उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में 15 अक्टूबर को उस वक्त अफरातफरी मच गई जब विकास भवन स्थित जिला पंचायती राज अधिकारी कार्यालय परिसर में एक शिकायतकर्ता ने खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्महत्या करने की कोशिश की। मौके पर मौजूद सतर्क कर्मचारियों ने तत्परता दिखाते हुए उसे आग लगाने से पहले ही रोक लिया और बड़ा हादसा टल गया। इस सनसनीखेज घटना के बाद शिकायतकर्ता ने खुले तौर पर डीपीआरओ पर पांच लाख रुपये रिश्वत लेकर भ्रष्ट ग्राम प्रधान को बचाने और कार्रवाई दबाने का आरोप जड़ दिया, जबकि डीपीआरओ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
ग्राम सभा की जमीन पर अवैध दुकान निर्माण और बिक्री का विवाद
पूरा मामला फतेहपुर के गाजीपुर ब्लॉक की एक ग्राम पंचायत से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता अजय प्रताप सिंह उर्फ जब्बार सिंह का कहना है कि ग्राम सभा की कलेक्टर दर्ज जमीन पर ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी यानी सचिव ने मिलीभगत करके अवैध रूप से दुकानों का निर्माण करवाया था। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर तैयार की गई इन दुकानों को सात-सात और दस-दस लाख रुपये में बेचकर भारी वित्तीय अनियमितता की गई।
आरटीआई के जरिए मांगी गई सूचना में भी यह तथ्य सामने आया कि ग्राम पंचायत की इन दुकानों की कोई आधिकारिक या खुली नीलामी नहीं कराई गई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि पूर्व में बैठाई गई कई विभागीय जांचों में ग्राम प्रधान को दोषी पाया गया था, लेकिन इसके बावजूद उस पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।
जांच, नोटिस और पांच लाख रुपये की रिश्वत का आरोप
शिकायतकर्ता अजय प्रताप सिंह का आरोप है कि ग्राम प्रधान ने डीपीआरओ दफ्तर में पांच लाख रुपये की घूस देकर कार्रवाई की फाइल को अटका दिया। उनका कहना था कि पिछले तीन वर्षों से जांच और आश्वासन के नाम पर उन्हें लगातार दौड़ाया जा रहा है, और यदि यही सुस्त रवैया रहा तो न्याय मिलने से पहले ही उनकी जान चली जाएगी। इस घटना के बाद वहां पहुंचे अधिवक्ता गुप्ता और अन्य स्थानीय लोगों ने भी पंचायती राज कार्यालय में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों पर गंभीर सवाल उठाए।
प्रशासनिक पक्ष और डीपीआरओ की सफाई
दूसरी ओर, डीपीआरओ ने रिश्वत लेने के सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत बताया है। उन्होंने प्रशासनिक प्रक्रिया की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि दुकानों के निर्माण की शिकायत पर एक जांच समिति गठित की गई थी। इस समिति की जांच रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी ने 25 सितंबर को ग्राम प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जिसमें 15 दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने का समय दिया गया था।
डीपीआरओ के मुताबिक यह नोटिस 7 अक्टूबर को ग्राम प्रधान को आधिकारिक रूप से तामील करा दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचायती राज व्यवस्था के नियमों के तहत अंतिम कार्रवाई का अधिकार जिलाधिकारी स्तर पर सुरक्षित है, इसलिए डीपीआरओ स्तर से किसी भी तरह की फाइल रोकने अथवा मिलीभगत करने की बात बिल्कुल गलत है।























