुकड़े नहीं थे। वे आज भी उन अनमोल यादों के जीवंत दस्तावेज हैं जो वक्त के साथ कभी पुराने नहीं पड़े। पिता के द्वारा लिखा गया वह सख्त लेकिन असीम ममता से भरा हुआ पत्र, दूर हॉस्टल में बैठकर घर के बने खाने के लिए तड़पती बहन का संदेश, या फिर दोस्तों की वो बेफिक्र बातें जिन्हें केवल एक कोरे कागज पर ही बयां किया जा सकता था। यह बात भी नकारा नहीं जा सकती कि लिखावट हमेशा इंसान के मिजाज का असली आईना होती है, जिससे यह साफ पता चल जाता था कि खत लिखने वाला शख्स खुश है, भावुक अवस्था में है या किसी हड़बड़ी में बैठा है।
ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि आज इंसानों के बीच संवाद या बातचीत कम हो गई है, बल्कि सच्चाई तो यह है कि आज हम हर एक सेकंड एक-दूसरे से डिजिटल रूप से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि क्या इस आधुनिक कनेक्टिविटी में वह असली कनेक्शन अब भी गहरा बचा है? आज व्हाट्सएप की चैट विंडो में हजारों संदेश मौजूद हैं, लेकिन रिश्तों के भीतर एक अजीब सा खालीपन महसूस होने लगा है। वो खत ही थे जो दूर रहने पर भी लोगों को दिल से पास रखते थे, क्योंकि पत्र का हर एक शब्द बहुत सोच-समझकर और आंतरिक गहराइयों से गढ़ा जाता था।
डिजिटल दुनिया की इस अंधी रफ्तार के बीच वर्ल्ड लेटर राइटिंग डे हमें कुछ पल ठहरने और सोचने का अवसर प्रदान करता है। आज अपने स्मार्टफोन को कुछ समय के लिए बिल्कुल दूर रख दीजिए और एक साधारण कागज तथा पेन उठाइए। अपनी मां, अपने किसी पुराने मित्र, अपने जीवनसाथी या फिर खुद अपने ही नाम से एक पत्र लिखिए। जब आपकी उंगलियां कीबोर्ड पर थिरकने की बजाय कागज पर पेन चलाएंगी, तो आपको खुद महसूस होने लगेगा कि जिन बातों को आप कभी मौखिक रूप से कह नहीं पाए या मोबाइल की स्क्रीन पर टाइप नहीं कर सके, वे खुद-ब-खुद पन्नों पर उतरने लगी हैं।
कीबोर्ड के माध्यम से टाइप किए गए डिजिटल संदेश तो शायद समय बीतने के साथ डिलीट हो जाएंगे, लेकिन हाथों से लिखा गया एक पन्ना हमेशा जिंदा रहेगा, चाहे वह किसी पुरानी अलमारी के कोने में हो या फिर किसी अपने के दिल की गहराइयों में।



















