अगरतला में बढ़ती गाड़ियों की भीड़ से निपटने के लिए ट्रैफिक पुलिस अपनाएगी एआई, मानिक साहा ने दिए निर्देशराजस्थान के बूंदी जिला अस्पताल में सफाईकर्मियों का कार्य बहिष्कार, बकाया मानदेय को लेकर मुख्य द्वार पर प्रदर्शनरणभूमि में भूख मिटाने के लिए फौजी कैसे करते थे पैकेटबंद खुराक का इस्तेमालअजमेर के होटल में मिला जयपुर के सरकारी कर्मी का शव, बैग से सुसाइड नोट बरामदसऊदी अरब में सुरक्षा संकट के चलते रियाद जाने वाली उड़ानें 15 अक्टूबर तक स्थगितकानपुर और लखनऊ के बीच जाजमऊ पुल की मरम्मत के साथ 100 मीटर संपर्क मार्ग का भी होगा कायाकल्पकड़वाहट भूलकर उंगलियां चाटेंगे सब, घर पर इस आसान विधि से बनाएं तरीदार करेला मसालाविदेशी पूंजी प्रवाह में जापान ने मारी बाजी, पहली तिमाही में भारत आए 5.71 अरब डॉलरत्योहारी सीजन में सोमवार को पढ़ाई या अवकाश, जानिए विभिन्न राज्यों के स्कूलों की आधिकारिक स्थितिउत्तराखंड के नैनीताल में जाह्नवी कपूर और रिया चक्रवर्ती की नई थ्रिलर फिल्म की शूटिंग शुरू
उत्तराखंड के सीमावर्ती गर्ब्यांग पर भूधंसाव का संकट, काली नदी के कटाव से खतरे में ऐतिहासिक गांवउत्तराखंड
11 अक्तू॰ 2026, 3:50 pm (2 घंटे पहले)· 0

उत्तराखंड के सीमावर्ती गर्ब्यांग पर भूधंसाव का संकट, काली नदी के कटाव से खतरे में ऐतिहासिक गांव

पिथौरागढ़ में चीन और नेपाल सीमा के निकट स्थित गर्ब्यांग गांव काली नदी के तेज कटाव और निरंतर भूधंसाव के कारण गंभीर संकट में है, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी से पलायन भी बढ़ रहा है।

उत्तराखंड के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में चीन और नेपाल की सीमाओं के निकट बसा ऐतिहासिक गर्ब्यांग गांव इस समय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर काली नदी के दाईं तरफ एक पठारी भूभाग पर स्थित यह गांव कभी अपनी बेमिसाल प्राकृतिक वादियों के लिए जाना जाता था। एक जमाने में इस इलाके की सुंदरता को देखते हुए इसे भारत का यूरोप और मिनी यूरोप तक कहा जाता था। लेकिन मौजूदा समय में गांव के ठीक नीचे से गुजरने वाली काली नदी इसके लिए एक गहरा संकट बन चुकी है। नदी के बहाव से हो रहे लगातार भूकटाव के कारण गांव की जमीन धीरे-धीरे धंसती जा रही है, जिससे इस ऐतिहासिक बस्ती पर लुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है।

व्यापारिक समृद्धि से वीराने तक का सफर

वर्ष 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध से पहले गर्ब्यांग केवल अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के एक बहुत बड़े केंद्र के रूप में भी विख्यात था। यह इलाका तिब्बत के साथ होने वाले सीमांत कारोबार की धुरी हुआ करता था। भारत और तिब्बत के बीच होने वाले इस समृद्ध व्यापार ने गर्ब्यांग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई थी। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में इसकी समृद्ध व्यवस्था और मनोरम वादियों के कारण ही इसे मिनी यूरोप का खिताब मिला था। हालांकि 1962 के युद्ध के बाद सीमांत व्यापार बंद होने से इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ टूट गई। यद्यपि वर्ष 1992 में भारत और चीन के बीच व्यापारिक गतिविधियां औपचारिक रूप से दोबारा बहाल कर दी गईं, लेकिन 1962 से पहले वाली रौनक और आर्थिक खुशहाली इस गांव में कभी लौट नहीं सकी। आज आलम यह है कि गर्ब्यांग से जुड़े 400 परिवार देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिखर चुके हैं, जबकि मूल गांव में महज 146 परिवार ही स्थाई रूप से रह रहे हैं।

ये भी पढ़ें

बुनियादी सुविधाओं का अभाव और विस्थापन का इतिहास

काली नदी द्वारा कई दशकों से की जा रही भूमि कटान की मार झेल रहे इस गांव से विस्थापन कोई नई बात नहीं है। जमीन के लगातार धंसने के चलते साल 1976 में ही यहां के आधे से अधिक परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के तहत ऊधम सिंह नगर जिले के सितारगंज में विस्थापित किया जा चुका था। इसके बावजूद जो परिवार अपनी पैतृक जमीन से जुड़े रहे, वे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दो देशों की सीमाओं पर बसे होने के बाद भी यहां बिजली, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और आधुनिक संचार नेटवर्क पूरी तरह नदारद हैं। लिपुलेख दर्रे तक रणनीतिक सड़क का निर्माण पूरा होने के बाद वर्ष 2020 में यह इलाका सड़क मार्ग से जुड़ सका, जिससे आवागमन में थोड़ी आसानी जरूर हुई, लेकिन बाकी दिक्कतें जस की तस बनी हुई हैं। संचार नेटवर्क के मामले में ग्रामीण आज भी पड़ोसी देश नेपाल के सिग्नलों पर निर्भर हैं। मोबाइल पर सामान्य फोन कॉल करने के लिए भी स्थानीय निवासियों को छह किलोमीटर दूर छियालेख तक पैदल या वाहन से जाना पड़ता है।

ग्रामीणों का दर्द और प्रशासनिक आश्वासन

गांव के निवासी कृष्णा गर्ब्याल का कहना है कि सड़क मार्ग बनने से आने-जाने की सुविधा तो मिली है, लेकिन बिजली, पीने के पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाओं और मोबाइल नेटवर्क की स्थिति आज भी बेहद खराब है। बुनियादी जरूरतों के अभाव में लोग मजबूरी में अपने घरों को छोड़कर शहरों का रुख कर रहे हैं, जिससे पलायन की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। वहीं गांव के एक अन्य युवा भूपेन्द्र ने चिंता जाहिर करते हुए बताया कि काली नदी का बहाव निरंतर तेज होता जा रहा है। नदी की तेज लहरें गांव की निचली जमीन को लगातार निगल रही हैं, जिससे गांव के भूगोल पर ही संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि कटाव को रोकने के लिए मौके पर अब तक कोई ठोस सुरक्षा कार्य नहीं किया गया है।

इस पूरे मामले पर जिला मजिस्ट्रेट आशीष भटगांई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि गर्ब्यांग गांव को केंद्र सरकार की वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल कर लिया गया है। प्रशासन की योजना के अनुसार अगले वर्ष तक गांव में बिजली की आपूर्ति बहाल कर दी जाएगी। इसके साथ ही काली नदी द्वारा किए जा रहे भूमि कटाव की रोकथाम के लिए भी सुरक्षात्मक उपाय जल्द शुरू किए जाएंगे।

सवाल-जवाब

गर्ब्यांग गांव कहां स्थित है और इसकी क्या खासियत है?
गर्ब्यांग गांव उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में चीन और नेपाल सीमा के पास करीब 10,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण इसे कभी 'मिनी यूरोप' और 'भारत का यूरोप' कहा जाता था।
इस गांव पर इस समय क्या संकट है?
गांव के ठीक नीचे बहने वाली काली नदी के लगातार कटाव के कारण जमीन धंस रही है, जिससे गांव के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है।
गांव से पलायन का इतिहास क्या रहा है?
लगातार भूधंसाव के कारण 1976 में यहां के आधे से अधिक परिवारों को ऊधम सिंह नगर के सितारगंज में बसाया गया था। वर्तमान में 400 परिवारों में से सिर्फ 146 परिवार ही गांव में स्थाई रूप से रहते हैं।
गर्ब्यांग में सड़क और संचार की क्या स्थिति है?
लिपुलेख दर्रे की सड़क बनने के बाद यह गांव 2020 में सड़क से जुड़ा, लेकिन संचार के लिए लोग नेपाल नेटवर्क पर निर्भर हैं और फोन कॉल के लिए छह किलोमीटर दूर छियालेख जाना पड़ता है।
प्रशासन ने गांव के विकास और सुरक्षा के लिए क्या आश्वासन दिया है?
जिला मजिस्ट्रेट आशीष भटगांई के अनुसार गांव को वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल किया गया है, जिसके तहत अगले साल तक बिजली पहुंचाई जाएगी और नदी कटाव रोकने का काम शुरू होगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·17 मिनट पहले

कभी 'मिनी यूरोप' कहे जाने वाले इस ऐतिहासिक गांव का ऐसा हाल देखकर दिल बैठ जाता है। आखिर सरकार इन 146 परिवारों को बचाने के लिए समय रहते कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती?

Ravikash Gupta@ravikash·32 मिनट पहले

नेपाल के सिग्नल पर बात करना अजीब है, जबकि हम खुद को डिजिटल इंडिया कहते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·32 मिनट पहले

रविकाश जी, बात बिल्कुल सही है। सीमांत इलाकों की यह अनदेखी सुरक्षा और डिजिटल दावे दोनों पर बड़ा सवाल है।

Rohan Verma@rohan-verma·51 मिनट पहले

इतने अहम रणनीतिक इलाके में अब तक फोन नेटवर्क क्यों नहीं ठीक हो पाया? नेपाल के सिग्नलों पर कब तक निर्भर रहना पड़ेगा?

Karan Malhotra@karan-malhotra·51 मिनट पहले

रोहन भाई, मोबाइल नेटवर्क के लिए छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है, वो भी सीमावर्ती इलाके में... सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद चिंताजनक है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp