उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में नदियों के विकराल रूप ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। घाघरा नदी द्वारा किए गए भारी कटान के बाद अब गंगा नदी के जलस्तर में उफान आने से तबाही का मंज़र देखने को मिल रहा है। शहर के निचले इलाकों में पानी का बहाव तेजी से बढ़ रहा है, जिससे निहोरा नगर सहित कुल नौ रिहाइशी कॉलोनियां जलमग्न हो चुकी हैं। पूरा इलाका पानी से घिरकर टापू में तब्दील हो गया है, जहाँ हजारों लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। पानी का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है, जिससे आसपास के इलाकों में हड़कंप मचा हुआ है।
राशन कार्ड हाथ में लिए मदद की आस लगाए बैठीं महिलाएं
बाढ़ के पानी के बीच घिरे इलाकों में जब राहत कार्य या किसी के आगमन की आहट होती है, तो पानी के बीच फंसे लोग उम्मीद की किरण तलाशने लगते हैं। निहोरा नगर और आसपास की बस्तियों की महिलाएं अपने हाथों में राशन कार्ड लेकर पानी से भरे रास्तों पर दौड़ पड़ती हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि शायद कोई प्रशासनिक टीम या समाजसेवी संस्था उनकी सुध लेने आई है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि अब तक पीड़ित परिवारों तक कोई राहत सामग्री या सहायता नहीं पहुंच सकी है। स्थानीय निवासी पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ दिए गए हैं और चारों ओर फैले पानी के बीच लाचार नजर आ रहे हैं।
बाढ़ के प्रकोप के साथ-साथ इलाके में जहरीले सांपों और बिच्छुओं का खौफ भी तेजी से बढ़ रहा है। जलभराव के कारण ज़हरीले जीव-जंतु घरों और अस्थायी शरण स्थलों में घुस रहे हैं। कृष्णा कुमार गुप्ता ने बताया कि करीब नौ कॉलोनियां पूरी तरह से जलमग्न हो चुकी हैं और आवागमन के तमाम रास्ते बंद हो गए हैं। पानी लगातार बढ़ने से लोगों के मन में डूबने और जलीय जीवों के हमले का डर बना हुआ है।
दूध, पीने का पानी और बिजली का गहराया संकट
स्थानीय निवासी गुड़िया देवी ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि उन्हें सरकार से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन जिला प्रशासन की तरफ से अब तक कोई मदद नहीं पहुंचाई गई है। छोटे बच्चों को संभालना बेहद मुश्किल हो गया है। घर में खाने-पीने की चीजों का अकाल पड़ गया है। एक अन्य महिला ने बताया कि उनका मासूम बच्चा दूध न मिलने के कारण भूख से तड़प रहा है। जलभराव के कारण मुख्य शहर तक जाकर दूध और अन्य आवश्यक सामान लाना बेहद जोखिम भरा हो गया है।
इलाके में बिजली व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ी हुई है, जिसके कारण रातें भयानक अंधेरे में कट रही हैं। पीने के स्वच्छ पानी की भारी किल्लत हो गई है। एक महिला के घर में देर रात अचानक बाढ़ का पानी घुस गया, जिससे बचने के लिए उन्हें तुरंत नाव की मदद से बाहर निकलना पड़ा। जब वह अपना सामान लेकर सुरक्षित जगह पहुंचीं, तो उनके झोले के अंदर एक जहरीला सांप छिपा हुआ मिला। हालांकि, समय रहते सांप का पता चलने से एक बड़ा हादसा टल गया। पीड़िता ने प्रशासन से अविलंब राहत शिविर और सहायता पहुंचाने की गुहार लगाई है।
अंधेरे में रातें काटने को मजबूर बुजुर्ग और घायल
बाढ़ का कहर बुजुर्गों और बीमार लोगों पर सबसे ज्यादा टूट रहा है। बुजुर्ग महिला प्रभावती ने बताया कि उनके पूरे घर में पानी भर चुका है और हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। घर के भीतर पानी भरने के दौरान एक छत का पंखा गिर गया, जिसकी चपेट में आने से उनके हाथों में गंभीर चोटें आईं। इलाज के लिए किसी भी तरह की डॉक्टरी सुविधा न होने के कारण उन्हें नाव पर सवार होकर मेडिकल स्टोर तक जाना पड़ा, जहाँ से उन्होंने दर्द की दवाइयां खरीदीं। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि जिला प्रशासन की ओर से कोई प्राथमिक चिकित्सा या एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं की गई है।
हरीना वर्मा का कहना है कि बिजली की अनुपस्थिति के कारण पूरी-पूरी रात अंधेरे के साए में गुजारनी पड़ रही है। खाने-पीने के राशन का संकट गहराता जा रहा है, जिससे लोग हर पल डर के साए में जीने को मजबूर हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से तुरंत खाद्य सामग्री, पीने का पानी और रोशनी का प्रबंध करने की मांग की है।
नाव और मोमबत्ती के सहारे बच्चों की शिक्षा
इस प्राकृतिक आपदा का सबसे बुरा असर स्कूली बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। कक्षा 6 की छात्रा इशानी ने बताया कि उनका स्कूल जाना पूरी तरह से नाव पर निर्भर हो गया है। कई बार नाव न मिलने पर उन्हें घुटने तक भरे पानी में से पैदल गुजरना पड़ता है, जिससे उनकी पूरी स्कूली ड्रेस भीग जाती है। रात के समय बिजली न होने के कारण उन्हें मोमबत्ती जलाकर पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
कक्षा 4 में पढ़ने वाली छात्रा स्नेहा सोनी ने बताया कि शाम ढलते ही चारों तरफ अंधेरा छा जाता है, जिससे वह रात में पढ़ाई नहीं कर पाती हैं। सुबह स्कूल जाने के रास्ते पूरी तरह जलमग्न हैं, जिससे स्कूल पहुंचना अत्यंत कठिन हो गया है। बच्ची ऋतु गुप्ता ने भी अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि बाढ़ के पानी के कारण आना-जाना इतना कठिन है कि उन्हें अपने जूते हाथ में खोलकर पानी में चलना पड़ता है।
कक्षा 6 की छात्रा खुशबू ने बताया कि बाढ़ के पानी के बीच स्कूल आने-जाने में अत्यधिक शारीरिक और मानसिक कष्ट उठाना पड़ रहा है। वहीं नाव से उतरकर घर लौट रही कक्षा 7 की छात्रा किंजल गुप्ता ने भावुक होकर बताया कि आवागमन की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि पानी ऐसे ही बढ़ता रहा, तो खुले नालों का जलस्तर भी ऊपर आ जाएगा, जिसके बाद स्कूल जाना पूरी तरह असंभव हो जाएगा और उनकी पढ़ाई हमेशा के लिए छूट सकती है।





















