अयोध्या में भव्य राम मंदिर के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के रूप में जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति के बाद से ही हर तरफ इस अनुभवी सैन्य अधिकारी की चर्चा हो रही है। देश की सुरक्षा और विमानन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ जितेंद्र मिश्रा के नाम से भली-भांति परिचित हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान पर्दे के पीछे रहकर एक ऐसा अभूतपूर्व तकनीकी कारनामा अंजाम दिया गया था, जिसने युद्ध की पूरी दिशा ही बदल दी थी। उच्च तकनीकी दक्षता और रणनीतिक सूझबूझ के बल पर एक असंभव दिखने वाले मिशन को पूरा करके भारतीय वायुसेना को निर्णायक बढ़त दिलाई गई थी।
1999 कारगिल युद्ध और दुर्गम चोटियों की चुनौती
यह ऐतिहासिक घटनाक्रम वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान का है, जब कारगिल की ऊंची और पथरीली चोटियों पर तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे जा चुका था। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय सीमा के भीतर अवैध प्रवेश करके टाइगर हिल, तोलोलिंग और मुंथो ढालो जैसी सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण चोटियों पर अपने मजबूत कंक्रीट बंकर बना लिए थे। दुश्मन ऊंचाई वाले स्थानों पर कब्जा जमाकर बैठा था, जिससे नीचे से ऊपर की ओर बढ़ रहे भारतीय सेना के जांबाज जवानों को सीधी गोलाबारी का सामना करना पड़ रहा था। पारंपरिक तोपखाने और सामान्य बमबारी से उन दुर्गम चोटियों पर बने बंकरों को नष्ट करना लगभग असंभव साबित हो रहा था, जिससे भारतीय सीमाओं की रक्षा में एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी।
ऑपरेशन सफेद सागर और शुरुआती मोर्चे की अड़चनें
इस नाजुक स्थिति में भारतीय वायुसेना ने हवाई हमलों के जरिए दुश्मन का सफाया करने की जिम्मेदारी संभाली और 'ऑपरेशन सफेद सागर' का आगाज किया गया। शुरुआत में श्रीनगर एयर बेस पर उपलब्ध मिग फाइटर जेट्स के जरिए अभियान चलाया गया। हालांकि, दुश्मन ऊंचाई पर स्थित होने के कारण विमानरोधी मिसाइलों से लैस था, जिसके कारण शुरुआती चरण में वायुसेना को अपने कुछ फाइटर जेट खोने पड़े। इस शुरुआती क्षति के बाद सैन्य रणनीतिकारों ने हमले की योजना में बदलाव किया और अचूक निशाना साधने वाले लेजर गाइडेड बमों के इस्तेमाल का फैसला लिया गया। उस समय भारतीय वायुसेना के बेड़े में सबसे आधुनिक और शक्तिशाली फाइटर जेट के रूप में मिराज 2000 मौजूद था।
मिराज 2000 और लेजर बम एकीकरण का संकट
नई रणनीति के तहत ग्वालियर एयर बेस पर तैनात मिराज 2000 विमानों से दुश्मन के ठिकानों पर लेजर गाइडेड बम गिराने की योजना तैयार की गई। लेजर गाइडेड बम एक विशेष लेजर बीम के सहारे सीधे दुश्मन के बंकर के प्रवेश द्वार में घुसकर विस्फोट करते हैं और सटीक निशाना साधते हैं। लेकिन इस योजना के सामने एक बड़ा तकनीकी संकट खड़ा हो गया, क्योंकि मिराज 2000 विमानों में लेजर गाइडेड बमों को फिट करने का काम अधूरा था। वायुसेना पिछले दो वर्षों से इस प्रणाली पर काम कर रही थी, लेकिन बम के फ्यूज को केबल और विमान के ऑनबोर्ड सॉफ्टवेयर सिस्टम से जोड़ने में लगातार अड़चनें आ रही थीं। युद्ध शुरू हो चुका था और हर बीतते दिन के साथ हमारे जवान शहीद हो रहे थे, इसलिए महीनों का समय गंवाने की गुंजाइश बिल्कुल नहीं थी। इस आपातकालीन मिशन को पूरा करने के लिए एक विशेष तकनीकी टीम का गठन किया गया, जिसकी कमान स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा के हाथों में सौंपी गई।
अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियां और इजराइल से मिला तकनीकी सहयोग
जितेंद्र मिश्रा 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट के रूप में शामिल हुए थे। उड़ान भरने में निपुण होने के साथ-साथ उनके पास वैमानिकी इंजीनियरिंग और तकनीकी विषयों की असाधारण समझ थी। ग्वालियर एयर बेस के हैंगर में दिन-रात एक करके काम शुरू किया गया। इसी बीच अमेरिका ने इस संकट की घड़ी में भारत को तकनीकी सहायता देने से इनकार कर दिया। ऐसे समय में इजराइल भारत के सहयोग के लिए आगे आया। एक इजराइली रक्षा कंपनी ने 'लिटनिंग टारगेटिंग पॉड' विकसित किया था, जो एक उच्च तकनीक वाली इलेक्ट्रॉनिक आंख की तरह काम करता था और जमीन पर स्थित लक्ष्य पर लेजर रोशनी डालकर उसे लॉक कर देता था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इजराइल के इस पॉड और लेजर बमों को फ्रांस निर्मित मिराज 2000 के कंप्यूटर सिस्टम से कैसे जोड़ा जाए, क्योंकि तीनों की तकनीक, सॉफ्टवेयर कोड और भाषाएं एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न थीं।
स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा का 12 दिनों का तकनीकी चमत्कार
स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा ने इजराइली इंजीनियरों और भारतीय वायुसेना की तकनीकी टीम के साथ मिलकर हैंगर के भीतर मोर्चा संभाला। तारों के जटिल जाल, सर्किट बोर्ड्स और कंप्यूटर कोड्स के बीच बिना सोए लगातार काम जारी रहा। जिस जटिल तकनीकी एकीकरण को पूरा करने में सामान्य परिस्थितियों में 6 महीने से लेकर एक साल तक का समय लगता है, उसे जितेंद्र मिश्रा और उनकी टीम ने अपने तकनीकी कौशल और अटूट समर्पण के बल पर रिकॉर्ड 12 दिनों के भीतर पूरा कर दिखाया। यह भारतीय सैन्य इतिहास का पहला ऐसा अवसर था जब किसी सक्रिय लड़ाकू विमान को इतनी तेजी से संशोधित करके युद्ध के मैदान में उतारा गया था।
24 जून 1999: ऐतिहासिक सटीक हवाई हमला
12 दिनों की दिन-रात की कड़ी मेहनत का वास्तविक परीक्षण 24 जून 1999 की सुबह हुआ। ग्वालियर एयर बेस से संशोधित मिराज 2000 विमानों ने उड़ान भरी और कारगिल के आसमान में प्रवेश किया। टाइगर हिल और मुंथो ढालो पर दुश्मन अपने बंकरों में खुद को सुरक्षित मानकर बैठा था। तभी जितेंद्र मिश्रा की टीम द्वारा तैयार की गई प्रणाली ने काम करना शुरू किया। लिटनिंग पॉड ने लेजर बीम से दुश्मन के बंकरों को लॉक किया और मिराज विमान से लेजर गाइडेड बम दागे गए। सैकड़ों फीट की ऊंचाई से गिरे इन बमों ने पलक झपकते ही पाकिस्तानी ठिकानों और गोला-बारूद के भंडारों को मलबे में तब्दील कर दिया। भारतीय वायुसेना के इतिहास में युद्ध के दौरान लेजर गाइडेड बमों का यह पहला सफल प्रयोग था, जिसने दुश्मन की कमर तोड़ दी।
युद्ध पर प्रभाव और प्रशासनिक अनुभव
इस सटीक हवाई हमले ने कारगिल युद्ध का पूरा पासा पलट दिया और भारतीय थल सेना को चोटियों पर पुनः कब्जा जमाने में निर्णायक मदद दी। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने भी बाद में स्वीकार किया था कि मिराज 2000 के इन अचूक हमलों और वायुसेना-थल सेना के बेहतरीन समन्वय ने ही 1999 की जंग का रुख मोड़ा था। कारगिल की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद जितेंद्र मिश्रा का करियर निरंतर नई ऊंचाइयों को छूता गया। उन्हें 18 से अधिक विभिन्न प्रकार के फाइटर जेट उड़ाने का अनुभव प्राप्त है और उन्होंने 3,000 घंटे से अधिक समय तक लड़ाकू विमानों में उड़ान भरी है। एयर मार्शल के पद तक पहुंचे जितेंद्र मिश्रा अब अयोध्या राम मंदिर के नए सीईओ के रूप में अपनी उच्च रणनीतिक और प्रशासनिक क्षमताओं का योगदान देंगे।





















