उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बढ़ती गर्मी अब केवल थर्मामीटर के पारे तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके साथ घुलती भारी नमी ने इंसानी सेहत के लिए घातक हीट स्ट्रेस की चुनौती खड़ी कर दी है। वायुमंडल में आर्द्रता का स्तर बढ़ने के कारण अक्सर वास्तविक तापमान सामान्य दिखने के बावजूद मानव शरीर कहीं अधिक भीषण तपन महसूस करता है। प्रतिष्ठित विज्ञान शोध पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित एक गहन रिपोर्ट के चेतावनी भरे निष्कर्ष बताते हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उच्च उत्सर्जन की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो वर्ष 2050 तक लखनऊ में अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली असामयिक मौतों में लगभग 50 फीसदी का इजाफा हो सकता है। शहर के लगातार फैलते दायरे और आबादी के घनत्व को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि लखनऊ में हर साल लगभग 4,000 लोगों की जान अत्यधिक गर्मी और उमस से जुड़ी जटिलताओं के कारण जा सकती है।
सिंधु गंगा के मैदानी इलाके और लखनऊ की भौगोलिक बनावट
ग्लोबल वार्मिंग के वैश्विक असर और स्थानीय मौसम के मिजाज पर चर्चा करते हुए भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के.जे. रमेश ने इस संकट के भौगोलिक कारणों को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के साथ ही सिंधु-गंगा के पूरे मैदानी क्षेत्र की हवा में नमी धारण करने की क्षमता काफी बढ़ गई है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इसी भौगोलिक क्षेत्र के ठीक मध्य में स्थित है। लखनऊ का निचला धरातल और एक बंद कटोरे अथवा बेसिन जैसी प्राकृतिक संरचना हवा के स्वाभाविक प्रवाह को धीमा कर देती है। इस कारण वायुमंडल में मौजूद आर्द्रता लंबी अवधि तक एक ही स्थान पर फंसी रह जाती है। जब हवा में नमी का प्रतिशत अत्यधिक होता है, तब इंसानी त्वचा से पसीना आसानी से नहीं वाष्पीकृत हो पाता। पसीना न सूखने से शरीर की प्राकृतिक तापीय नियंत्रण प्रणाली यानी थर्मोरेगुलेशन पूरी तरह प्रभावित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों में गंभीर सांस संबंधी बीमारियां और तापीय तनाव से जुड़ी अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने लगती हैं।
एक दशक के आंकड़े: 35 फीसदी बढ़े उमस भरी भीषण गर्मी के दिन
पर्यावरण और जलवायु नीतियों पर शोध करने वाले थिंक टैंक 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के एक विस्तृत आंकड़े लखनऊ की चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2015 से लेकर 2024 के दस सालों के दौरान लखनऊ में ऐसे कुल 289 दिन दर्ज किए गए, जब दिन का अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक था और साथ ही हवा में सापेक्ष आर्द्रता 60 प्रतिशत या उससे ऊपर बनी रही। यदि हम इस दशक को दो पांच-वर्षीय चरणों में बांटकर देखें, तो स्थिति की गंभीरता साफ झलकती है। वर्ष 2015 से 2019 के बीच शहर में ऐसे भीषण उमस वाले 123 दिन रिकॉर्ड किए गए थे, यानी औसतन हर साल लगभग 24.6 दिन। वहीं, वर्ष 2020 से 2024 के अगले पांच वर्षों में यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 166 दिनों तक पहुंच गया। इस प्रकार पिछले पांच सालों में उमस भरी भीषण गर्मी के दिनों में सीधे 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अकेले वर्ष 2020 में रिकॉर्ड 45 दिन ऐसे रहे, जब लोगों को अत्यधिक तापमान और असहनीय उमस का एक साथ सामना करना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा लखनऊ का अनियोजित शहरी विकास, कंक्रीट के बढ़ते जंगल और अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव स्थानीय स्तर पर तापमान को और ज्यादा बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं।
गर्म होती रातें: शरीर को नहीं मिल पा रहा राहत का समय
लखनऊ में गर्मी का संकट सिर्फ दिन के उजाले तक सीमित नहीं है, बल्कि रात के समय का तापमान भी लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। जलवायु आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 के दौरान लखनऊ में 126 गर्म रातें दर्ज की गईं। इससे पहले वर्ष 2015 में 124 गर्म रातें और वर्ष 2016 में 128 ऐसी रातें दर्ज की गई थीं। यहां तक कि वर्ष 2018 में, जब इस दशक में गर्म रातों की संख्या सबसे कम रही, तब भी आंकड़ा 93 रातों पर था। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि रात के तापमान का असामान्य रूप से ऊंचा रहना अब कोई अपवाद नहीं बल्कि एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जब रात का तापमान ठंडा नहीं होता, तब मानव शरीर को दिनभर झेली गई भीषण गर्मी के असर और शारीरिक तनाव से उबरने के लिए आवश्यक कूलिंग टाइम नहीं मिल पाता। इससे अगले दिन के लिए शरीर की सहनशक्ति और कमजोर हो जाती है।
हीट स्ट्रोक का बढ़ा खतरा और सरकारी नीतियों में बदलाव की मांग
वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक सीमा जावेद ने नमी और गर्मी के इस खतरनाक मेल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वायुमंडल में अत्यधिक नमी के कारण शरीर से पसीने का वाष्पीकरण रुक जाता है। पसीना न सूखने से शरीर की आंतरिक शीतलन प्रक्रिया ठप पड़ जाती है, जिससे तुलनात्मक रूप से कम थर्मामीटर तापमान पर भी लोगों को अचानक हीट स्ट्रोक होने का जोखिम बहुत बढ़ जाता है। वैज्ञानिक सीमा जावेद का कहना है कि जनमानस को यह स्वीकार करना होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक गर्मियों का दौर खत्म हो चुका है। अब इस नई भीषण वास्तविकता का मुकाबला करने के लिए निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी वालों और अन्य खुले में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों की कार्य स्थितियों एवं काम के घंटों से जुड़ी सरकारी नीतियों में व्यापक बदलाव करना होगा, साथ ही सामाजिक और सामुदायिक स्तर पर आपातकालीन तैयारियां सुनिश्चित करनी होंगी।
काम के घंटों का नुकसान और अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
एनआरडीसी इंडिया में जलवायु अनुकूलनशीलता एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अभियंत तिवारी ने आंकड़ों के विश्लेषण पर चिंता जताते हुए कहा कि 2015-19 और 2020-24 की अवधि के बीच उमस भरे दिनों में 35 फीसदी का उछाल बेहद गंभीर चेतावनी है। दिन की नमी और रात के लगातार उच्च तापमान का असर सीधे तौर पर देश की कार्यबल उत्पादकता पर पड़ रहा है। जब हवा का वेट बल्ब ग्लोब तापमान (WBGT) 30 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है, तब असुरक्षित गर्मी के कारण सालाना कुल कार्य घंटों का लगभग 20 फीसदी हिस्सा प्रभावित होने लगता है। यदि शहर में प्रदूषण का स्तर भी बहुत अधिक हो, तो कार्य समय का यह नुकसान बढ़कर 30 से 40 फीसदी तक पहुंच सकता है। कार्य उत्पादकता में इस बड़ी गिरावट के कारण स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को हर साल अरबों डॉलर का वित्तीय नुकसान होने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों की सर्वसम्मत राय है कि लखनऊ की भावी एक्शन प्लान नीति में केवल अधिकतम तापमान मापने के बजाय हवा की नमी, रात के ऊंचे तापमान, अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सुरक्षा को प्राथमिक आधार बनाया जाना चाहिए।





















