उत्तर प्रदेश में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। चुनाव से पहले सूबे के राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा चल रही है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अपने मौजूदा विधायकों के टिकट बड़े पैमाने पर काटेगी। इस बीच, उत्तर प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी ने एक मीडिया इंटरव्यू में स्मिता प्रकाश के सवालों के जवाब देते हुए टिकट बंटवारे के समीकरणों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी में कोई ऐसा फिक्स फॉर्मूला नहीं है जिसके तहत यह तय किया जाए कि 40 फीसदी या किसी अन्य तय अनुपात में मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए जाएंगे।
पार्टी में सामूहिक निर्णयों की परंपरा
पंकज चौधरी ने बातचीत के दौरान पार्टी की आंतरिक कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी किसी एक परिवार, किसी एक व्यक्ति या किसी विशेष दंपती की जागीर नहीं है। भारतीय जनता पार्टी में हर बड़ा और अहम फैसला सामूहिक रूप से लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर पार्टी के जिलाध्यक्षों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसके अलावा, संगठन के क्षेत्रीय अध्यक्षों का इनपुट भी काफी मायने रखता है। पार्टी के भीतर हर स्तर से जमीनी फीडबैक और सुझाव लिए जाते हैं, जिसके बाद ही अंतिम निर्णय पर पहुंचा जाता है।
कल्याण सिंह के समय का पुराना संस्मरण
अपनी बात को मजबूती देने के लिए पंकज चौधरी ने पार्टी के पुराने दिनों और कल्याण सिंह से जुड़े एक वाकये का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि बात 1993 के विधानसभा चुनाव के समय की है। वह खुद 1991 में सांसद बन चुके थे और उस दौर में कल्याण सिंह पार्टी के बड़े नेता हुआ करते थे। उस समय वह पार्टी में नए आए थे। उनके अपने जिले से उम्मीदवारों का एक पैनल तैयार होकर आया था। आमतौर पर पार्टी की परंपरा रही है कि हर एक विधानसभा क्षेत्र से तीन संभावित नामों का पैनल भेजा जाता है। उनके जिले से भी ऐसा ही पैनल आलाकमान के पास भेजा गया था और टिकटों पर अंतिम फैसला लिया जाना अभी बाकी था।
गुप्त बैठक और टाइपराइटर का इंतजाम
उन्होंने पुराने किस्से को आगे बढ़ाते हुए बताया कि दिल्ली में अक्सर बड़े नेताओं को टिकट चाहने वाले लोग घेरे रहते हैं। ऐसी स्थिति में नेताओं को किसी सुरक्षित और गोपनीय जगह की तलाश होती है, जहां बैठकर वे शांति और आराम से उम्मीदवारों के नामों पर विचार कर सकें। कल्याण सिंह उन्हें बहुत पसंद करते थे और उनका काफी सम्मान करते थे। एक दिन कल्याण सिंह ने उन्हें फोन करके उनकी लोकेशन पूछी। तब उन्होंने बताया कि वे दिल्ली में हैं। जब परिवार के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि परिवार गोरखपुर में है। इसके बाद कल्याण सिंह ने अगले दिन उनके घर आने की बात कही।
दरवाजे बंद कर तय हुए थे उम्मीदवारों के नाम
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अगले दिन कल्याण सिंह उनके आवास पर पहुंचे। उनके साथ उनकी सुरक्षा व्यवस्था भी वहां आ गई। कुछ ही देर में कलराज मिश्रा और संसदीय बोर्ड की बैठकों में हिस्सा लेने वाले अन्य दिग्गज नेता भी वहां पहुंच गए। बैठक के लिए टाइपराइटर सहित सभी जरूरी इंतजाम पहले ही कर लिए गए थे। यह तय किया गया था कि सभी लोग उसी घर के भीतर बैठकर मंथन करेंगे और वहीं से टिकटों पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। कड़े निर्देश दिए गए थे कि मकान का मुख्य फाटक पूरी तरह बंद रखा जाए और किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर प्रवेश न करने दिया जाए।
कल्याण सिंह के सामने रखी गई थी पांच सीटों की शर्त
चूंकि बैठक उन्हीं के घर के भीतर चल रही थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न अपने जिले के टिकटों को लेकर भी चर्चा की जाए। हालांकि कल्याण सिंह की कार्य करने की अपनी अलग शैली थी और उनके पास भी सूचनाएं जुटाने के अपने खुफिया और स्वतंत्र स्रोत हुआ करते थे। उन्होंने कल्याण सिंह से आग्रह किया कि यदि उनके जिले वाले मामले पर भी गौर कर लिया जाए तो बेहतर होगा। जब कल्याण सिंह ने पूछा कि ऐसा करने पर क्या होगा, तो उन्होंने आत्मविश्वास से कहा कि यदि उनकी पसंद के मुताबिक पांच विधानसभा सीटों पर टिकट दे दिए जाएं, तो वे उनमें से कम से कम चार उम्मीदवारों को चुनाव जिताकर विधानसभा जरूर लाएंगे।
दायित्व स्वीकारने का अनोखा अंदाज
उन्होंने बताया कि उम्मीदवारों के नाम पहले से ही आए हुए पैनल में शामिल थे और वे उन्हीं में से अपनी पसंद के नाम बता रहे थे। यह सुनकर कल्याण सिंह ने अपनी डायरी निकाली और उन्हें लिखने को कहा। उन्होंने पांचों विधानसभा क्षेत्रों के नाम और उनके सामने अपनी पसंद के उम्मीदवारों के नाम लिखाए। साथ ही यह भी लिखवाया कि यदि इनमें से चार उम्मीदवार नहीं जीते, तो वे पार्टी द्वारा दिया जाने वाला हर तरह का दंड सहर्ष स्वीकार करेंगे। कल्याण सिंह ने उन्हें डायरी पर तारीख और समय लिखने के निर्देश भी दिए, जिसका उन्होंने पूरी तरह पालन किया।
जीत के आधार पर ही होती है पैरवी
भगवान की कृपा और सही आकलन का नतीजा यह रहा कि उनकी वह भविष्यवाणी पूरी तरह सच साबित हुई। पार्टी की राजनीति में उनका मुख्य उद्देश्य हमेशा से जीत सुनिश्चित करना रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति उनका बेहद करीबी भी है, लेकिन उसकी जीत की कोई संभावना नहीं है, तो वे कभी उसकी पैरवी नहीं करेंगे। जब चुनाव के नतीजे आए, तो उनके द्वारा सुझाए गए पांचों में से चार उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब रहे। जब वे इसके बाद कल्याण सिंह से मिलने गए, तो उन्होंने पीठ थपथपाकर उनकी सराहना की, जिससे उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ गया।
आगे के चुनावों का अनुभव और फीडबैक प्रणाली
इसके बाद 1996 का विधानसभा चुनाव आया। इस बार भी वे अपने जिले का पैनल लेकर कल्याण सिंह के पास पहुंचे। इस बार कल्याण सिंह ने पैनल देखने से मना कर दिया और कहा कि वे सीधे एक-एक नाम दें। उन्होंने पांच नाम दिए और इस बार भी उनमें से चार उम्मीदवार विजयी हुए। हालांकि इस बार कोई डायरी में लिखापढ़ी नहीं कराई गई। इसके बाद उन्होंने 1999 का एक और संस्मरण साझा करते हुए बताया कि कैसे वरिष्ठ नेताओं का उन पर भरोसा लगातार बढ़ता चला गया। एक दिन कल्याण सिंह ने उन्हें फोन करके बांसगांव, संतकबीर नगर, बस्ती और सिद्धार्थनगर लोकसभा सीटों का हाल-चाल और वहां की जमीनी स्थिति के बारे में जानकारी मांगी।
रामपाल सिंह के स्वास्थ्य पर उठी अफवाहें
उन्होंने सिद्धार्थनगर के तत्कालीन सांसद रामपाल सिंह से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी साझा किया। रामपाल सिंह उम्र में उनसे काफी बड़े थे और उनके बेटे भी उनसे आयु में बड़े थे, लेकिन उनके साथ उनके संबंध बेहद प्रगाढ़ और मैत्रीपूर्ण थे। जब सिद्धार्थनगर की चर्चा चली, तो उन्होंने कहा कि वहां सब ठीक है क्योंकि रामपाल सिंह मौजूदा सांसद हैं। इस पर कल्याण सिंह ने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि रामपाल सिंह की तबीयत बहुत गंभीर है। दरअसल, कुछ समय पहले रामपाल सिंह को हल्का सा एंजाइना पेन हुआ था और वे खुद उन्हें गाड़ी में बैठाकर डॉक्टर के पास ले गए थे और उनका इलाज कराया था।
विरोधियों की चाल और फिटनेस सर्टिफिकेट
चूंकि वे रामपाल सिंह की मेडिकल स्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और डॉक्टर ने भी कह दिया था कि घबराने की कोई बात नहीं है, दवा खाने से वे पूरी तरह ठीक हो जाएंगे। लेकिन उनके राजनीतिक विरोधियों ने पार्टी के बड़े नेताओं के कान भरने शुरू कर दिए थे और यह दुष्प्रचार फैला दिया था कि रामपाल सिंह बिस्तर पर हैं और चुनाव लड़ने में पूरी तरह असमर्थ हैं। यह बात पता चलते ही उन्होंने रामपाल सिंह से तुरंत कहा कि वे अपना फिटनेस सर्टिफिकेट जाकर दिखाएं, अन्यथा उनका टिकट कट सकता है। उनकी इस पहल के बाद रामपाल सिंह ने नेताओं से मुलाकात की और उन्हें पार्टी का टिकट मिल गया।
टिकट कटने के किसी तय फॉर्मूले का खंडन
इन तमाम पुरानी घटनाओं का हवाला देते हुए यूपी बीजेपी प्रमुख ने साफ किया कि पार्टी में उम्मीदवारों के चयन के लिए हमेशा अलग-अलग और पुख्ता माध्यमों से जमीनी फीडबैक जुटाया जाता है। यह सोचना बिल्कुल गलत है कि पहले से कोई ऐसा आधिकारिक फॉर्मूला बना लिया गया है जिसके तहत 40 फीसदी या 50 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए जाएंगे। पार्टी का एकमात्र और सर्वोपरि लक्ष्य चुनाव जीतना होता है और उसी के आधार पर सांगठनिक मंचों पर विस्तृत चर्चा के बाद टिकटों पर अंतिम मुहर लगाई जाती है।























