उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का ऐतिहासिक और पौराणिक ददरी मेला कई अनोखी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासतों का साक्षी रहा है। इस विशाल आयोजन का एक बेहद चर्चित और अहम हिस्सा यहां लगने वाला गर्दभ यानी गदहा मेला था। यह मेला केवल चौपायों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने दशकों तक सामाजिक एकजुटता, पारंपरिक न्याय व्यवस्था और पारिवारिक रिश्तों को जोड़ने में एक अनोखा मंच प्रदान किया।
राष्ट्रीय स्तर पर जुटते थे विभिन्न राज्यों के पशुपालक
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार ददरी मेले का गदहा बाजार वस्तुतः एक राष्ट्रीय मेले का रूप ले चुका था। इस मेले में मुख्य रूप से रजक समुदाय यानी कपड़ा धोने वाले धोबी समाज के लोग भारी संख्या में भाग लेते थे। मध्य प्रदेश, उड़ीसा, बिहार और पड़ोसी देश नेपाल तक से लोग अपने गधों को लेकर बलिया पहुंचते थे। यहां कई दिनों तक डेरा डालकर पशुओं का व्यापार किया जाता था और दूर-दराज के प्रांतों से आए लोग एक-दूसरे से मिलते थे।
मेले के परिसर में ही तय हो जाते थे विवाह
इस अनूठे मेले की सबसे दिलचस्प विशेषता यह थी कि व्यापारिक गतिविधियों के बीच सामाजिक संबंध भी बनते थे। विभिन्न प्रदेशों से आए परिवारों के बीच बातचीत होती थी और वहीं मेले के मैदान में ही युवक-युवतियों के रिश्ते पक्के कर दिए जाते थे। कई बार तो रस्म-रिवाज पूरे करके मेले के भीतर ही विवाह संस्कार भी संपन्न करा दिए जाते थे, जिससे यह व्यापारिक आयोजन एक बड़े पारिवारिक उत्सव में बदल जाता था।
थाने और कचहरी के बिना पंचायत में सुलझते थे आपसी विवाद
पशु व्यापार और वैवाहिक संबंधों के अलावा यह मेला सामाजिक न्याय की एक मजबूत मिसाल भी पेश करता था। विभिन्न क्षेत्रों के सरपंच और पंच भी अपने लोगों के साथ इस मेले में उपस्थित रहते थे। रजक समुदाय के लोग अपने आपसी, पारिवारिक और पारंपरिक विवादों को लेकर पुलिस चौकी, थाने या कचहरी जाने के बजाय मेले के दौरान बैठने वाली पंचायत में ही रखते थे। सभी पक्ष एक साथ बैठकर चर्चा करते थे और सरपंचों की सहमति से विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कर लिया जाता था।
कोरोना काल में थम गई थी रौनक, फिर जगी पुनर्जीवन की आस
दशकों तक चली यह समृद्ध परंपरा कोरोना काल के दौरान गंभीर रूप से प्रभावित हुई और पाबंदियों के चलते गदहा मेला धीरे-धीरे लगना बंद हो गया था। हालांकि इस वर्ष ददरी मेले में पशु मेला आयोजित होने जा रहा है। इस आयोजन से स्थानीय लोगों और व्यापारियों में यह उम्मीद बंधी है कि पारंपरिक गर्दभ मेला भी पुनः अपनी पुरानी रौनक के साथ लौटेगा और सामाजिक पंचायत व शादियों की वह पुरानी तस्वीर एक बार फिर बलिया की धरती पर जीवंत हो सकेगी।



















