उत्तराखंड स्थित विश्वप्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनाथ के ऊपरी पहाड़ी हिस्सों में मौजूद लटकते ग्लेशियर भविष्य के लिए एक गंभीर प्राकृतिक चुनौती पेश कर रहे हैं। इन विशालकाय बर्फ के टुकड़ों में यदि अस्थिरता आती है, तो नीचे बसे कस्बे और वहां के बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचने का अंदेशा है। एक संयुक्त वैज्ञानिक पड़ताल में यह बात सामने आई है कि बद्रीनाथ धाम के ठीक ऊपर स्थित तीन प्रमुख लटकते ग्लेशियरों में से यदि सबसे संवेदनशील हिस्सा अपनी पकड़ खोकर गिरता है, तो इसका असर लगभग 398 भवनों, 2.66 किलोमीटर लंबी सड़क, दो पुलों, एक हेलीपैड और वाहन पार्किंग क्षेत्र पर पड़ सकता है।
शोध में तीन लटकते ग्लेशियरों की स्थिरता का परीक्षण
यह महत्वपूर्ण शोध 28 अक्टूबर को वैज्ञानिक पत्रिका लैंडस्लाइड्स में सामने आया है। इस अध्ययन को भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी तथा भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों ने मिलकर पूरा किया है। जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने बद्रीनाथ के ऊपर समुद्र तल से 4,700 मीटर से लेकर 5,465 मीटर तक की अत्यधिक ऊंचाई पर फैले तीन लटकते ग्लेशियरों की बनावट, ढलान और स्थिरता का विस्तृत विश्लेषण किया।
अलकनंदा नदी के किनारे बसा बद्रीनाथ धाम स्वयं समुद्र तल से लगभग 3,415 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह पवित्र धाम उत्तराखंड की वार्षिक चारधाम यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। वर्ष 2025 की तीर्थयात्रा अवधि में ही करीब 17 लाख श्रद्धालुओं ने यहां दर्शन किए थे। इतनी बड़ी संख्या में पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों, स्थानीय निवासियों और पर्वतीय क्षेत्र में बने बुनियादी ढांचे की हिफाजत के नजरिए से इस अध्ययन के निष्कर्षों को नीतिगत स्तर पर बेहद अहम माना जा रहा है।
लटकते ग्लेशियरों की बनावट और जोखिम का स्वरूप
पर्वतीय भूभाग में लटकते हुए ग्लेशियर यानी हैंगिंग ग्लेशियर ऐसी विशाल बर्फीली संरचनाएं होती हैं, जो घाटी की तली तक नहीं उतरतीं, बल्कि बेहद खड़ी चट्टानों और ढलानों पर जमी रहती हैं। जब तक चट्टानों के साथ बर्फ की पकड़ मजबूत रहती है, तब तक ये टिके रहते हैं। हालांकि, यदि स्थानीय तापमान में बदलाव हो या उनके आधार की पकड़ कमजोर पड़ने लगे, तो बर्फ का बहुत बड़ा हिस्सा अचानक ढलान से टूटकर नीचे की ओर गिर सकता है।
इस प्रकार का हिमस्खलन केवल बर्फ तक सीमित नहीं रहता। तेज गति से ढलान पर फिसलते हुए यह अपने साथ भारी मात्रा में पानी, विशाल पत्थर, चट्टानें और गाद समेट लेता है। इस वैज्ञानिक पड़ताल में शोधकर्ताओं ने उच्च क्षमता वाली सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल का सहारा लेकर ग्लेशियरों के स्थानों की पहचान की। अध्ययन में विशेष रूप से 30 डिग्री या उससे अधिक के तीव्र ढलान वाले बर्फीले हिस्सों की पड़ताल की गई और बद्रीनाथ कस्बे के सबसे नजदीक पाए गए तीन स्थलों को मॉडलिंग के लिए चुना गया।
दूसरे ग्लेशियर से सबसे भीषण तबाही का अनुमान
कंप्यूटर सिमुलेशन और मॉडलिंग के परिणामों से संकेत मिलता है कि चुने गए तीन स्थलों में से दूसरे स्थान पर स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक संहारक साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार, इस विशिष्ट ग्लेशियर का कुल आयतन लगभग 53.2 लाख घन मीटर है और इसका औसत ढलान 34.57 डिग्री दर्ज किया गया है।
यदि यह ग्लेशियर टूटकर नीचे की ओर खिसकता है, तो बर्फ, पानी और मलबे के सैलाब की अधिकतम गति 78.5 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही मलबे के बहाव की ऊंचाई भी 73.5 मीटर तक उठने का अनुमान लगाया गया है। इस सबसे खराब संभावित स्थिति में नीचे स्थित करीब 398 इमारतों, 2.66 किलोमीटर सड़क संपर्क, दो मुख्य पुलों, एक हेलीपैड और पार्किंग स्थल को सीधा नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, सिमुलेशन मॉडल यह स्पष्ट करता है कि बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर पर सीधे हिमस्खलन के टकराने की आशंका नहीं है, लेकिन बहाव के साथ बहकर आने वाला भारी मलबा और चट्टानें मंदिर के आसपास के क्षेत्र को जरूर प्रभावित कर सकती हैं।
निर्माण कार्यों पर नियमन और बफर जोन बनाने की सिफारिश
इस संभावित प्राकृतिक आपदा से जानमाल के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए वैज्ञानिकों ने ठोस कदम उठाने का सुझाव दिया है। अध्ययन में कहा गया है कि संभावित हिमस्खलन के बहाव मार्ग और उसके प्रभाव क्षेत्र को चिन्हित करके बफर जोन तैयार किए जाने चाहिए। इसके साथ ही, बहाव की अधिकतम दूरी और मलबे के फैलाव को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील हिस्सों में नई इमारतों और ढांचागत परियोजनाओं के निर्माण पर कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए।
अध्ययन के सह-लेखक और वरिष्ठ हिमनद विशेषज्ञ अनिल वी. कुलकर्णी ने उल्लेख किया है कि इस शोध कार्य में विकसित की गई वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग हिमालय के अन्य उन कस्बों में भी किया जा सकता है, जो लटकते ग्लेशियरों के साए में बसे हैं। इससे पहले अप्रैल के महीने में प्रकाशित एक अन्य शोध में 219 लटकते ग्लेशियरों की पहचान की गई थी, जिनमें से लगभग 30 प्रतिशत ग्लेशियर अलकनंदा नदी के बेसिन में स्थित पाए गए थे और उनके बर्फीले हिस्से अस्थिर स्थिति में दर्ज किए गए थे।
कंप्यूटर मॉडलिंग की सीमाएं और भविष्य की तैयारी
शोधकर्ताओं ने यह भी साफ किया है कि यह पूरा अध्ययन कंप्यूटर मॉडलिंग और रिमोट सेंसिंग पर आधारित है। ग्लेशियर की बर्फ की मोटाई और टूटने वाले संभावित हिस्सों का अनुमान सैटेलाइट आंकड़ों के जरिए लगाया गया है, न कि मौके पर जाकर सीधे भौतिक पैमाइश से। इसके अतिरिक्त, बर्फ और मलबे के नीचे फिसलने के दौरान पैदा होने वाले घर्षण से जुड़े मानकों में भी अनिश्चितता बनी रहती है। यही कारण है कि किसी वास्तविक घटना के समय होने वाला नुकसान मॉडल के अनुमानों से थोड़ा भिन्न हो सकता है।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि इस शोध का उद्देश्य किसी तत्काल आपदा का खौफ पैदा करना नहीं है, क्योंकि यह तुरंत ग्लेशियर टूटने की कोई पूर्व-चेतावनी जारी नहीं करता। बल्कि इसका असल मकसद बद्रीनाथ क्षेत्र में ग्लेशियरों से जुड़े खतरों का एक सटीक वैज्ञानिक नक्शा तैयार करना और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों को समय रहते बेहतर सुरक्षा योजनाएं बनाने के लिए प्रेरित करना है।



















