भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाले 16 दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार के विभिन्न घाटों और धार्मिक स्थलों पर पूर्वजों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। पितरों के प्रति गहरी आस्था और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाने वाला यह विधान आत्मा की शांति और तृप्ति का मुख्य मार्ग माना जाता है। हिंदू धर्म में पूर्वजों की मुक्ति के लिए कई पवित्र धाम बताए गए हैं, जिनमें हरिद्वार स्थित प्राचीन नारायणी शिला का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना जाता है।
पौराणिक ग्रंथों में नारायणी शिला का धार्मिक महत्व
स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नारायणी शिला पर किया गया श्राद्ध कर्म पूर्वजों को जन्म और मरण के सांसारिक चक्र से मुक्त कर वैकुंठ धाम का मार्ग प्रशस्त करता है। धार्मिक दृष्टिकोण से गया और बद्रीनाथ धाम की तरह ही हरिद्वार की इस पावन शिला की महत्ता सर्वोपरि मानी गई है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तीर्थराज गया में भगवान श्रीहरि के पावन चरण स्थित हैं, जबकि बद्रीनाथ धाम में प्रभु का ललाट क्षेत्र माना जाता है। इसके विपरीत, हरिद्वार की नारायणी शिला भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का पवित्र वक्ष स्थल स्वरूप मानी गई है। यही कारण है कि इस शिला पर समर्पित जल और पिंडदान का संकल्प सीधे वैकुंठनाथ के हृदय तक पहुंचता है।
प्रेत योनि से मुक्ति और पितृ दोष का निवारण
नारायणी शिला के मुख्य पुरोहित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, यह शिला साक्षात भगवान नारायण का विग्रह रूप है। चूंकि यह प्रभु का हृदय स्थल है, इसलिए यहां किया गया कोई भी तर्पण सीधे प्रभु को समर्पित होता है। यदि किसी कारणवश परिवार के पूर्वज प्रेत योनि अथवा अन्य कष्टकारी योनियों में भटक रहे हों, तो इस शिला पर वैदिक विधि-विधान से पिंडदान करने पर भगवान विष्णु की विशेष अनुकंपा से उन्हें सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।
पितृ और मातृ पक्ष की पीढ़ियों का उद्धार
महालय पक्ष के इन पावन दिनों में यदि कोई व्यक्ति पूर्ण निष्ठा, शुचिता और भक्ति भाव से अपने पितरों का श्राद्ध करता है, तो उसके पितृ पक्ष की 100 पीढ़ियों और मातृ पक्ष की 100 पीढ़ियों के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं। दोनों कुलों के कुल मिलाकर सैकड़ों पूर्वजों को परम शांति और सद्गति मिलती है। इसके साथ ही, श्रद्धापूर्वक यह अनुष्ठान संपन्न कराने वाले वंशजों को भी अपने जीवनकाल में अक्षय पुण्य, सुख-शांति और अंत में मोक्ष का पावन फल प्राप्त होता है।



















