उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित प्रसिद्ध रानीबाग क्षेत्र में इन दिनों एक धार्मिक स्थल को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। आम तौर पर श्रद्धालु शनि के प्रकोप और उनकी वक्री दृष्टि के भय से उनकी विशेष उपासना करते हैं, ताकि जीवन में किसी अनहोनी से बचा जा सके। लोग पूजा-अर्चना और दान-पुण्य के जरिए इस ग्रह देवता को प्रसन्न रखने का जतन करते हैं। हालांकि, नैनीताल के रानीबाग में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो चुकी है। यहां एक नव-निर्मित शनि मंदिर को लेकर दो पक्षों के बीच तीखा गतिरोध पैदा हो गया है, जिसमें एक पक्ष ने मंदिर के ढांचे को सीधा अतिक्रमण करार दिया है। नौबत हाथापाई, पुलिसिया कार्रवाई और प्रशासनिक शिकायतों से होते हुए कानूनी दांव-पेच तक जा पहुंची है।
रानीबाग के चित्रशिला धाम में उपजा टकराव
यह पूरा मामला गार्गी यानी गौला नदी के तट पर बसे ऐतिहासिक चित्रशिला धाम से जुड़ा हुआ है। यह तीर्थ स्थल कत्यूरी राजवंश से संबंधित पूज्य माता जिया रानी की स्मृति और आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसी परिसर के भीतर कुछ समय पहले एक शनि मंदिर का निर्माण कराया गया था, जो अब बड़े विवाद की जड़ बन चुका है। मंदिर परिसर की भूमि पर कथित अवैध कब्जे के आरोपों को लेकर 'पहाड़ी आर्मी' नामक स्थानीय संगठन और शनि मंदिर समिति आमने-सामने आ गए हैं। दोनों पक्षों के बीच यह तनाव जुलाई के महीने से लगातार गहराता जा रहा है और अब इसने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है।
माता जिया रानी की पवित्र शिला और दर्शन बाधित होने का आरोप
पहाड़ी आर्मी संगठन के प्रतिनिधि हरीश रावत का आरोप है कि कत्यूरी राजवंश की कुलदेवी माता जिया के पवित्र स्थल पर कुछ बाहरी लोगों द्वारा मनमाने ढंग से शनि मंदिर खड़ा कर दिया गया है। उनके अनुसार, इस नए निर्माण से जिया रानी गुफा और ठीक नीचे गार्गी नदी के किनारे स्थित माता की ऐतिहासिक घाघरानुमा पवित्र शिला की पारंपरिक पहचान प्रभावित हुई है। संगठन का कहना है कि गुफा और पवित्र शिला के बीच की खुली जगह पर भारी-भरकम ढांचा बना दिए जाने के कारण गुफा से होने वाले शिला के सीधे दर्शन पूरी तरह बंद हो गए हैं। इस वजह से कत्यूरी वंशजों और स्थानीय लोगों की पारंपरिक धार्मिक भावनाओं को भारी आघात पहुंचा है।
चित्रेश्वर महादेव मंदिर के ढांचे से छेड़छाड़ और गिरफ्तारी
विरोध कर रहे पक्ष का यह भी आरोप है कि शनि मंदिर का निर्माण करने वालों ने धाम में पहले से मौजूद प्राचीन चित्रेश्वर महादेव मंदिर की बुनियाद और उसके गुंबद के मूल स्वरूप के साथ भी छेड़छाड़ की है। इस निर्माण के विरोध में 29 अगस्त 2026 को पहाड़ी आर्मी से जुड़े लोगों ने मौके पर जोरदार प्रदर्शन किया था। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस प्रशासन को दखल देना पड़ा, जिसके बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के तहत कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई। इस घटनाक्रम के बाद से क्षेत्र में पुलिस बल की निगरानी बढ़ा दी गई है।
पहाड़ी परंपरा बनाम नया निर्माण
इस विवाद के केंद्र में उत्तराखंड की स्थानीय देव संस्कृति और बाहरी धार्मिक परंपराओं का टकराव भी देखा जा रहा है। स्थानीय जानकारों का तर्क है कि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में शनि मंदिरों की स्थापना की कोई ऐतिहासिक परंपरा नहीं रही है। यहां सदियों से ग्राम देवताओं, क्षेत्रपाल, गोलू देवता और कुलदेवियों की पूजा होती रही है। चित्रशिला धाम में हल्द्वानी के कुछ लोगों द्वारा पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस शनि मंदिर का निर्माण कराया गया था। स्थानीय निवासियों का कहना है कि किसी भी तीर्थ स्थल में मूल आराध्य देव का स्थान ही सबसे प्रमुख और भव्य होना चाहिए। आरोप है कि नए शनि मंदिर ने मूल मंदिर की भव्यता को पीछे छोड़ दिया है और इससे धाम के ऐतिहासिक चरित्र को बदलने की कोशिश की जा रही है। शुरुआती प्रशासनिक जांच में भी शनि मंदिर के निर्माण को अनधिकृत माना गया है। उधर, शनि मंदिर समिति अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को निराधार बता रही है।
इतिहास के पन्नों में रानीबाग और चित्रेश्वर धाम
इस धाम के पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व का विवरण प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत की पुस्तक 'उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास' में भी प्रमुखता से दर्ज है। प्रो. अजय रावत के अनुसार, भगवान शिव अपने दिव्य प्राकट्य के संदर्भ में कुर्मांचल के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले रानीबाग से बहुत ही गहरे रूप से जुड़े हैं। यह कस्बा काठगोदाम से बिल्कुल सटा हुआ है, जहां मैदानी इलाकों से आने वाला रेलवे नेटवर्क समाप्त होता है। रानीबाग का नामकरण संपूर्ण उत्तराखंड पर शासन करने वाले कत्यूरी राजवंश की महारानी जिया रानी के बगीचे यानी उद्यान के नाम पर हुआ था।
चित्रेश्वर महादेव और गोस्वामी पुजारियों का इतिहास
इतिहासकार के अनुसार, यहां स्थित चित्रेश्वर महादेव मंदिर अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ युगों से भगवान शिव के छत्र के रूप में अडिग खड़ा है। यह अत्यंत प्राचीन देवालय है, जिसकी पूजा-अर्चना का जिम्मा गोस्वामी समाज के पास है। ये पुजारी 1850 में गढ़वाल के श्रीनगर स्थित प्रसिद्ध कमलेश्वर मठ से यहां आकर बसे थे। मंदिर के पुजारी प्रेमगिरि गोस्वामी के हवाले से दर्ज विवरण बताता है कि यद्यपि इसकी स्थापना का कोई लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह स्थल पौराणिक काल से ही अस्तित्व में है। यहां देवाधिदेव महादेव की पूजा मूलतः योगेश्वर स्वरूप में की जाती है। मंदिर की प्राचीन वास्तुकला और वहां स्थापित प्राचीन शिवलिंग भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यह धाम अत्यंत पुरातन काल से आस्था का केंद्र रहा है। वर्तमान में दोनों पक्षों के दावों के बीच सभी की निगाहें प्रशासन की अंतिम जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।























