उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित गोपालनगर ताड़ी गांव इन दिनों एक गहरे संकट से गुजर रहा है, जहां घाघरा नदी की तेज धाराएं और प्रशासनिक भ्रष्टाचार मिलकर इस बस्ती का नामोनिशान मिटाने पर तुले हैं। सालों से यह इलाका भीषण कटान का सामना कर रहा है, लेकिन इसे रोकने के लिए किए जा रहे उपाय जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं और ग्रामीणों के लिए यह केवल एक बड़ा घोटाला साबित हो रहा है। लगातार जमीन कटने के कारण पूरा गांव खौफ के साए में जीने को मजबूर है।
जियो बैग के नाम पर धोखा और पर्यावरण से खिलवाड़
घाघरा नदी के बढ़ते जलस्तर और कटान को थामने के लिए प्रशासन द्वारा जियो बैग लगाने का काम शुरू किया गया था। लेकिन इस राहत कार्य ने खुद एक नई मुसीबत को जन्म दे दिया है। ग्रामीणों का साफ तौर पर आरोप है कि इन बैगों को भरने के लिए बाहर से बालू या मिट्टी लाने के बजाय ठेकेदार वहीं आसपास की मिट्टी को बेतरतीब ढंग से खोद रहे हैं। किनारे की मिट्टी कटने से कटान रुकने के बजाय और अधिक तेज हो गया है, जो अपने आप में एक भयानक लापरवाही है। इसके अलावा, इस निर्माण कार्य में बाल श्रम कानूनों की भी खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बताया जा रहा है कि ठेकेदार अपने फायदे के लिए इन खतरनाक जगहों पर नाबालिग बच्चों से मजदूरी करवा रहे हैं, जिससे बच्चों की जान भी जोखिम में है।
कागजों पर करोड़ों का खर्च, जमीन पर नदारद
इस पूरी परियोजना में चल रहे वित्तीय गोलमाल ने स्थानीय लोगों के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया है। गोपालनगर ताड़ी के निवासी रामनाथ यादव, अंकित कुमार यादव और संजय कुमार यादव ने इस पूरे भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए बताया है कि जिम्मेदार अधिकारी उनकी किसी भी गुहार को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका दावा है कि ठेकेदार कागजों पर 3 करोड़ रुपये के भारी-भरकम खर्च का बिल बनाते हैं, लेकिन असल में मौके पर 1 लाख रुपये का काम भी नहीं दिखाई देता। घपले का आलम यह है कि नदी किनारे मुश्किल से 300 बोरियां डाली जाती हैं, जबकि बिल 1000 बोरियों का पास कराया जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, जहां ठेकेदार 2 लाख रुपये के निर्माण का दावा करते हैं, वहां असलियत में 2000 रुपये की लागत का काम भी नहीं हुआ होता है।
नक्शे से मिटने की कगार पर गांव
प्रशासनिक अनदेखी और नदी के कहर का सबसे बड़ा खामियाजा यहां के मासूम परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। अब तक करीब 7 पक्के मकान पूरी तरह से घाघरा नदी के गर्भ में समा चुके हैं, जिसके बाद से पूरे इलाके में चीख-पुकार मची हुई है। सरकारी मदद की आस छोड़ चुके लोग अब खुद अपने हाथों से अपनी जिंदगी भर की कमाई से बनाए घरों को तोड़ रहे हैं, ताकि नदी की तेज धार में बहने से पहले कुछ ईंटें और जरूरी सामान बचाया जा सके। कई परिवार पूरी तरह से बेघर हो चुके हैं और उनके पास खुले आसमान के नीचे रातें गुजारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। एक समय था जब इस गांव की आबादी 500 से अधिक थी, लेकिन अब यह मात्र 20 से 25 घरों की एक छोटी सी बस्ती में सिमट कर रह गया है। गांव वालों का डर है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो इस साल के अंत तक गोपालनगर ताड़ी का अस्तित्व पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।
अधिकारियों की बेरुखी और राहत का इंतजार
हर गुजरते दिन के साथ हालात बदतर हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन गहरी नींद में सोया हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल कटान रोकने के नाम पर नए ठेकेदार आते हैं, करोड़ों का भारी-भरकम बजट पास होता है, लेकिन वह सारा पैसा भ्रष्टाचार की मजबूत जड़ों की भेंट चढ़ जाता है। बड़े अधिकारी मुआयना करने आते हैं, स्थिति देखकर चले जाते हैं, लेकिन बेघर हुए लोगों को आज तक कोई बुनियादी राहत सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता तब सामने आई जब संबंधित विभाग के अधिशासी अभियंता संजय मिश्रा से इस बारे में बात की गई। फोन पर उन्होंने साफ कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी ही नहीं है। जिस विभाग पर लोगों की जान बचाने का जिम्मा है, उसके शीर्ष अधिकारी का इस भीषण त्रासदी से अनजान होना प्रशासन की घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता का जीता-जागता सबूत है।




















