उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल बागेश्वर में रहने वाली रिचा जोशी ने लोक संस्कृति और आधुनिक बाजार के बीच एक मजबूत सेतु तैयार किया है। ठाकुरद्वारा वार्ड की रहने वाली रिचा उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यस्त दिनचर्या के बीच अपनी पारंपरिक लोक चित्रकला ऐपण और मधुबनी कलाकृतियों को सहेजते हुए उन्हें आय का जरिया बना रही हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ संवारा बचपन का शौक
हल्द्वानी से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद रिचा ने उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। फिलहाल उनका मुख्य लक्ष्य प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करना है, लेकिन किताबों के भारी दबाव के बीच भी उन्होंने अपनी कलात्मक रुचि को पीछे नहीं छूटने दिया। उनका मानना है कि पढ़ाई के साथ अपने व्यक्तिगत हुनर को निखारना हर युवा के लिए बेहद जरूरी है। बचपन से लोक कलाओं के प्रति गहरा लगाव रखने वाली रिचा ने अभ्यास के जरिए ऐपण के बारीक आकारों पर अपनी पकड़ मजबूत की और फिर धीरे-धीरे इसमें नए प्रयोग जोड़ने लगीं।
पारंपरिक अनुष्ठानों से लेकर मॉडर्न होम डेकोर तक के उत्पाद
रिचा अपने काम में कुमाऊं की सदियों पुरानी ऐपण शैली के साथ-साथ बिहार की प्रसिद्ध मधुबनी कला का भी सुंदर संगम प्रस्तुत करती हैं। उनके उत्पादों की श्रृंखला में केवल पारंपरिक पूजा सामग्री ही नहीं, बल्कि आधुनिक घरों की सजावट के सामान भी शामिल हैं। वे आकर्षक ऐपण फ्रेम, स्वास्तिक चिन्ह, कस्टमाइज्ड नेम प्लेट और की-रिंग तैयार करती हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक अनुष्ठानों और संस्कारों के लिए लक्ष्मी, सरस्वती, नवदुर्गा, चामुंडा, आचार्य, धूलि, नामकरण, स्नान, आसन और गणेश चौकी जैसे शास्त्रीय डिजाइनों का निर्माण भी करती हैं। इन कलाकृतियों को गृह सज्जा, मांगलिक आयोजनों और उपहार देने के लिए खूब पसंद किया जा रहा है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया से मिला देश भर में बाजार
बागेश्वर जैसे सुदूर पर्वतीय शहर में रहने के बावजूद रिचा के उत्पादों की पहुंच केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रही। डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया मंचों की सहायता से वे अपने हस्तशिल्प को दूर-दराज के ग्राहकों तक पहुंचा रही हैं। ऑनलाइन ऑर्डर मिलने से उन्हें पहाड़ी क्षेत्र में बैठकर ही पूरे देश से खरीदार मिल रहे हैं। रिचा का स्पष्ट मानना है कि अगर किसी के पास रचनात्मक कौशल है, तो उसे सिर्फ शौक मानकर घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे स्वरोजगार में बदलकर आर्थिक स्वावलंबन हासिल करना चाहिए।
परिवार का अटूट संबल और समाज के लिए प्रेरणा
रिचा के इस सफर में उनके परिवार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उनके पिता मोहन चंद्र जोशी सरस्वती मंदिर गरुड़ विद्यालय में कार्यरत हैं, जबकि मां निर्मला जोशी गृहिणी हैं। उनके भाई शुभम जोशी भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर देश सेवा कर रहे हैं। पूरे परिवार के प्रोत्साहन ने रिचा को निरंतर आगे बढ़ने की हिम्मत दी है। उनकी यह उपलब्धि साबित करती है कि पहाड़ की बेटियां अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहकर भी आधुनिक व्यापार के जरिए स्वावलंबन की नई मिसाल कायम कर सकती हैं।























