उत्तर प्रदेश के मऊ और देवरिया जनपद को आपस में जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी मोहन सेतु परियोजना पिछले 12 वर्षों से अधर में लटकी हुई है। देवरांचल क्षेत्र के निवासियों के लिए यह पुल नदी पार करने का सबसे सीधा जरिया बनने वाला था। लेकिन निर्माण कार्य पूरा न होने के कारण स्थानीय लोगों की दैनिक आवाजाही बेहद कष्टप्रद हो गई है। जिस दूरी को तय करने में मात्र 5 किलोमीटर का सफर लगता, उसी के लिए अब ग्रामीणों को 20 से 35 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करके घूमकर जाना पड़ रहा है। इस प्रशासनिक लापरवाही का सबसे गंभीर असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है, क्योंकि आपात स्थिति में मरीजों को सही समय पर अस्पताल पहुंचाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
बरहज बाज़ार पहुंचने के लिए घंटों नाव का इंतजार और लंबा सफर
देवरा क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए दैनिक जरूरतों का मुख्य केंद्र बरहज बाज़ार है। बाज़ार जाने के लिए लोगों को नदी पार करनी पड़ती है। नदी पार करने के लिए यहां केवल दो नावों का संचालन किया जाता है, जिसके कारण लोगों को नदी तट पर घंटों इंतजार करना पड़ता है। स्थानीय निवासी रामानंद ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति बाज़ार के काम से निकलता है तो उसकी पूरी सुबह से शाम इसी सफर में बीत जाती है। भीषण धूप के बीच नदी किनारे बैठकर तीन से चार घंटे तक नाव का इंतजार करना पड़ता है। यदि लोग नाव का इंतजार छोड़ दूसरे रास्ते से जाना चाहें, तो उन्हें 20 से 35 किलोमीटर लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ता है। इस मजबूरी के कारण लोगों को जोखिम उठाकर नाव का ही सहारा लेना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सेतु का निर्माण कार्य समय पर पूरा हो गया होता तो क्षेत्रवासियों का जीवन काफी सुगम हो जाता।
28 फरवरी 2014 को रखी गई थी आधारशिला, सेतु निगम के पास है जिम्मेदारी
इस पुल के निर्माण का इतिहास 12 वर्ष पुराना है। स्थानीय निवासी चन्दपाल के अनुसार देवरिया और मऊ को जोड़ने वाले इस मोहन सेतु का शिलान्यास 28 फरवरी 2014 को किया गया था। स्वर्गीय मोहन सिंह के नाम पर प्रस्तावित यह पुल लगभग 12108 मीटर लंबा है, जिसके निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम को सौंपी गई थी। वर्ष 2014 में जब इस परियोजना पर काम शुरू हुआ था, तब देवरांचल के निवासियों में एक नई उम्मीद जगी थी कि वर्षों पुरानी परिवहन समस्या समाप्त हो जाएगी। लेकिन शिलान्यास के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी पुल का ढांचा अधूरा ही पड़ा है। कई बार क्षेत्रीय जन प्रतिनिधियों और नेताओं ने क्षेत्र का दौरा किया और आश्वासन दिए, परंतु धरातल पर काम की रफ्तार जस की तस बनी हुई है।
इलाज में देरी और बाढ़-कटान की दोहरी मार झेल रहे ग्रामीण
पुल न बनने का सबसे भयावह पक्ष चिकित्सा आपातकाल के दौरान सामने आता है। जब क्षेत्र में कोई व्यक्ति अचानक गंभीर रूप से बीमार होता है, तो उसे समय पर इलाज दिलाना परिजनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। नाव के समय पर न मिलने या लंबे वैकल्पिक मार्ग के कारण मरीजों को अस्पताल ले जाने में काफी देरी हो जाती है। इसके अलावा गुड्डू यादव और नरसिंह ने बताया कि यह पूरा इलाका हर साल बाढ़ और नदी कटान की विभीषिका भी झेलता है। सरकार और प्रशासन द्वारा नदी कटान को रोकने के लिए पत्थर की ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। केवल बालू से भरी बोरियां रख दी जाती हैं, जो बाढ़ के पानी के तेज़ बहाव में बह जाती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि अधूरे पड़े मोहन सेतु का निर्माण कार्य पूर्ण कर लिया जाए तो न केवल उनकी आवागमन और बाढ़ संबंधी बुनियादी समस्याएं हल होंगी, बल्कि इस क्षेत्र में व्यापार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।



















