उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र का कुंडा खुर्द गांव इन दिनों एक गहरे संकट के मुहाने पर खड़ा है। गंगा नदी के जलस्तर में हुई लगातार वृद्धि के बाद किनारे की मिट्टी का कटान इस कदर उग्र हो चुका है कि नदी की उत्ताल तरंगें गांव की उपजाऊ जमीन को अपने भीतर समाती जा रही हैं। दिन-रात दरकती जमीन और नदी के विकराल रूप को देखकर स्थानीय निवासियों के मन में पूरे गांव का अस्तित्व समाप्त होने का डर बैठ गया है। ग्रामीणों की मानें तो यदि इस भीषण कटान को तुरंत रोकने के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले कुछ ही समय में गांव का एक बहुत बड़ा हिस्सा गंगा की धारा में लीन हो जाएगा।
गंगा का उग्र रूप और 15 दिनों से तेज होता कटान
कुंडा खुर्द गांव के किनारे पहुंचने पर स्थिति की बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर दिखाई देती है। नदी तट पर खड़े रहने के दौरान भी मिट्टी के बड़े-बड़े ढूह अचानक दरक कर पानी में गिरते सुनाई और दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार वैसे तो इस क्षेत्र में मिट्टी का कटाव एक लंबे समय से होता रहा है, लेकिन पिछले करीब 15 दिनों के भीतर इसकी गति में अप्रत्याशित तेजी आई है। जैसे-जैसे जलस्तर में बढ़ोतरी हो रही है, वैसे-वैसे नदी के प्रवाह में तटवर्ती भूमि का कटाव और अधिक आक्रामक होता जा रहा है।
400 साल पुराने ऐतिहासिक पीपल का जलसमाधि लेना
गंगा के इस भीषण कटान की वजह से गांव का एक अति प्राचीन और ऐतिहासिक पीपल का पेड़ भी नदी की तेज धारा में समा गया। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि यह पीपल का पेड़ लगभग 400 से 500 वर्ष पुराना था। यह केवल एक प्राकृतिक वृक्ष भर नहीं था, बल्कि पूरे गांव की सांस्कृतिक, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक पहचान का एक अटूट स्तंभ था। इस पेड़ की शीतल छांव तले गांव की कई पीढ़ियां पली-बढ़ी थीं और वर्ष भर होने वाले अनेक धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों का यह मुख्य केंद्र हुआ करता था। निरंतर होते कटाव के कारण पेड़ की नींव और जड़ें पूरी तरह से खोखली हो गईं, जिससे यह विशालकाय वृक्ष आखिरकार गंगा में समा गया। इसी कटान की चपेट में आकर मिट्टी के साथ बही एक भैंस की भी मौत हो गई, जिसने गांव में व्याप्त खौफ को और गहरा कर दिया है।
10 बीघा उपजाऊ जमीन और मुख्य रास्तों का विनाश
गांव के निवासी पिंटू यादव ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए बताया कि हालिया कटान की लहर में अब तक कम से कम 10 बीघा कृषि योग्य उपजाऊ खेत गंगा नदी में समा चुके हैं। पिंटू यादव का कहना है कि यद्यपि नदी किनारे जमीन कटने की समस्या कई वर्षों से चली आ रही है, परंतु इस वर्ष इसकी विनाशकारी गति ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। कटान के कारण गांव के लोगों के आवागमन के मुख्य रास्ते और नदी तट तक जाने वाले मार्ग पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। पहले जिस मार्ग का उपयोग ग्रामीण स्नान, दैनिक कार्यों और गंगा तट तक पहुंचने के लिए करते थे, वह अब कटाव की बलि चढ़ चुका है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से गुहार लगाई है कि स्थिति की भयावहता को देखते हुए गंगा तट पर अविलंब पक्के सुरक्षा तटबंध और स्नान घाट का निर्माण कराया जाए।
रात-दिन का खौफ और मवेशियों की सुरक्षा पर संकट
एक अन्य स्थानीय निवासी श्रवण सिंह ने बताया कि कटाव की यह समस्या पीढ़ियों पुरानी है, लेकिन इस समय गंगा का रुख अत्यंत आक्रामक बना हुआ है। अतीत में भी कई विशाल पेड़ और उपजाऊ जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े गंगा की धारा में समाहित हो चुके हैं। इस बार तो गांव को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का एक हिस्सा भी कटान की चपेट में आकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि अब स्थिति इतनी खौफनाक हो चुकी है कि रात के समय सोते समय भी मन में अनहोनी की आशंका बनी रहती है। लोगों को हर क्षण यह भय सताता रहता है कि कहीं सोते वक्त ही उनके मकानों के नीचे की जमीन कटकर नदी में न बह जाए। इसके अतिरिक्त, गांव के पशुपालक अपने मवेशियों को लेकर भी अत्यंत चिंतित हैं, क्योंकि नदी किनारे चरने या खूंटे से बंधे जानवरों के लिए कटान का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
प्रशासनिक देरी का आरोप और धार्मिक स्थलों पर मंडराता खतरा
गांव के निवासी राजेश ने बताया कि पिछले करीब एक सप्ताह से गंगा का जलस्तर निरंतर बढ़ रहा है, जिसके साथ ही मिट्टी कटने की रफ्तार भी बेहद तेज हो गई है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि संकट की इस घड़ी में प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर उपस्थित रहकर जमीनी हालात का जायजा लेना चाहिए था, लेकिन समय पर अधिकारियों का न पहुंचना निराशाजनक है। ग्रामीणों का मानना है कि जब जलस्तर बढ़ता है, उसी समय प्रशासन की सक्रिय उपस्थिति और राहत कार्य अत्यंत आवश्यक होते हैं। राजेश ने यह चेतावनी भी दी कि कुंडा खुर्द के आसपास स्थित कई प्राचीन धार्मिक स्थल और पौराणिक मंदिर भी अब इस कटान के सीधे निशाने पर आ चुके हैं। यदि सुरक्षा के ठोस उपाय तत्काल प्रभाव से लागू नहीं किए गए, तो गांव की रिहाइश के साथ-साथ ये पवित्र स्थल भी गंगा में विलीन हो जाएंगे।
स्थायी सुरक्षा तटबंध और पक्के घाट के निर्माण की मांग
कुंडा खुर्द के ग्रामीण अब सरकार और संबंधित प्रशासनिक विभागों से इस त्रासदी का स्थायी समाधान निकालने की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का स्पष्ट रूप से कहना है कि केवल नदी का पानी घटने का इंतजार करना किसी समस्या का हल नहीं है, क्योंकि हर साल जलस्तर बढ़ने पर यही विनाशकारी स्थिति दोहराई जाती है। गंगा के किनारे मजबूत और स्थायी कटान रोधी तटबंध, सुरक्षा दीवारें और व्यवस्थित घाट बनाए जाने की नितांत आवश्यकता है। वर्तमान समय में मौके पर मौजूद ग्रामीणों के चेहरे पर गहरी चिंता साफ दिखाई देती है। कहीं जमीन की दरारें चौड़ी हो रही हैं तो कहीं पेड़ों की जड़ें हवा में लटकी हुई हैं। गंगा की तेज धारा लगातार गांव की जमीन को काट रही है। यदि समय रहते प्रशासनिक तंत्र ने प्रभावी और व्यावहारिक कदम नहीं उठाए, तो कुंडा खुर्द का एक बड़ा भूभाग हमेशा के लिए नक्शे से मिटकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा।
भविष्य को लेकर ग्रामीणों की टिकी निगाहें
वर्तमान में कुंडा खुर्द गांव में गंगा का यह बढ़ा हुआ पानी केवल फसलों और खेतों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने ग्रामीणों के आशियानों, संपर्क मार्गों, आस्था के केंद्रों और उनके बच्चों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। गांव के असहाय लोग अब टकटकी लगाए प्रशासनिक महकमे और जिम्मेदार अधिकारियों की ओर देख रहे हैं कि कब वे धरातल पर आकर कटान को रोकने के लिए ठोस, प्रभावी और दीर्घकालिक कदम उठाते हैं।























