हाड़ौती क्षेत्र के वन्यजीव संसार से एक सकारात्मक और उत्साह बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है। कभी कोटा के उदपुरिया गांव में बड़ी संख्या में डेरा डालने वाले पेंटेड स्टार्क या जांघिल पक्षियों ने पुराने आवास उजड़ने के बाद नई जगहों पर अपना आशियाना बसा लिया है। मानवीय गतिविधियों के बढ़ने, अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और जल स्रोतों की बदहाली के कारण इन खूबसूरत मेहमानों को अपना पुराना घर छोड़ना पड़ा था, लेकिन उन्होंने इस इलाके को पूरी तरह अलविदा नहीं कहा। अब इन पक्षियों ने कोटा के ही राजपुरा और गोदलियाहेड़ी गांवों के जलाशयों को अपनी नई शरणस्थली बना लिया है।
उदपुरिया का पुराना इतिहास और पलायन की मजबूरी
प्रकृति प्रमोटर एएच जैदी के अनुसार, इन पक्षियों ने करीब तीन दशक पहले कोटा के उदपुरिया गांव में दस्तक दी थी। उस वक्त गांव के बड़े तालाब के बीच स्थित बबूल के विशाल पेड़ों पर सैकड़ों की संख्या में ये पक्षी शरण लेते थे। यह स्थान मध्य भारत में पेंटेड स्टार्क की सबसे प्रमुख बस्तियों में शुमार होता था। हालांकि, वक्त के साथ शहरीकरण की दौड़ और संरक्षण के अभाव ने इस प्राकृतिक धरोहर को गंभीर रूप से प्रभावित किया। तालाब के बीच के पेड़ नष्ट होने लगे, पानी दूषित हो गया और जलीय जीवों की तादाद घटने लगी। इन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते वर्ष 2015 के दौर में हालात इस हद तक बदल गए कि पक्षियों को दशकों पुराना ठिकाना छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
राजपुरा और गोदलियाहेड़ी में नई उम्मीद
पुराना बसेरा उजड़ने के बावजूद इन पक्षियों ने हाड़ौती अंचल को नहीं छोड़ा और भोजन तथा सुरक्षित माहौल की तलाश में राजपुरा और गोदलियाहेड़ी का रुख कर लिया। इन दोनों गांवों के बीच लगभग 5 किलोमीटर की दूरी है। इस बार के प्रजनन सीजन में विशेष तौर पर गोदलियाहेड़ी क्षेत्र में पेंटेड स्टार्क की आवाजाही और गतिविधियां काफी अधिक दर्ज की जा रही हैं। पक्षियों ने यहां के स्थानीय पेड़ों पर बड़ी संख्या में घोंसले तैयार किए हैं और अंडे भी दिए हैं। हालांकि राजपुरा में इस बार पिछले साल की तुलना में घोंसलों की गिनती थोड़ी कम जरूर रही है, फिर भी विशेषज्ञों को पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यहां भी पक्षियों की संख्या में इजाफा होगा। यदि मौसम और अन्य परिस्थितियां अनुकूल बनी रहीं, तो सितंबर के अंतिम सप्ताह तक इन घोंसलों से नन्हें चूजों की आवाजें सुनाई देने लगेंगी।
पक्षी पर्यटन की संभावना और संरक्षण की पुकार
वन्यजीव जानकारों का मानना है कि राजपुरा और गोदलियाहेड़ी के इलाके पक्षी पर्यटन के लिहाज से अपार संभावनाएं समेटे हुए हैं। इन स्थानों पर साल के कम से कम छह महीने तक पेंटेड स्टार्क की विभिन्न गतिविधियां जैसे कि घोंसला बनाना, अंडे देना और भोजन खोजना बहुत आसानी से देखी जा सकती हैं। स्थानीय प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने प्रशासन के समक्ष कुछ जरूरी मांगें रखी हैं ताकि इन मेहमानों का संरक्षण किया जा सके। इसके तहत जलाशयों के आसपास बड़े पैमाने पर देशी पौधे लगाने, बिना किसी बाधा के पक्षियों को देखने के लिए वॉच टावर बनवाने और तालाबों के जल स्तर तथा स्वच्छता को बनाए रखने के लिए विशेष नीति तैयार करने पर जोर दिया गया है। पेंटेड स्टार्क केवल सुंदर दिखने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि वे किसी भी क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और जीवंत जलाशयों की सबसे बड़ी पहचान होते हैं। उदपुरिया का अतीत भले ही धुंधला हो गया हो, लेकिन राजपुरा और गोदलियाहेड़ी में पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक नई उम्मीद जगी है। अब यह पूरी तरह प्रशासन और स्थानीय नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है कि वे इस नए आशियाने को बचाने के लिए आगे आएं।


















