उत्तराखंड के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में चीन और नेपाल की सीमाओं के निकट बसा ऐतिहासिक गर्ब्यांग गांव इस समय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर काली नदी के दाईं तरफ एक पठारी भूभाग पर स्थित यह गांव कभी अपनी बेमिसाल प्राकृतिक वादियों के लिए जाना जाता था। एक जमाने में इस इलाके की सुंदरता को देखते हुए इसे भारत का यूरोप और मिनी यूरोप तक कहा जाता था। लेकिन मौजूदा समय में गांव के ठीक नीचे से गुजरने वाली काली नदी इसके लिए एक गहरा संकट बन चुकी है। नदी के बहाव से हो रहे लगातार भूकटाव के कारण गांव की जमीन धीरे-धीरे धंसती जा रही है, जिससे इस ऐतिहासिक बस्ती पर लुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है।
व्यापारिक समृद्धि से वीराने तक का सफर
वर्ष 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध से पहले गर्ब्यांग केवल अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के एक बहुत बड़े केंद्र के रूप में भी विख्यात था। यह इलाका तिब्बत के साथ होने वाले सीमांत कारोबार की धुरी हुआ करता था। भारत और तिब्बत के बीच होने वाले इस समृद्ध व्यापार ने गर्ब्यांग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई थी। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में इसकी समृद्ध व्यवस्था और मनोरम वादियों के कारण ही इसे मिनी यूरोप का खिताब मिला था। हालांकि 1962 के युद्ध के बाद सीमांत व्यापार बंद होने से इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ टूट गई। यद्यपि वर्ष 1992 में भारत और चीन के बीच व्यापारिक गतिविधियां औपचारिक रूप से दोबारा बहाल कर दी गईं, लेकिन 1962 से पहले वाली रौनक और आर्थिक खुशहाली इस गांव में कभी लौट नहीं सकी। आज आलम यह है कि गर्ब्यांग से जुड़े 400 परिवार देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिखर चुके हैं, जबकि मूल गांव में महज 146 परिवार ही स्थाई रूप से रह रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और विस्थापन का इतिहास
काली नदी द्वारा कई दशकों से की जा रही भूमि कटान की मार झेल रहे इस गांव से विस्थापन कोई नई बात नहीं है। जमीन के लगातार धंसने के चलते साल 1976 में ही यहां के आधे से अधिक परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के तहत ऊधम सिंह नगर जिले के सितारगंज में विस्थापित किया जा चुका था। इसके बावजूद जो परिवार अपनी पैतृक जमीन से जुड़े रहे, वे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दो देशों की सीमाओं पर बसे होने के बाद भी यहां बिजली, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और आधुनिक संचार नेटवर्क पूरी तरह नदारद हैं। लिपुलेख दर्रे तक रणनीतिक सड़क का निर्माण पूरा होने के बाद वर्ष 2020 में यह इलाका सड़क मार्ग से जुड़ सका, जिससे आवागमन में थोड़ी आसानी जरूर हुई, लेकिन बाकी दिक्कतें जस की तस बनी हुई हैं। संचार नेटवर्क के मामले में ग्रामीण आज भी पड़ोसी देश नेपाल के सिग्नलों पर निर्भर हैं। मोबाइल पर सामान्य फोन कॉल करने के लिए भी स्थानीय निवासियों को छह किलोमीटर दूर छियालेख तक पैदल या वाहन से जाना पड़ता है।
ग्रामीणों का दर्द और प्रशासनिक आश्वासन
गांव के निवासी कृष्णा गर्ब्याल का कहना है कि सड़क मार्ग बनने से आने-जाने की सुविधा तो मिली है, लेकिन बिजली, पीने के पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाओं और मोबाइल नेटवर्क की स्थिति आज भी बेहद खराब है। बुनियादी जरूरतों के अभाव में लोग मजबूरी में अपने घरों को छोड़कर शहरों का रुख कर रहे हैं, जिससे पलायन की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। वहीं गांव के एक अन्य युवा भूपेन्द्र ने चिंता जाहिर करते हुए बताया कि काली नदी का बहाव निरंतर तेज होता जा रहा है। नदी की तेज लहरें गांव की निचली जमीन को लगातार निगल रही हैं, जिससे गांव के भूगोल पर ही संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि कटाव को रोकने के लिए मौके पर अब तक कोई ठोस सुरक्षा कार्य नहीं किया गया है।
इस पूरे मामले पर जिला मजिस्ट्रेट आशीष भटगांई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि गर्ब्यांग गांव को केंद्र सरकार की वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल कर लिया गया है। प्रशासन की योजना के अनुसार अगले वर्ष तक गांव में बिजली की आपूर्ति बहाल कर दी जाएगी। इसके साथ ही काली नदी द्वारा किए जा रहे भूमि कटाव की रोकथाम के लिए भी सुरक्षात्मक उपाय जल्द शुरू किए जाएंगे।























