कानपुर के प्राणी उद्यान में आसमान में लगातार दुर्लभ होते जा रहे गिद्धों की संख्या में सुधार लाने के लिए एक विशेष ब्रीडिंग सेंटर स्थापित करने की योजना बनाई गई है। राज्य भर में पिछले पाँच वर्षों के भीतर गिद्धों की आबादी 700 से 800 के आँकड़े से भारी गिरावट के बाद सीधे 200 से 300 के बीच सिमट कर रह गई है। इस तीव्र गति से घटती संख्या को रोकने के लिए अब इनके संरक्षण और कृत्रिम व प्राकृतिक दोनों तरीकों से प्रजनन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कानपुर जू में बनने जा रहा यह नया ब्रीडिंग सेंटर इस विलुप्तप्राय प्रजाति को बचाने की दिशा में एक बहुत बड़ा और प्रभावी कदम साबित होगा।
पर्यावरण के लिए जरूरी और वैज्ञानिकों की चिंता
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर अलका दुबे ने इस संकट पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बीते कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में गिद्धों की संख्या में भारी कमी आई है। करीब पाँच साल पहले तक राज्य में इनकी कुल संख्या 700 से 800 के आसपास आँकी गई थी, जो अब गिरकर केवल 200 से 300 के बीच ही बची है। प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए गिद्ध बेहद आवश्यक पक्षी माने जाते हैं। इनकी आबादी में आ रही इस तरह की भारी गिरावट से हमारे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक संतुलन पर विपरीत असर पड़ सकता है। यही कारण है कि वन्यजीव विशेषज्ञों द्वारा इनके संरक्षण के लिए युद्धस्तर पर और जल्द से जल्द ठोस कदम उठाने की आवश्यकता जताई जा रही है।
कानपुर जू का उपयुक्त माहौल और आठ प्रजातियाँ
विशेषज्ञों का मानना है कि कानपुर जू का परिसर गिद्धों के प्रजनन और उनके रहने के लिए एक अनुकूल और बेहतरीन माहौल उपलब्ध कराता है। यहाँ का क्षेत्रफल काफी बड़ा है और यहाँ की भरपूर हरियाली वन्यजीवों के अनुकूल है। इस परिसर में पहले से ही कई अन्य वन्यजीवों का लगातार सफलतापूर्वक प्रजनन हो रहा है और उनकी प्रजनन दर भी काफी संतोषजनक रही है। इसी सफलता को ध्यान में रखते हुए, गिद्धों के लिए भी उनके प्राकृतिक वास जैसा शांत और सुरक्षित माहौल तैयार किया जाएगा ताकि वे सहजता से प्रजनन कर सकें। डॉक्टर अलका दुबे ने जानकारी दी कि उत्तर प्रदेश की भौगोलिक सीमा में गिद्धों की कुल आठ प्रजातियाँ पाई जाती हैं, और इन सभी की सुरक्षा व संरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। जब कानपुर जू में यह नया ब्रीडिंग सेंटर बनकर तैयार हो जाएगा, तब विशेष रूप से गिद्धों के प्रजनन चक्र पर फोकस किया जा सकेगा। इससे समय के साथ धीरे-धीरे इनकी संख्या को वापस बढ़ाने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। पक्षियों की यह बढ़ती हुई संख्या न केवल वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होगी, बल्कि हमारे पूरे पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यधिक लाभदायक साबित होगी।
प्रजनन की धीमी रफ्तार और प्रकृति के सफाईकर्मी
गिद्धों की संख्या में तेजी से इज़ाफ़ा करना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि इनकी जैविक प्रक्रिया काफी धीमी होती है। डॉक्टर अलका दुबे ने स्पष्ट किया कि गिद्ध पूरे साल भर में केवल एक ही बार अंडा देते हैं। इस जीववैज्ञानिक विशेषता के कारण अन्य कई सामान्य पक्षियों की तुलना में इनकी आबादी बहुत धीमी गति से बढ़ती है। इसी वजह से इनके संरक्षण के लिए सरकार और वन्यजीव संगठनों को लंबे समय तक लगातार और धैर्यपूर्वक प्रयास करने होंगे। देश के अलग-अलग हिस्सों में अधिक से अधिक संख्या में ब्रीडिंग सेंटर बनाए जाने से इस संपूर्ण संरक्षण अभियान को काफी तेज गति मिल सकती है। गिद्धों की एक और बड़ी खासियत यह है कि वे केवल मृत जीवों का ही आहार ग्रहण करते हैं। इस अनूठी आदत के कारण वे प्रकृति में एक कुशल सफाईकर्मी की भूमिका निभाते हैं। मरे हुए जानवरों को खाकर वे वातावरण में फैलने वाली सड़न, बदबू और खतरनाक संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम करने में मदद करते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण चक्र में गिद्धों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान है। किसी चिड़ियाघर या जू के नियंत्रित दायरे में इन पक्षियों के लिए भोजन और नियमित स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था करना भी अपेक्षाकृत काफी आसान होता है।
देशभर में नेटवर्क की जरूरत
डॉक्टर अलका दुबे ने यह भी रेखांकित किया कि केवल एक जगह से काम नहीं चलेगा, बल्कि गिद्धों की समग्र आबादी को बढ़ाने के लिए पूरे देश भर में ब्रीडिंग सेंटरों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार करने की सख्त जरूरत है। कानपुर जू में स्थापित होने वाला यह आगामी ब्रीडिंग सेंटर इसी दूरगामी दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर साबित होने वाला प्रयास है। इस सुरक्षित केंद्र के माध्यम से गिद्धों का व्यवस्थित प्रजनन कराया जाएगा और उनकी संख्या में क्रमिक वृद्धि की जाएगी, ताकि आने वाले भविष्य में एक बार फिर से आसमान में इनकी उड़ान और बहुतायत देखने को मिल सके।



















