उत्तर प्रदेश के बरेली में भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति में उस वक्त जोरदार हलचल देखने को मिली, जब पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने अपने सोशल मीडिया खाते पर संक्षिप्त मगर चौंकाने वाला संदेश साझा किया। अपने फेसबुक हैंडल पर केवल तीन शब्द लिखकर उन्होंने यह संदेश सार्वजनिक किया, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में उनके पार्टी छोड़ने को लेकर अटकलें तेज हो गईं। यह घटनाक्रम भारतीय जनता पार्टी की तरफ से उच्च सदन के लिए प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के तुरंत बाद सामने आया। संदेश के सार्वजनिक होते ही उनके आवास पर कार्यकर्ताओं का तांता लग गया और उनके करीबियों के फोन घनघनाने लगे, क्योंकि किसी को भी इस अप्रत्याशित कदम का पूर्व अनुमान नहीं था।
उच्च सदन की सूची और नाराजगी की वजह
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उच्च सदन के उम्मीदवारों के चयन से असंतुष्ट होकर उन्होंने यह सख्त रुख अख्तियार किया है। चर्चाओं का बाजार इस बात को लेकर भी गर्म है कि वे जल्द ही भगवा दल से अपना नाता तोड़कर किसी नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश कर सकते हैं। हालांकि इस रहस्यमयी संदेश को लेकर अब तक औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, फिर भी ऐसी अटकलें हैं कि वे समाजवादी पार्टी सहित अन्य सियासी दलों के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधने की जुगत में हैं। इस घटनाक्रम ने स्थानीय स्तर पर पार्टी के संगठनात्मक संतुलन पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
बेटी के लिए सियासी जमीन तैयार करने की कोशिशें
कंधरापुर गांव के मूल निवासी धर्मेंद्र कश्यप अपनी बेटी कीर्ति कश्यप को सक्रिय राजनीति में स्थापित करने के लिए लंबे समय से प्रयासरत थे। स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि वे अपनी बेटी को उच्च सदन भेजने के लिए भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों से लगातार पैरवी कर रहे थे और इसके लिए उन्होंने व्यापक प्रयास भी किए थे। जब पार्टी द्वारा घोषित नामों में उनकी बेटी का नाम शामिल नहीं हुआ, तो इसे उनकी व्यक्तिगत व राजनीतिक उपेक्षा के रूप में देखा गया। माना जाता है कि इसी विफलता और हताशा के चलते उन्होंने सार्वजनिक मंच पर अपनी नाराजगी जाहिर की।
तीन दशकों का राजनीतिक सफर और पाला बदलने का इतिहास
धर्मेंद्र कश्यप का राजनीतिक इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने वर्ष 2002 में बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिह्न पर विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यधारा की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके ठीक एक साल बाद, यानी वर्ष 2003 में, उन्होंने पाला बदलते हुए समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली और सरकार में राज्य मंत्री का पद हासिल किया। इसके बाद वर्ष 2009 के आम चुनाव में उन्होंने आंवला लोकसभा सीट से किस्मत आजमाई, लेकिन भाजपा की मेनका गांधी के हाथों उन्हें बेहद करीबी मुकाबले में पराजय झेलनी पड़ी थी।
साल 2009 की चुनावी शिकस्त के बाद वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। भाजपा नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया, जिसके परिणामस्वरूप वे वर्ष 2014 और फिर 2019 में लगातार दो बार संसद के निचले सदन के सदस्य चुने गए। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत का सिलसिला टूट गया। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नीरज मौर्य ने उन्हें 15,970 मतों के अंतर से शिकस्त दी। इस हार के बाद से ही वे क्षेत्रीय राजनीति में अपनी बेटी के लिए नई जमीन तलाशने के प्रयासों में जुटे हुए थे।
समर्थकों का आक्रोश और नेतृत्व पर सवाल
सोशल मीडिया पर पोस्ट सामने आते ही उनके वफादार कार्यकर्ताओं और स्थानीय पदाधिकारियों ने खुला विरोध जताना शुरू कर दिया। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संगठन में जमीनी संघर्ष करने वाले चेहरों को दरकिनार किया जा रहा है। एक समर्थक ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा मंत्रियों को फिर से उच्च सदन भेजा जा रहा है जबकि जमीनी स्तर पर पसीना बहाने वाले कद्दावर नेताओं को नजरअंदाज किया गया। समर्थकों ने यह चेतावनी भी दी कि अगर संगठन की यही कार्यशैली रही, तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में बरेली जिले की सभी नौ सीटों पर पार्टी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
शायराना अंदाज में दर्द और बैठक का ऐलान
पूर्व सांसद ने अपनी व्यथा व्यक्त करने के लिए शायरी का सहारा लिया और कहा कि राहगीर ने समंदर की गहराई को कभी नहीं समझा। उन्होंने आगे कहा कि उनका पूरा ध्यान हमेशा अपनी मंजिल पर रहा है और उन्होंने कभी मील के पत्थरों की परवाह नहीं की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने अगले सियासी कदम का फैसला पूरी तरह से अपने समर्थकों की मर्जी पर छोड़ रहे हैं और जल्द ही एक बड़ी सभा बुलाई जाएगी।
अपने बयानों में उन्होंने स्पष्ट किया कि उच्च सदन की सदस्यता उनके लिए कोई प्राथमिक मुद्दा नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार वे जहां से चाहें टिकट हासिल कर सकते हैं। पूर्व सांसद ने कहा,
"अगर खुलकर खिलाफत करने वाले लोग अग्रिम पंक्ति में बैठेंगे तो कष्ट तो स्वाभाविक है।"उन्होंने रोष व्यक्त किया कि 2024 के आम चुनाव में जिन लोगों ने खुलेआम उनके खिलाफ काम किया, संगठन ने उनके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। जब पार्टी ऐसे तत्वों की कोई चिंता नहीं करती, तो एक स्वाभिमानी जनप्रतिनिधि के लिए विदाई लेना ही एकमात्र रास्ता बचता है। उन्होंने दोहराया कि उनका जनाधार केवल एक विधानसभा या लोकसभा तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे मंडल और जनपद में फैला हुआ है। सभी कार्यकर्ताओं से व्यापक विचार-विमर्श करने के उपरांत ही वे अपने अंतिम निर्णय को सार्वजनिक करेंगे।


















