उत्तराखंड की प्रसिद्ध सरोवर नगरी नैनीताल में शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर उत्सव का माहौल बनने जा रहा है। शहर में 16 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक ऐतिहासिक 70वें मां दुर्गा पूजा महोत्सव की शुरुआत होगी। पांच दिनों तक चलने वाला यह भव्य आयोजन धार्मिक निष्ठा, समृद्ध लोकसंस्कृति और सामाजिक सद्भाव का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरेगा। इस वार्षिक उत्सव के दौरान वैदिक विधान से मां भगवती की उपासना तो की ही जाएगी, साथ ही विभिन्न राज्यों के कलाकार अपने पारंपरिक नृत्यों और संगीत की मोहक प्रस्तुतियां देकर पूरे देश की साझी विरासत को एक मंच पर साकार करेंगे। इसके अतिरिक्त, मल्लीताल के प्रसिद्ध डीएसए मैदान में लगने वाले पारंपरिक मेले को लेकर भी स्थानीय निवासियों और बाहर से आने वाले पर्यटकों के बीच भारी उत्साह बना हुआ है।
कलश यात्रा से होगा शुभारंभ, महाष्टमी और विसर्जन की रूपरेखा
आयोजन की तैयारियों और समय सारिणी को लेकर दुर्गा पूजा कमेटी के उपाध्यक्ष त्रिभुवन फर्त्याल ने पूरी जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महोत्सव का औपचारिक आरंभ 16 अक्टूबर को सुबह 11 बजे भव्य कलश यात्रा के साथ किया जाएगा। इस कलश यात्रा के बाद पूरे पांच दिनों तक लगातार धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला चलेगी, जिसमें हर दिन मां दुर्गा की विशेष पूजा, पुष्पांजलि, देवी भोग और संध्याकालीन महाआरती का विधिपूर्वक संपादन होगा।
त्रिभुवन फर्त्याल के अनुसार, इस पूरे पांच दिवसीय कार्यक्रम में महाष्टमी का दिन सबसे प्रमुख और फलदायी माना जा रहा है। महाष्टमी के पावन अवसर पर रात्रि के समय होने वाली अर्धरात्रि पूजा और पारंपरिक दीपदान श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहेंगे। इसके उपरांत, 20 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन सभी अनुष्ठानों की विधिवत पूर्णाहुति होगी और मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कर पर्व का समापन किया जाएगा। इन पांच दिनों के दौरान संपूर्ण नैनीताल में आध्यात्मिक तरंगों के साथ एक अनूठा उल्लास बिखरा रहेगा।
कश्मीर, राजस्थान और उत्तर भारत की लोककलाओं का समागम
नैनीताल में आयोजित होने वाला यह दुर्गा पूजा पर्व मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह देश के विविध राज्यों की लोककलाओं और सांस्कृतिक जड़ों को आपस में जोड़ने वाला एक सशक्त सेतु भी है। इस 70वें संस्करण में जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे प्रांतों के पारंपरिक सांस्कृतिक दल अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। ये सभी दल अपने-अपने अंचलों के लोकनृत्यों, पारंपारिक गीतों और आंचलिक वेशभूषा के जरिए भारत की बहुरंगी संस्कृति का सजीव प्रदर्शन करेंगे।
इन बहुआयामी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से नैनीताल आने वाले पर्यटकों और स्थानीय नागरिकों को उत्तर भारत से लेकर सुदूर अंचलों की लोक धरोहर को निकटता से देखने का सुअवसर प्राप्त होगा। हर क्षेत्र की अपनी खास पोशाक, वाद्य यंत्र और लोकगीत इस पर्व के मंच को अनोखी चमक प्रदान करते हैं। यही कारण है कि दशकों से चलने वाला यह पूजा महोत्सव नैनीताल नगर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का एक अविभाज्य अंग बन चुका है।
बंगाली सैलानियों का आगमन और स्थानीय बाजारों की चहल-पहल
दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही नैनीताल के बाजारों और पर्यटन उद्योग में नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। स्थानीय नागरिक डॉ. सरोज पालीवाल ने इस संदर्भ में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इन विशेष दिनों में शहर में बंगाल से आने वाले पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। सैलानियों के इस प्रवाह को ध्यान में रखते हुए स्थानीय बाजारों में भी उनकी जरूरतों, रुचियों और खानपान की प्राथमिकताओं के अनुसार विशेष सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है।
त्योहारी सीजन के साथ-साथ पर्यटन गतिविधियों में आई इस तेजी से स्थानीय बाजार पूरी तरह गुलजार हो उठे हैं। डॉ. सरोज पालीवाल के मुताबिक, यह अवसर विभिन्न संस्कृतियों के आपसी मेलजोल और समझ को प्रगाढ़ करने का सर्वोत्तम माध्यम साबित होता है। बंगाल से नैनीताल पहुंचे श्रद्धालु अपनी विशिष्ट पूजा परंपराओं, खानपान की शैली और त्योहार मनाने के तौर-तरीकों को साझा करते हैं, जिससे दोनों संस्कृतियां एक-दूसरे के और अधिक निकट आती हैं। वर्तमान में नैनीताल की वादियों में जो उत्सव का वातावरण बना है, उसने यहां की प्राकृतिक सुंदरता और खुशियों को कई गुना बढ़ा दिया है।
मल्लीताल के डीएसए मैदान में लगने वाले मेले की उत्सुकता
दुर्गा पूजा महोत्सव के दौरान मल्लीताल के डीएसए मैदान में आयोजित होने वाला वार्षिक मेला लोगों के लिए सबसे बड़े आकर्षणों में गिना जाता है। स्थानीय निवासियों के साथ ही दूर-दराज से आए सैलानी भी इस मेले में पहुंचकर खरीदारी करने और परिवार के साथ वक्त बिताने का भरपूर आनंद लेते हैं। इस मेले को लेकर लोगों के मन में महीनों पहले से उत्सुकता बनी रहती है, और कई लोग पूर्व के मेलों में छूट गई आवश्यक खरीदारी की सूची बनाकर इस बार उसे पूरा करने की तैयारी में रहते हैं। इस प्रकार यह मेला न केवल पूजा और संस्कृति का मंच है, बल्कि वाणिज्यिक मेलजोल और सामाजिक संपर्क का भी बड़ा जरिया बनता है।
डॉ. सरोज पालीवाल ने आगे बताया कि नैनीताल में हालिया मानसूनी बारिश के बाद मौसम का मिजाज भी तेजी से बदल रहा है। बारिश के थमते ही तापमान में गिरावट आई है और शहर में गुलाबी ठंडक का प्रभाव साफ तौर पर महसूस किया जाने लगा है। इस सुहावने और ठंडे मौसम के बीच दुर्गा पूजा और मेले का संयुक्त आयोजन पूरे शहर के माहौल को अत्यधिक जीवंत बना रहा है। डॉ. पालीवाल ने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक युग में यद्यपि लोगों की जीवनशैली और पर्व मनाने की पद्धतियों में पर्याप्त बदलाव आ चुका है, फिर भी ऐसे सामूहिक आयोजन समाज को अपनी जड़ों, सांस्कृतिक धरोहरों और पारस्परिक आत्मीयता से जोड़े रखने में बेहद प्रभावी भूमिका निभाते हैं।





















